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उद्देष्य व परिभाशायें

खण्ड-तीन

 

1. उद्देष्य व परिभाशायें-                      

  1. याचिका देने वालों का प्रार्थना में निहित उद्देष्य         

  2.  परिभाशायें :-                                    

      (क) प्रार्थना में प्रयुक्त षब्दावली व पदावली          

      (ख) याचिका में प्रयुक्त षब्दावली व पदावली

1.   याचिका देने वालों का प्रार्थना में निहित निष्चित उद्देष्य

  इस याचिका के माध्यम से, याचिका देने वाले, जन्मसिध्द वित्तीय अधिकार के तौर पर, भारत के संधीय षासन से, प्रमुख याचिकाकर्ता को और संघ के सभी मतदाताओं को, ऑटोमैटिक टेलर मषीनों के कैष कार्ड जैसे साधनों से, नियमित आमदनी के षासकीय स्रोत के रूप में, राश्ट्रीय औसत आय की, आधाी रकम, नियमित दिलाने के लिए इस याचिका के अध्याय 9 में अंकित याचनाओं के उन बिंदुओं पर आवष्यक ऐसे कदम उठाने की मांग करते हैं, जो कदम लोकसभा की याचिका समिति के अधिकार क्षेत्र  के अंर्तगत उठाना संभव हो।

2.   परिभाशाएं

(क) प्रार्थना में प्रयुक्त पारिभाशिक षब्दावली व पदावली

(i)      मतदाता -

      यानी, भारत के चुनाव आयोग द्वारा निर्मित लोकसभा के आम चुनाव 

के लिए, निर्वाचक सूची में दर्ज वर्तमान में भारत के लगभग 68 करोड़ वयस्क नागरिक।

(ii)     मतदातावृत्ति , या वोटरशिप-

     यानी,

     आर्थिक तंगी व आर्थिक विशमता के कारण होने वाले अपराधों पर अंकुष लगाने, गरीबी उन्मूलन,

     आर्थिक तंगी से हो रही आत्महत्याओं पर रोक लगाने,

     जनसंख्या के अनियोजित वृध्दि पर अंकुष लगाने,

     कर्माधारित वर्णव्यवस्था के उद्विकास,

     व्यक्तिगत व व्यवस्थागत भ्रश्टाचार पर अंकुष लगाने,

     महिलाओं को उत्पीड़न से राहत देने,

     गरीब परिवारों में जन्म लेने वाली प्रतिभाओं के कत्ले आम पर अंकुष लगाने,

     अनैच्छिक वैष्यावृत्ति से छुटकारा देने,

     आर्थिक न्याय की मंषा रखने वाले महापुरूशों को व्यवस्थागत श्रध्दांजली देने,

     विष्व व्यापारियों व विष्व उपभोक्ताओं से क्षति उठाने वाले नागरिकों को क्षतिपूर्ति देने,

     आर्थिक लोकतंत्र,

     औसत आर्थिक संसाधन को मूलाधिकार बनाने के साधन के रूप में,

      संघीय षासन के माध्यम से,

     लोकसभा के गठन में, मतदान का अधिकार रखने वाले मतदाताओं को,

     राश्ट्र की साझी आर्थिक विरासत में, उनके अपने हिस्से के रूप में, नियमित रूप से ए0 टी0 एम0

     जैसे पारदर्षी साधनों से, नकद प्राप्त होने वाली औसत राश्ट्रीय आय की आधी रकम ।

(iii)    जन्म के आधार पर वितीय अधिकार &

      यानी, राश्ट्रपिता की संतान, यानी राश्ट्रपुत्र या राश्ट्रपुत्री होने की हैसियत से, संसद द्वारा मान्य किया जाने वाला, उत्ताराधिकार जैसा ही, एक अधिकार, जिसके द्वारा हर मतदाता को परिश्रम की षर्त के बगैर, कुछ रकम सरकार की ओर से, नियमित रूप से, प्राप्त हो।

(iv)    लोकतंत्र का और न्यायप्रिय ढ़ाचा विकसित करना -  

      यानी, इस याचिका के अध्याय 9.2 और 9.3 में विस्तार से वर्णित साझा नागरिकता, साझा षासन-प्रषासन का अधिकार, व वैष्वीकरण की प्रगतिषील प्रक्रिया के कारण देष के घरेलू नागरिकों की पैदा हो चुकी विदेषी आवष्यकताओं को सुगमता पूर्वक पूर्ण करने के लिए राज्य की अपेक्षित सत्ताा संरचना विकसित करना।

(v) जन्म के आधार पर बरते जा रहे आर्थिक भेदभाव -

      यानी, संसद द्वारा, उत्ताराधिकार के कानून के माध्यम से, पूंजीपतियों की संतानों को, परिश्रम व प्रतिभा परीक्षा की षर्त के बगैर, अरबों रूपये की पूंजी का स्वामी बनाना और गरीब-मां बाप की संतानों को दिहाड़ी की रकम देने के लिए कठोर परिश्रम की षर्त रखना, इस प्रकार कर्म का अपमान करते हुए और जन्म का सम्मान करते हुए, किसी एक को जन्मते ही सम्पन्न बनाना और किसी दूसरे को जन्मते ही विपन्न बनाना, और इस प्रकार किया गया सरकार व संसद द्वारा संविधान के अनुच्छेद 1415 का उल्लंघन करना।

(vi) न्युनतम आर्थिक समता कायम करना -

      यानी, मतदातावृत्तिा, या वोटरषिप द्वारा, संध के सभी मतदाताओं के औसत रहन-सहन को औसत राश्ट्रीय आय की 50 प्रतिषत धनराषि की सीमा तक की आर्थिक समानता कायम करना।

(vii)   प्रमुख याचिकाकर्ता द्वारा अहिंसक जीवन जी पाना-

      यानी, प्रमुख याचिकाकर्ता द्वारा ऐसा जीवन जी पाना, जिससे किसी अन्य व्यक्ति की रोजी-रोटी न छिनने पायें।  वोटरषिप की रकम से जीवन यापन करके याचिकाकर्ता किसी दूसरे की रोजी-रोटी छीनने की आत्मग्लानि से बच सकता है। इसलिए वोटरषिप की नियमित रकम को याचिकाकर्ता आय का निर्दोश जरिया मानता है। याचिका में ऐसे जीवन को अहिंसक जीवन कहा गया है। याचिकाकर्ता द्वारा, उसके अपने जीवन के साथ किये जा रहे प्रयोग, व आजीवन न्यायाग्रह के बारे में विस्तार से जानने के लिए याचिका के अध्याय 10 (ख) का संदर्भ लें।

(viii) प्रमुख याचिकाकर्ता द्वारा विवाह कर पाना -

      यानी, वोटरषिप की आय के अभाव में याचिकाकर्ता ऐसी कोई नियमित व सुनिष्चित आय प्राप्त नही कर पा रहा है, जो निर्दोश हो व हिंसक न हो । आय के अभाव में याचिकाकर्ता अपने विवाह की कार्यवाही को वोटरषिप की रकम मिलने तक की अवधि के लिए स्थगित किये हुए है। जिससे याचिकाकर्ता के परिवारजन चिंतित हैं और समाज की वंष परम्परा की एक षाखा के सदा-सदा के लिए सूख जाने का खतरा पैदा हो गया है। इसलिए याचिकाकर्ता वोटरषिप जैसी निर्दोश आय प्राप्त करने और इस आय के सहारे अपना वैवाहिक विज्ञापन देकर वैवाहिक जीवन जीना चाहता है। वोटरषिप की नियमित आय के माध्यम से, विवाह को सम्भव बनाने के लिए, लोकसभा को एकमात्र सक्षम संस्था समझ कर प्रमुख याचिकाकर्ता लोकसभा के समक्ष यह याचिका दे रहा है।

(ix) लोकसभा द्वारा आवष्यक कार्यवाही करना -

      यानी, लोकसभा द्वारा मतदाताओं को जन्मना वित्ताीय अधिकार देने सम्बन्धी विधेयक पारित करना और इस याचिका के अध्याय 9 में अंकित कार्यों को सम्पादित करने में अपने हिस्से की भूमिका का निर्वाह करना। 

(ख) याचिका में प्रयुक्त पारिभाशिक षब्दावली व पदावली

(i)         आर्थिक विशमता की पीड़ा :-

      यानी प्रदर्षन प्रभाव (Demonstration Effect) के कारण पैदा होने वाली वह पीड़ा जो किसी दूसरे व्यक्ति के ऐषो-आराम के साधनों का दर्षन करने से व उन उपभोक्तावादी साधनों को खुद के लिए हासिल न कर पाने की बेबसी से पैदा होती है ।

(ii)        आर्थिकर् कत्ताव्य (इकोनॉमिक डयूटी) -

      विष्व उपभोक्ता अधिकार व विष्व व्यापार समझौते के कारण क्षति उठाने वाले नागरिकों की क्षतिपूर्ति के रूप में विष्व उपभोक्ताओं व विष्व व्यापारियों द्वारा वोटरषिप कोश के लिये दिये जाने वाली नियमित धनराषि, जिसे षासन द्वारा संबंधित नागरिकों में नियमित वितरित किया जाये ।

(iii)  आर्थिक बलात्कार &

      यानी जन्म के आधार पर राश्ट्र की औसत आय की आधी रकम से भी वंचित नागरिकों द्वारा न्युनतम उपभोग सामग्री जुटाने के लिए काम की षर्त पर, पैसा देने वाले के आदेष पर, अपनी इच्छा के विरूध्द, अपनी षरीर से करवाया जाने वाला कार्य ।

(iv) आर्थिक भ्रश्टाचार -

      यानी, आर्थिक रूप से किसी सम्पन्न व्यक्ति का वह आचरण, जिसमें वह चन्दे की षक्ति से, कार्यपालिका व विधायिका के अंगों का, निजी स्वार्थ में उपयोग करता हो; तथा अपने हाथ में रखी गई धनराषि को विकास के बजाय, निजी सुख-सुविधा, मनोरंजन तथा उपभोग के साधनों पर खर्च करता हो।

(v)  अन्त्योदयी न्याय -

      किसी समाज के उर्ध्वाधर सोपानों पर व्यवस्थित विविध आर्थिक व सामाजिक समुदायों का समाज के राजनैतिक ढांचे में इस तरह की अवस्थापना जिसमें उच्चतर सोपान पर अवस्थित समुदाय के प्रतिनिधियों को निम्नतम राजनैतिक अधिकार प्राप्त हों तथा निम्नतम सोपान पर अवस्थित समुदाय के प्रतिनिधियों को उच्चतम राजनैतिक अधिकार प्राप्त हों।

(vi)  आर्थिक नागरिकता -

      किसी मतदाता की, किसी राज्य व उसके षासन से वह  संबंध, जिसके अधीन राज्य मतदाता को उसके जन्मसिध्द अधिकार के रूप में कम से कम औसत राश्ट्रीय आय की आधी रकम नियमित वोटरषिप के रूप में उपलब्ध कराता हो।

(vii)  आभासी विकास-

       ऐसा विकास जो उत्पादन की वृध्दि के बजाय संवृध्दि के स्थानांतरण के कारण दृश्यमान हो, जैसे हजारों पुलिया की निर्माण सामग्री एक फ्लाई ओवर में दृश्यमान हो, हजारों मकानों की सामग्री एक सड़क में दृश्यमान हो, किसी व्यक्ति के परिश्रम से खरीदी गई उपभोग सामग्री किसी दूसरे व्यक्ति के घर में दृश्यमान हो, किसी एक देष के परिश्रम से पैदा हुई संवृध्दि किसी दूसरे देष में दृश्यमान हो ........।

(viii)  ए.बी.(AB) संवेदी चेतना -

    एक खास तरह की सोंच का ढ़ाचा, जो मानव के तंत्रिका तंत्र में, या सूक्ष्म षरीर में एक खास तरह की संरचना व खास तरह के विद्युत-संचरण के कारण पैदा होती है। मानव षरीर में रक्त संचरण नलिकाओं के समानांतर पूरी षरीर में तंत्रिकाओं की षाखाएं फैली होती है। चूंकि सभी लोगों की रक्त संचार नलिकाओं में एक ही तरह का रक्त बहने की बजाय कम से कम आठ तरह का रक्त संचरित होता है।  इसलिए इन रक्त नलिकाओं के समानांतर मौजूद तंत्रिकाओं में भी एक ही तरह की विद्युत संचारित नहीं हो सकती, कम से कम आठ तरह की विद्युत संचरित होती है। विद्युत की यही किस्में अलग-अलग विचारधारायें पैदा करती है। इन्हीं विचारधारा प्रवर्गो में से एक विचारधारा का संबंध रक्त के AB प्रवर्ग से है। AB रक्त प्रवर्ग के कारण पैदा होने वाले वैचारिक प्रवर्ग की चेतना को इस याचिका में AB संवेदी चेतना कहा गया है। AB प्रवर्ग के रक्त धारक अपनी षरीर में सभी लोगों के रक्त को ग्रहण कर सकते है, किन्तु अपने प्रवर्ग के अलावा किसी अन्य प्रवर्ग के व्यक्ति को अपना रक्त दे नही सकते। जब इस रक्त प्रवर्ग का प्रभाव केन्द्रीय तंत्रिकातंत्र पर पड़ जाता है तो ऐसा व्यक्ति रक्त के प्रति सर्वग्रही होने की बजाय धन के प्रति सर्व ग्राही हो जाता है। ऐसा होने पर वह धन के अपने व अपने जैसों के पास केन्द्रीकरण की मूल प्रेरणा से ही संचालित हो जाता है। ऐसे लोग पूंजी की महत्ताा को सर्वोच्च स्थान देकर जीवन जीते है। समाज अक्सर ऐसे लोगो को पूंजीवादी लोगो के नाम से जानता है।

(ix)  उपभोग की राश्ट्रीय सीमा-

     यानी, प्रति व्यक्ति औसत आय की रकम से अधिक वह सीमित रकम, किसी नागरिक द्वारा, जिसके उपभोग को भारत संघ की संसद राश्ट्रहित में करार दे।

(x)  ओ.'O' संवेदी चेतना-

     यानी, उक्त 'AB' रक्त की बजाय 'O' प्रवर्ग के रक्त के कारण पैदा होने वाले सोंच के ढ़ाचे को इस याचिका में ओ. संवेदी चेतना कहा गया है। इस चेतना का धारक धन को लोगों में उसी तरह वितरित करना चाहता है, जिस प्रकार ओ. रक्त प्रवर्ग का व्यक्ति सभी लोगों में अपने रक्त के वितरण में 'युनिवर्सल डोनर' का स्वभाव रखता है ।  अधिक स्पश्टीकरण के लिए उक्त परिभाशा पैरा 7 का, व चिकित्सा विज्ञान में निहित रक्त प्रवर्गों का संदर्भ लें ।

(xi)  गैप -

     यानी, 'ग्लोबल ऐग्रीमेन्ट औन पावर्टी एण्ड पीस' का संक्षिप्त रूप ।  विष्व व्यापार, विष्व उपभोक्ता अधिकार, विष्व व्यापारियों, विष्व उपभाक्ताओं, विष्व व्यापार संगठन व गैट समझौते के कारण वित्ताीय क्षति उठाने वाले विविध देषाें के नागरिको को वित्ताीय क्षतिपूर्ति देने के लिये, विष्व व्यापारियों व विष्व उपभोक्ताओं पर वित्ताीय अधिभार भारित करने तथा ऐसी विष्व राजव्यवस्था एवं विष्व अर्थव्यवस्था रचने के लिए प्रस्तावति विष्वव्यापी समझौता; जिस व्यवस्था से विष्व में षांति बनाये रखने का व्यवस्थागत प्रबंध संभव हो एवं न्युनतम आर्थिक समता के सिध्दांतों से पूरे विष्व से गरीबी का पूर्णतया उन्मूलन संभव हो सके।

(xii)  गैप प्रारूप आयोग&

   यानी, 'गैप समझौते' का मसौदा तैयार करने के लिए संसद द्वारा गठित किया जाने वाला प्रस्तावित आयोग।

(xiii) धन प्रतिनिधि -

       यानी, वह जनप्रतिनिधि, जो मतदाताओं के सार्वजनिक हित के नाम पर केवल सड़क जैसी चीजों की ही चिंता न करता हो, अपितु मतदाताओं के निजी आर्थिक हितों की चिंता भी करता हो, इस दिषा में वास्तविक रूप से परिणामदायक कार्य करना चाहता हो और ऐसे कार्य कर भी पाता हो।

(xiv) न्यूनतम समानता रेखा -

    संसद द्वारा तय की गई प्रति व्यक्ति औसत आय की वह सीमा रेखा, जिस सीमा तक की धन राषि राश्ट्र के सभी मतदाताओं को जन्म के आधार पर षासन द्वारा नियमित नकद दिया जाता हो ।

(xv) परा देषीय समस्यायें&

    यानी, वे समस्यायें जिनका समाधान देष की सरकार के अकेले प्रयत्न से संभव नही है, जिनके समाधान के लिए कई देषों की सरकारों या कई देषो के नागरिकों के साझा प्रयत्न अपेक्षित हों।

(xvi) परा-देषीय प्रयास -

    यानी, परादेषीय समस्याओं के समाधान के लिए अपेक्षित कई देषों की सरकारों व कई देषों के नागरिकों के साझे प्रयास।

(xvii) (क)  प्रमुख याचिकाकर्ता -

   यानी, भरत गांधी, प्रभारी - संसदीय प्रकोश्ठ, आर्थिक आज़ादी आन्दोलन परिसंघ, C/O. सुनील आनन्द, बी-5/124, पष्चिम विहार, नई दिल्ली-110063, जिसने लोकसभा में यह याचिका दाखिल करने का प्रयास प्रारंभ किया । 

(ख)  याचिकाकर्ता & यानी, प्रमुख याचिकाकर्ता ।

(ग) अन्य याचिकाकर्ता - यानी प्रमुख याचिकाकर्ता के अलावा शेष याचिकाकर्तागण।

(xviii)  बहुराश्ट्रीय नागरिकता &

       यानी, ऐसी नागरिकता जिसका धारक कई देषों की साझा मतदाता सूची में दर्ज हो, उसे साझी नागरिकता प्राप्त मतदाताओं द्वारा चुनी जाने वाली विधायिका में मतदान करने का, प्रत्यासी बनने का, विधायिका का सदस्य बनने का, कार्यपालक बनने का व संबंधित न्यायपालिका में न्यायाधीष बनने का तथा ऐसे ही अन्य परादेषीय अधिकार प्राप्त हाें ।

(xix)  बहुराश्ट्रीय सरकार -

       बहुराश्ट्रीय नागरिकों द्वारा चुनी गई विधायिका, और उसके द्वारा गठित की गई कार्यपालिका, जिसको परादेषी समस्याओं के समाधान का कार्य करना हो।

(xx) विष्व व्यापारी -

       किसी भी देष का व्यापारी, जो निजी आर्थिक लाभ के कारण अन्य देषों के विष्व व्यापारियों और विष्व उपभोक्ताओं के साथ परादेषीय सांगठनिक एकता बनाकर, देष के नागरिकों के सम्मुख मौजूद आर्थिक समस्याओं से केवल मुंह ही नही मोड़ लेता है, अपितु उनके सामने नई आर्थिक समस्यायें खड़ी कर देते हैं, विदेषी वस्तु व विदेषी सेवाओं का आयात करके विदेषी कर्ज व भुगतान संतुलन की समस्या पैदा करता है।

(xxi)  वोटर कौंसिलर -

       मतदाता षिक्षण की भूमिका में कार्य करने वाला व अधिक से अधिक 100 मतदाताओं को राजनैतिक सलाह देने वाला, संबंधित 100 उन्हीं मतदाताओं द्वारा नियमित रूप से उनकी ही अनुसंषा के आधार पर, षासकीय वित्ता पोशित प्रस्तावित एक तकनीकी व्यक्ति, जिसके माध्यम से वोटरषिप की रकम का वितरण सुविधाजनक हो सके  व षासन की अपेक्षायें एक-एक परिवार तक पहुंचाया जा सके।

 

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