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खण्ड-तीन

अध्याय - दो

वोटरशिप पर लोकसभा में याचिका : एक कानूनी परीक्षण

1.   यह कि याचिका की प्रार्थना लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम के नियम 160 के अंतर्गत आती है, क्योंकि-                                                                                                                                                               

       (क)   याचिका की प्रार्थना सामान्य लोकहित का विशय है। 

       (ख)   'सामान्य लोकहित' उक्त नियमावली में परिभाशित नहीं है। 

       (ग)   मतदाताओं के लिए राश्ट्रीय उत्ताराधिकार के रूप में नकद रकम प्राप्त करने का मामला निष्चित रूप से संघ के वित्ताीय नियंत्रण से संबंधित मामला है, जो किसी भी प्रदेश के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात है, और संघ सूची का विशय है।  इसलिए किसी राज्य की विधायका में यह मामला पेष नही किया जा सकता।

       (घ)   याचिका की प्रार्थना चूंकि एक विषय पर है, किन्तु यह एक से अधिक विशयों को अपने अधीन समेटे हुए है, इसलिए लोकसभा के प्रक्रिया के नियम 173(दो) के प्रावधानों के कारण मामले को संकल्प के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।

       (ङ)   लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम का नियम 186(चार) मामले को किसी हाल ही में घटित विशय तक ही निर्बन्धित रखता है, इसीलिए मामले को मूल प्रस्ताव के रूप में नहीं उठाया जा सकता।

2.     यह कि याचिका भारत संघ की लोकसभा से कुछ ऐसे कदम उठाने की याचना करती है, जिसमें भारत की संचित निधि पर कोई व्यय भार न पड़ता हो, अत: याचिका को प्रस्तुत करने से पूर्व नियम 160.क के अंतर्गत राश्ट्रपति के सिफारिष की आवष्यकता नहीं है।

3.     यह कि याचिका को लोकसभा के कार्य संचालन नियम के नियम 163 के अंतर्गत इसीलिए खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि याचिका के संलग्नक पत्र, षपथपत्र या दस्तावेज की श्रेणी में नहीं आते, क्योंकि -

     (क)  पत्र, षपथ-पत्र तथा दस्तावेज- ये तीनों षब्द उक्त नियमों में परिभाशित नहीं है।

     (ख)  याचिका के संलग्नक याचिका को ही स्पश्ट करने वाले कथन व सूचनाएं हैं।

     (ग)  संलग्नक व साक्ष्य याचिका की प्रार्थना पर उठने वाले सवालों के जवाब से संबंधित है, जिसके बिना याचिका की प्रार्थना पर तर्क-वितर्क, बहस व किसी निश्कर्श तक पहुंचना संभव नहीं हो सकता।

     (घ)  संलग्नकों व साक्ष्यों के माध्यम से याचिकाकर्ता प्रार्थना पर बहस के संभावित बिन्दुओं पर अपना पक्ष रखना चाहते हैं । संलग्नकों व साक्ष्यों का संदर्भ याचिका के साथ न देने का एक मतलब तो यह होगा कि याचिकाकर्ता याचिका की प्रार्थना की गंभीरता व उसके अनेक आयामों से परिचित नहीं हैं। दूसरा मतलब यह होगा कि याचिकाकर्ता जानबूझ कर तथ्यों को माननीय लोकसभा से छुपाना चाहते हैं।

     (ङ)   प्रार्थना के विविध आयामों को स्पश्ट करने वाली सूचनायें देने वाले संलग्नकों व साक्ष्यों को स्वीकार न करने का यह मतलब भी होता है कि किसी सजा प्राप्त बेकसूर फरियादी की बिना पूरी बात सुने, बीच में रोंक दिया जाये और उसकी सजा को न्यायसंगत ठहराकर वापस कारागार भेज दिया जाये।

     (च)  जब माननीय लोकसभा, देष के विष्व-व्यापारियों व देष-विदेष के विष्व उपभोक्ताओं के हित साधन के लिये ''व्यापार व तटकर पर सामान्य समझौते'' के कई हजार पृश्ठों के दस्तावेज का अध्ययन कर सकती है, और उसकी मंजूरी दे सकती है तो इसका कोर्इ्र कारण नहीं कि लोकसभा स्वयं के निर्माताओं, यानी मतदाताओं के हित साधन के लिए मात्र एक-डेढ़ हजार पृश्ठों का अध्ययन करने के लिये आलस्य का परिचय दे, लोकसभा के कीमती समय का तर्क दे, या उक्त नियम 163 के अंतर्गत याचिका स्वीकार करने व इसका परीक्षण करने से मना करे।

4.     यह कि लोकसभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियम, के नियम 307 (दो) के अंतर्गत याचिका समिति या लोकसभा के अध्यक्ष को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि याचिका को विस्तृत रूप में परिचालित करना असुविधाजनक है तो वे याचिका को संक्षिप्त रूप में परिचालित करने का निर्देष दे दें; इसलिए भी याचिका को नियम 163 के अंतर्गत खारिज करने का औचित्य नहीं बनता।

5.    यह कि यदि याचिका की प्रार्थना, उसमें प्रदत्ता सूचनायें, तथ्य, तर्क, परिस्थितियों का विष्लेशण वास्तव में जनहित व राश्ट्रहित के विशय हैं, तो लोकसभा अध्यक्ष अपने विवेकाधिकार का उपयोग करके याचिकाकर्ताओं को उचित सलाह दे सकते हैं। मामले का अध्ययन करने के लिए कोई संसदीय समिति गठित कर सकते हैं, या मामले को संसद के किसी अन्य फोरम के पास विचारार्थ प्रेशित कर सकते हैं।

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भरत गांधी कोरोनरी ग्रुप                                                                                                         Naveen Kumar Sharma