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खण्ड-तीन

वोटरषिप के प्रस्ताव के विरूध्द प्रमुख आपत्तियां

1. गरीब नागरिकों सम्बन्धी तर्क          

      (क) गरीब लोग षराब पी जायेंगे (?)               

      (ख) गरीब लोग जनसंख्या बढ़ायेंगे (?)             

      (ग) गरीब लोग काम करना बन्द कर देंगे (?)       

      (घ) गरीबों को गरीबी भत्ता मिले: सबको वोटरषिप नहीं (?)   

      (ड.) वोटरषिप केवल गरीबों को मिलें, सबको नहीं (?) 

2. विकास सम्बन्धी तर्क                  

      (क) विकास अवरूध्द हो जायेगा (?)               

      (ख) निवेष के लिये पैसा नहीं मिलेगा (?)          

      (ग) काम मिले, पैसा नहीं; जिससे विकास हो (?)    

      (घ) रोजगार के अवसर खत्म हो जायेंगे (?)        

      (ड.) लोगों को एक-एक रूपया मिल भी गया, तो कोई लाभ नहीं (?)     

3.  असंभावना सम्बन्धी तर्क            

      (क) सरकार के पास पैसा नहीं है (?)              

      (ख) वोटरषिप के लिये अमीर लोग अपना पैसा टैक्स में क्यों देंगे (?)  

      (ग) बेरोजगार होने वाले सरकारी अधिकारी विरोध में उतरेंगे (?)

      (घ) दलित व पिछड़े वर्ग के नेता मतदाताओं में फूट डालेंगे (?) 

      (ड.)        स्वाभिमानवादी नेता आर्थिक न्याय की बजाय

         सामाजिक न्याय का मामला  उछालेंगे (?)       

          

      (च) घाटे के बजट में वोटरषिप असंभव (?)         

      (छ) गले नहीं उतरती (?)                       

      (ज) वोटरषिप देने के लिये सरकार पैसा कहाँ से लाएगी (?) 

 

3.  असंभावना संबंधी तर्क

(क) सरकार के पास पैसा नहीं है (?)

       सरकार के पास पैसा नहीं है, यह तर्क देकर वोटरषिप के प्रस्ताव के कार्यान्वयन को निम्नलिखित कारणों से असंभव नहीं कहा जा सकता-

            (i)    यह कि घरेलू अर्थव्यवस्था का सारा पैसा सरकार का ही होता है, क्योंकि नोट छापने का अधिकार केवल सरकार को ही होता है। किन्तु सरकार यह सारा पैसा अपने पास नहीं रखती।  जिन लोगों को राश्ट्र के लिये ज्यादा उपयोगी यानी राश्ट्रसेवी समझती है, उन्हें दे देती है।  अपने पास थोड़ी सी रकम रखती है, जिसे कर राजस्व कहते हैं।  नागरिक इस सिध्दांत पर चलते हैं कि 'जाते पाँव पसारिये, ताते लम्बी सौर'; लेकिन सरकार इसके विपरीत इस सिध्दांत पर चलती है-'जाते सौर पसारिये, ताते लम्बे पाँव'।  अगर सरकार वोटरषिप देने का काम अपने हाथ में ले लेती है, तो उसके पाँव लम्बे हो जाएंगे।  पाँव लम्बा होता है, तो सरकार सौर (चादर) भी लंबी कर लेती है।  मतलब यह है कि सरकार अपना कर राजस्व बढ़ा लेती है।  चूंकि वोटरषिप की रकम सकल घरेलू उत्पाद की आधी ही है, इसलिये सरकार जनता का आधा पैसा उसे नियमित वापस करने लगती हैतब भी उसके पास टैलेन्ट इन्सेन्टिव तथा वर्क इन्सेन्टिव के लिये जीडीपी की आधी रकम षेश रहेगी।  इसलिए असंभव कहने के पीछे अध्ययन की कमी है।  कर के विशय में और ज्यादा जानकारी के लिए देखें अर्थषास्त्रियों के स्पश्टीकरण से संबंधित, इस याचिका के अध्याय - 3.3 (,,ज); अध्याय -7 को और वोटरषिप के लिए वित्ताीय स्रोत के लिए देखें इस याचिका के अध्याय - 9 (1,2) को।

            (ii)    यह कि वोटरषिप दे देने के बाद सरकार के तमाम विभाग जिन पर भारी रकम खर्च हो रहा है, बच जाएगा। लोगों के पास क्रयषक्ति आ जाने पर सरकार जो सुविधायें उन्हें दे रही है, उस सुविधा को सभी मतदाता बाजार से खरीद लेंगे।  स्वास्थ्य, षिक्षा, स्थानीय सड़क, परिवहन, खाद्य सुरक्षा, वस्त्र, बीमा, सामाजिक सुरक्षा, समाज कल्याण, जैसे तमाम मदों पर हो रहा खर्च बच जायेगा।  इस रकम को वोटरषिप खाते में स्थानांतरित करने से ज्यादा टैक्स भी नहीं लगाना पड़ेगा।  इसलिए ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि वोटरषिप देने के लिए बहुत ज्यादा टैक्स बढ़ाना पड़ेगा, जो असंभव दिखे।

            (iii)   यह कि वोटरषिप की रकम मिल जाने से नागरिकों की अप्रभावी मांग प्रभावी मांग में बदल जायेगी।  मांग बढ़ने से उत्पादकों को बिक्री आष्वासन मिल जायेगा।  इस आष्वासन से उत्पादन बढ़ जायेगा।  उत्पादन बढ़ने से अर्थव्यवस्था में पैसा भी बढ़ जायेगा।  इसलिए पैसे की कमी का रोना केवल वही रो सकता है जो वोटरषिप के सकारात्मक आर्थिक प्रभावों का अध्ययन नहीं किया है।

            (iv)   यह कि एक मकान में 10 कमरे हैं, उसमें रहने वाले लोगों की संख्या कुल दो-तीन है।  इतने लोग दो कमरे में भी आराम से रह सकते हैं।  चार गुना कमरों का उपयोग नहीं हो रहा है।  अगर बाजार दर से दो कमरों का किराया 2000 रूपये हो तो मकान का उपयोग 2000 x 5 = 10000 रूपया तक किया जा सकता है।  अगर सक्षम कानूनी व्यवस्था के माध्यम से उस मकान में 2 की बजाय 10 आदमी रहने लगें तो सरकार रू 2000 की बजाय रू 10000 कीमत की मुद्रा छाप सकती है।  इस नई मुद्रा को बाजार में आने से अर्थव्यवस्था में पैसा भी बढ़ जायेगा, महंगाई भी नहीं बढ़ेगी।  इसलिये यदि षासन से निर्दयी, क्रूर व आर्थिक बलात्कार पसंद लोग व्यवस्थागत तरीके से हटा दिये जायें तो राश्ट्र की सम्पत्तिा का बेहतर उपयोग संभव है।  बेहतर उपयोग से मुद्रा की मात्रा बढ़ जायेगी, जो वोटरषिप की रकम का स्त्रोत बन जायेगी।

       उक्त (i) से (iv) तक के विष्लेशण से सिध्द है कि पैसे की कमी को बहाना बनाकर वोटरषिप के प्रस्ताव का कार्यान्वयन असंभव नहीं कहा जा सकता।

(ख) वोटरषिप के लिये अमीर लोग अपना पैसा टैक्स में क्यों देंगे (?)

       टैक्स लगाने पर भी लोग सरकार को पैसा नही देगें, इस आधार पर भी वोटरषिप प्रस्ताव के कार्यान्वयन को असंभव नही कहा जा सकता, क्योंकि-

            (i)    यह कि यह कहना ही गलत है कि लोग अपना पैसा वोटरषिप देने के लिए सरकार को नही देगें। पहला तो यह कि सरकार ने देष का पैसा जिन लोगों को उत्ताराधिकार, ब्याज व किराये से संबंधित कानूनों द्वारा दे रखा है, उसे वापस ले सकती है, व उसके मूल स्वामी यानी मतदाताओं के पास भेंज सकती हैं। इसलिए यह कहना गलत हैं कि सरकार ''लोगों'' का पैसा उनसे मांगेगी। सच्र्चाई यह है कि सरकार मतदाताओं की ओर से मतदाताओं का पैसा उसी तरह वापस ले लेगी, जैसे कोई मकान मालिक किरायेदार से किराये का पैसा वसूलता है और न देने पर अपना मकान किरायेदार से वापस ले लेता है ।  मतदाताओं ने सरकार के नाम पॉवर आफ एटार्नी करके अपना पैसा अपने फायदे को समझकर सरकार को दे दिया था। सरकार ने इस रकम को उन लोगों के बेटों को दे दिया, जो ज्यादा अमीर थे। जब अमीर लोगो ने सरकार के संचालकों से एक गठजोड़ करके पैसे को मतदाताओं की इच्छा से उपयोग करने की बजाय क्रेताओं की इच्छा से उपयोग करना षुरु कर दिया और यह सच्चाई  जब मतदाताओं ने जाना, तो उक्त पॉवर आफ एटार्नी को खारिज करके सरकार से अपना पैसा वापस मांग लिया। इसलिए मतदाताओं की इस मांग के आधार पर सरकार उन्हें वापस करने के लिए जो टैक्स लगायेगी, इस टैक्स को न देने का मतलब बेइमानी करना है। इसका वही दण्ड होगा, जो एक बेइमानी के अभियुक्त को कानूनन मिलती है। चूंकि बेइमानी के लिए दण्ड का प्रावधान पहले से है, इसलिए वोटरषिप के लिए लोग सरकार को टैक्स देंगे।

(ii)       यह कि उक्त बिन्दु (i) से स्पश्ट है कि अगर टैक्स देने के लिए जिम्मेदार लोग मतदाताओं के पैसे की बेइमानी करना चाहेंगे, तो सरकार उन्हें दण्डित करके पैसा वसूलेगी। और यदि मतदाताओं द्वारा पॉवर आफ एटार्नी खारिज कर दिये जाने के बावजूद सरकार के संचालक स्वयं मतदाताओं का पैसा बेइमानी करने पर उतर आते हैं-तो मतदाता सरकार के संचालकों से या टैक्स देने से मुकरने वालों के साथ बने इनके गठबंधन के खिलाफ समानान्तर सरकार बनाने, या मामले को विष्व के पंचों के सामने ले जाकर न्याय मांगने को विवष हो जायेंगे। ऐसा भी हो सकता है कि पीड़ित मतदाताओं को उक्त सारे कदम एक साथ उठाने पड़ें। अत: लोग मतदाताओं का पैसा उन्हें ''अपना पैसा'' कहकर या ''ज्यादा टैक्स'' कह कर देने से मना नही कर सकते।

            (iii)   यह कि मतदाताओं को देने के लिए सरकार औसत राश्ट्रीय आय से ऊपर के नागरिकाें पर जो वित्ताीय दायित्व निर्धारित करेगी, उस दायित्व को तीन कारणों से कर (टैक्स) नही कहा जा सकता। पहला यह कि चूंकि वोटरषिप की रकम  नागरिकों से लेकर नागरिकों को ही वापस किया जा रहा है। इसलिए सरकार द्वारा ली गई रकम को टैक्स नही कहा जा सकता। दूसरा यह कि औसत से ज्यादा आय प्राप्त करना तभी संभव है, जब औसत से कम आय प्राप्त करने वालों की आर्थिक क्षति हो। अत: वोटरषिप की रकम एक क्षतिपूर्ति की रकम है, टैक्स नही। तीसरा यह कि सरकार नागरिकोें से पैसा लेकर सुविधा दे, तो यह पैसा 'कर' कहा जा सकता है, यदि पैसा लेकर पैसा ही दे, (स्वयं खर्च न करे) तो इसे आर्थिकर् कत्ताव्य (Economic Duty) कहेंगे, कर नही।

            (iv)   यह कि वर्तमान में सरकार जो टैक्स लेती है, उसका अधिकांष हिस्सा कुछ अमीर लोगों को और ज्यादा अमीर बनाने में खर्च होता है, या भ्रश्टाचार का ग्रास बन जाता है। टैक्स देने वालों की ऐसी मान्यता है, जो काफी हद तक सही भी है। इसीलिए टैक्स देना लोगों को भारी पड़ता है। इसीलि, सरकार द्वारा लगाया गया कर उन्हें अपने ऊपर सरकार द्वारा किया गया बलात्कार महसूस होता है। किन्तु वोटरषिप के उद्देष्य से जब पैसा लिया जायेगा, तो सज्जन लोग आनंदपूर्वक यह धनराषि देंगे, क्योकि यह समझ सकेंगे कि वह पैसा एक-एक घर में पहुंचने वाला है। इसलिए वोटरषिप के नाम पर भी लोग सरकार को पैसा नही देगे-यह गलत भविश्यवाणी है। जो लोग दूसरों का सुख देखकर दु:खी रहते हैं, या दूसरों का दुख देखकर आनंदित होते है केवल वही लोग वोटरषिप की रकम वापस करने से मना करेंगे। किन्तु समाज उनके सुख की रक्षा करने के लिए जिम्मेदार नही हो सकता, जिन लोंगो से दूसरों का सुख देखा ही नही जाता। स्पश्ट है कि वोटरषिप की रकम की बेइमानी करने वाले इन थोड़े से लोगों के साथ वह व्यवहार करना जायज होगा, जो व्यवहार किसी बेइमान आदमी           के साथ किया जाता है। ये लोग दण्ड के प्रावधानों के कारण वोटरषिप की रकम वापस करने का कानूनी आचरण अवष्य करेंगे।

            (v)    यह कि यदि वोटरषिप की रकम सरकार उसके मूल स्वामी यानी मतदाताओं को वापस नही दे पाती, टैक्स देने वालों के सामने झुक जाती है, या असहाय हो जाती है तो साबित हो जायेगा कि सरकार एक संप्रभु संस्था नही है। जो संप्रभु संस्था नही है, उसके नियमों, कानूनों, आदेषों को मानने के लिए गरीब नागरिक भी बाध्य नही होगा। यदि सरकार मतदाताओं की वोटरषिप की रकम की बेइमानी करने वालों के बीच से हट जाएगी तो मतदाता स्वयं अपना पैसा वसूल सकते है। इतिहास में ऐसा देखने को मिला है कि सरकार के हटने के बाद क्या होता है?

            (vi)   यह कि निजी सम्पत्तिा ही किसी आदमी के पास 'अपना पैसा' पैदा करती है ।  जबकि राजषाही खत्म होने पर सूबेदारों द्वारा राज्य की सम्पत्तिा पर किया गया अवैध कब्जा ही निजी सम्पत्तिा का मूल उद्गम है ।  इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिऐ देखें इस याचिका के अध्याय 6.1(,घ) को ।

       उक्त बिन्दु (i) से (vi) तक के विष्लेशण से साबित होता है कि वोटरषिप की रकम जिन लोगों के पास है, उन्हें यह रकम वापस करना ही पड़ेगा। वे लोगों को रकम देने से मुकर जायेंगे। केवल इस आषंका के आधार पर वोटरषिप के प्रस्ताव को असंभव एवं अस्वीकार्य नही सिध्द किया जा सकता।

(ग) बेरोजगार होने वाले सरकारी अधिकारी विरोध में उतरेंगे (?)

       ''वोटरषिप की रकम लोगों को वापस मिल जाने पर तमाम सरकारी मंत्रालयों व विभागों की जरूरत ही खत्म हो जायेगी, इसलिए उन विभागों के कर्मचारी वोटरषिप के विरोध में सड़क पर उतरेंगे, व आर्थिक रुप से षक्ति सम्पन्न होने के कारण जीतेंगे भी। चंदा देने की क्षमता न होने के कारण मतदातागण उनके सामने हार जायेंगें'' - इस मान्यता के आधार पर वोटरषिप के प्रस्ताव के कार्यान्वयन को असंभव नही कहा जा सकता ।  कारण इस प्रकार है -

            (i)    यह कि सरकारी कर्मचारियाेंं के बेरोजगार होने की संभावना दो कारणों से नही है। पहला यह कि वे कुछ रकम के बदले स्वैच्छिक सेवा निवृति ले सकते हैं, व कोई व्यवसाय प्रारंभ कर सकते हैं। दूसरा यह कि उन्हें मंजूर होने पर उन्हें दक्षिण एषियाई प्रषासन के प्रस्तावित तंत्र में स्थानांतरित कर दिया जा सकता है। इस प्रकार जब वे बेरोजगार ही नहीं होगें, तो उनके विरोध का प्रष्न ही नही उठता। इस विशय में ज्यादा जानकारी के लिए इस याचिका के अध्याय - 8.17 और 9.3ख-(v),(vii) का संदर्भ ग्रहण करें।

           (ii)    यह कि वोटरषिप के संभावित लाभार्थियों की संख्या लगभग 60 करोड़ होगी, इतनी ज्यादा संख्या में लोगों का विरोध सरकारी क्षेत्र के एक-डेढ़ करोड़ लोगो को झेलना मुष्किल हो जायेगा। यदि सरकारी क्षेत्र में लोग मतदाताओं की न्यायिक मांगो के साथ समन्वय स्थापित नही करेंगे, तो इतनी बड़ी संख्या में मतदाता षासन पलट सकते हैं, व उन लोगों के हाथ में राजनैतिक सत्ताा स्थानांतरित कर सकते हैं जो नौकरषाही व सरकारी क्षेत्र का समूल नाष करने पर उतारू हाें। यह खतरा व यह जोखिम-सरकारी क्षेत्र की संगठित षक्ति को वोटरषिप के प्रस्ताव के खिलाफत में उतरने से रोंकेगा।

            (iii)   यह कि उक्त बिन्दु (i) और (ii) की बात कुछ इक्का-दुक्का कर्मचारियों पर लागू नही होती। लेकिन इनकी संख्या इतनी कम होगी कि वोटरषिप की न्यायिक कार्यवाही में ये लोग बाधा नही पहुंचा सकते।

            (iv)   यह कि सरकारी क्षेत्र के अधिकांष कर्मचारी तष्तीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी हैं, जिनकी संख्या 75 प्रतिषत से भी ज्यादा है। इन कर्मचारियों की पत्नियां वोटरषिप के समर्थन में उतरेंगी, क्योंकि इन कर्मचारियों का वेतन इतना कम होता है कि उनकी पत्नियां घरेलू नौकरानी जैसा जीवन जीती हैं। वोटरषिप की रकम से दिखाई पड़ने वाली आर्थिक आत्मनिर्भता का अवसर वे किसी भी दषा में अपने हाथ से जाने नही देंगी। पत्नियों का विरोध उनके पति झेल नही पायेगें और देर-सबेर 75 प्रतिषत सरकारी कर्मचारी भी वोटरषिप के प्रस्ताव का समर्थन कर देंगे।

       उक्त बिन्दु (i) से (iv) के आधार पर साबित होता है कि सरकारी कर्मचारियों के विरोध व उनकी जीत की भविश्यवाणी निराधार है, इस आधार पर इस प्रस्ताव के कार्यान्वयन को असंभव नही कहा जा सकता।

(घ) दलित व पिछड़े वर्ग के नेता मतदाताओं में फूट डालेंगे (?)

       दलित व पिछड़े वर्ग के नेता एक षाजिस के तहत केवल अपनी जाति के मतदाताओं के लिए वोटरषिप की मांग करेंगे और गरीब मतदाताओं में फूट डाल कर वोटरषिप की न्यायिक कार्यवाही को निश्फल कर देंगे, यह आषंका निम्नलिखित कारणों से सही नही हो सकती-

            (i)    यह कि जो व्यक्ति लड़का के रूप में पैदा होता है, वह लड़की नही बन सकता। उसी प्रकार जो अपनी जाति-धर्म-क्षेत्र के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ता है, वह अपनी जाति, अपने धर्म-अपने क्षेत्र के आम लोगों के साथ आर्थिक बलात्कार को पसंद करता हैं। सामाजिक स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने वाला नेता केवल अपने निजी आर्थिक स्वाभिमान को अंदर ही अंदर बढ़ा रहा होता है, लेकिन वह अपनी जाति, अपने धर्म व अपने क्षेत्र व अपने देष के लोगों के आर्थिक स्वाभिमान को कीमती नही मानता। ऐसा नेता वोटरषिप के प्रस्ताव का अगर समर्थन करता है तो वह जातिवादी नेताओं की जमात में अपवाद ही हो सकता है, क्योंकि वोटरषिप की लड़ाई वस्तुत: आर्थिक स्वाभिमान की लड़ाई है। इन अपवादों को छोड़ दे तों षेश नेताओं की जुबान में इतना प्रभाव ही नही आ सकता कि मतदाता उनकी साजिष के षिकार हों। जिस प्रकार एक लड़का बहुत दिनों तक लड़की का अभिनय नही कर सकता। उसी प्रकार जातिवादी नेता जनता के आर्थिक षुभचिंतक होने का अभिनय बहुत दिनों तक नही कर सकते। धीरे-धीरे इनका पर्दाफास होता जायेगा, व मतदाता अपने नये नेतृत्व की ओर ध्रुवीकृत होते जायेंगे।

            (ii)    सामाजिक स्वाभिमान की लड़ाई वस्तुत: समाज के लिए नही होती, अपितु लड़ाई लड़ने वाले स्वयं नेता के लिए होती है। जब आर्थिक स्वाभिमान के विकल्प सामने होंगे, तो हर मतदाता आर्थिक स्वाभिमान के विकल्प को इसलिये चुनेगा, क्योंकि आर्थिक दषा बेहतर होने से उसका सामाजिक स्वाभिमान भी स्वत: बढ़ेगा। जबकि सामाजिक स्वाभिमान का विकल्प चुनने पर केवल उसके नेता की आर्थिक हालत बेहतर होगी, वह जहां है, वहीं रहेगा। वह जिस काम को करता था, वही करता रहेगा। जब तक वह अपना काम नही बदल पाता,जब तक वह अपने रहन-सहन का स्तर ऊपर नही बढ़ा सकता, तब तक केवल उसके नेता का सम्मान ही बढ़ेगा। वह भी उसकी आर्थिक बेहतरी के कारण बढेग़ा। अत: इतना नासमझ तो जानवर भी नही होता कि वह अपने आर्थिक स्वाभिमान को दांव पर लगाकर अपनी जाति के नेता का आर्थिक व सामाजिक स्वाभिमान बढ़ाये।

            (iii)   यह कि जातीय नेताओं के बहकावे में आ जाने की  संभावना केवल तभी लागू होती है, जब मतदाता के सामने अपना आर्थिक स्वाभिमान बढ़ाने का कोर्इ्र स्पश्ट विकल्प न हो। चूंकि अब वोटरषिप जैसा स्पश्ट विकल्प पैदा हो गया है, इसलिए मतदाताओं का जातीय व साम्प्रदायिक धु्रवीकरण संभव नही होगा। जो थोड़ा बहुत होगा भी, वह मूल धारा को प्रभावित नही कर सकता।

            (iv)   यह कि हर गांव-हर मोहल्ले में अब इतने पढ़े-लिखे लोग हो गये हैं कि जाति व राश्ट्र का अंतर वे समझ सकते हैं, व समझा सकते हैं। भारत संध के मतदाताओं को प्रस्तावित वोटरषिप का अधिकार किसी विषेश-जाति, धर्म, क्षेत्र के लोगों का अधिकार नही हो सकता। जाति का नेता अपनी जाति को वोटरषिप तभी दे सकता हैं, जब उसको नोट छापने का  अधिकर मिले। ऐसा तब हो सकता है कि उसकी जाति के लोग अपने बलबूते उसे देष का प्रधानमंत्री बना दें। या उसकी जाति के लोग अपना अलग देष बनाकर षेश पूरा देष छोड़कर अपने अलग बने देष में चले जायें। पहली संभावना इसलिए नही है कि भारत की एक भी जाति ऐसी नही है जिसकी जनसंख्या 50 प्रतिषत से ज्यादा हो। दूसरी संभावना इसलिए नही है कि अगर अलग देष बनायेंगे तो षेश पूरे देष के सहयोग से वंचित होना पडेग़ा। इससे नया देष बनाकर भी देने के लिए पैसा नही होगा, जो कि दे पायें। इन दोनो संभावनाओं कों छोड़ दें तो तीसरी संभावना यह बनती है कि ऐसे नेता सरकार को ज्ञापन दें-कि सरकार केवल उनकी ही जाति के मतदाताओं को वोटरषिप का अधिकार दे। ऐसे ज्ञापन को सरकार मानेगी ही क्यों? क्योंकि सरकार को केवल उसी जाति के लोगों ने बनाया नही।

            (v)    यह कि नई बात के साथ नेतृत्व की नई पीढ़ी भी पैदा होती है। यह पीढ़ी जातिवादी, क्षेत्रवादी, सम्प्रदायवादी नेताओं के दुश्प्रचार को निश्फल कर देगी और वोटरषिप की नाव डगमगाये भले ही, लेकिन नई पीढ़ी इसे डूबने नही देगी।

       उक्त (i) से (v) तक के बिन्दुओं से यह साबित होता है कि वोटरषिप के प्रस्ताव को जातिवादी, सम्प्रदायवादी व क्षेत्रवादी नेता केवल यह आवाज उठाकर निश्फल नही कर सकते कि ''वोटरषिप का अधिकार केवल उनकी जाति को ही मिले''

(ड.) स्वाभिमानवादी नेता आर्थिक न्याय की बजाय सामाजिक न्याय का मामला उछालेंगे (?)

       यह कि जातीय, साम्प्रदायिक व क्षेत्रीय स्वाभिमान को ज्यादा महत्व देने वाले नेतागण वोटरषिप का प्रस्ताव यह कहकर खारिज करेंगे कि हिन्दू समाज वर्णव्यवस्था पर आधारित है। यहां सामाजिक विशमता समाप्त हो जाने पर आर्थिक विशमता स्वयं समाप्त हो जायेगी। इसके लिए वोटरषिप का प्रस्ताव लागू करने की जरुरत ही नही है। स्वाभिमावादी नेताओं का यह निश्कर्श निम्नलिखित कारणों से स्वीकार नही हो सकता-

            (i)    यह कि जातिवादी, सम्प्रदायवादी व क्षेत्रवादी नेताओं की अगर उक्त भविश्यवाणी सही होती तो यूरोप व अमरीका जैसे उन राश्ट्रों में आर्थिक विशमता खत्म हो गई होती, जहां सामाजिक न्याय की व्यवस्था स्थापित हो चुकी है। इन राश्ट्रों में वर्णव्यवस्था जैसी समाज व्यवस्था नही है। इन अर्थो में वहां सामाजिक समता कायम हो चुकी है। फिर भी आर्थिक समता कायम नही हुई। इससे साबित होता है कि आर्थिक समता के लिए अलग से प्रयास करना होगा, केवल सामाजिक न्याय के वष में नही है कि वह आर्थिक न्याय का परिणाम भी दे सके। अत: उक्त निश्कर्श या तो वोटरषिप व आर्थिक न्याय के खिलाफ षाजिस है, या अज्ञानता है। दोनों ही स्थितियों में उक्त भविश्यवाण्ाी को सच नही माना जा सकता।

            (ii)    यह कि वर्णव्यस्था का सवाल उठाकर वोटरषिप का प्रस्ताव खारिज नही किया जा सकता। क्याेंकि वर्णव्यस्था षास्त्रीय अर्थो में किसी के लिए पीड़ादायक नही है। यह केवल व्यावहारिक अर्थो में ही पीड़ादायक है। व्यवहार में वर्णव्यवस्था जन्माधारित है। अगर यह कर्माधारित होती तो स्वीकार्य होती। यह वर्णव्यवस्था भी बारीकी से देखे तो दो तरह की है। एक है- सामाजिक वर्ण व्यवस्था, जिसके कारण बाहृमण के बेटे को जन्म लेते ही सम्मान मिल जाता हैं। गांवों में इनके कम आयु के बेटे को नीची जाति का बुजुर्ग भी पहले नमस्कार करता है। इसके विपरीत नीची जाति में जन्म लेने के कारण ऐसे बाप के बेटे को जन्म लेते ही अपमान का आरक्षण मिल जाता है। गांवों में उसे आजीवन चारपाई से नीचे जमीन पर बैठने को कहा जाता है। दूसरी है आर्थिक वर्णव्यवस्था, जिसके कारण अमीर के बच्चे को बिना कर्म किये सरकार उत्ताराधिकार कानूनों से अमीरी नवाजती है। गरीबों के बच्चों के साथ अन्य लोग आर्थिक बलात्कार कर सकें-इसके लिए सरकार उन्हें भूखे पेट रखती है।जिस प्रकार आज की सरकार अमीर के बेटे को जन्म लेते ही अमीर बनाती है,    व गरीब के बेटे को जन्म लेते ही गरीब बना देती है। उसी प्रकार पहले सामंतो के बेटे सामंत बनते थें, व खेतिहर मजदूरों के बेटे खेतिहर मजदूर बनते थे। वस्तुत: यह आर्थिक वर्णव्यस्था थी। इसी वजह से सामंत पीढ़ी दर पीढ़ी सामंत बने रहते थें, और उनके खेतों में काम करने वाले भी पीढ़ी दर पीढ़ी उनके मजदूर बने रहते थे। चूंकि सामंत का बच्चा देखता था कि मेरे पिता जी मजदूर को डांटते-फटकारते-गाली-गलौज करते, मारते-पीटते थे, उसे अपमानित करते थे। इसलिए यही आदत सामंत के बेटे को पड़ जाती थी। वह अपनी पीढ़ी  के मजदूरों को चारपाई के नीचे बैठाता, अपमानित करतामजदूर को अपने छोटे बच्चों से भी नमस्ते करने के लिए मजबूर करता था। वस्तुत: यह सामाजिक अपमान वह इसलिए कर पाता था क्योंकि वह जमीन का मालिक था, और उस जमीन पर काम करके पेट भरना मजदूर की मजबूरी थी।

       स्पश्ट है कि अगर आर्थिक वर्ण व्यवस्था के कारण सामंत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जमीन न मिल रही होती, तो वह खेत में मजदूरी करने वाले मजदूर का पीढ़ी-दर-पीढ़ी मान-मर्दन न कर पाता। यह मान-मर्दन तो दर्द जैसा है, जबकि बीमारी आर्थिक वर्ण व्यवस्था की वह परम्परा थी, जिसके कारण बाप की सम्पदा बेटे को बिना कुछ किये-धरे ही मिल जाया करती थी। आज तक इस दर्द के खिलाफ तो काफी आन्दोलन हुए, लेकिन दर्द की वह लहर जिस बीमारी के कारण्ा उठ रही है, उस बीमारी के खिलाफ कोई आन्दोलन नही हुआ। इसीलिए आज भी अरबपती का बेटा बिना कुछ किये-धरे ही उत्ताराधिकार के कानून से अरबपती बन रहा है, और मजदूर का बेटा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी मजदूर बन रहा है।

       दलित समाज के अपमान और मजदूर के अपमान मे ज्यादा अन्तर नही है। यह अपमान आज भी बदस्तूर जारी है। और इस अपमान के पीछे समाज की परम्परा भी नही है। संसद व विधायिकाओं द्वारा बनाया गया विधिवत उत्ताराधिकार का कानून है। इस विष्लेशण से स्पश्ट है कि वर्ण व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन चलाने वाला केवल वही व्यक्ति ईमानदार हो सकता है, जो दोनो तरह की वर्ण व्यवस्था उखाड़ने की बात करता हो। अगर वह दर्द के खिलाफ भाशण्ा दे और बीमारी की अंदर ही अंदर रक्षा करे, तो समझिए कि वह षाजिस करने वाला ऐसा डाक्टर है जो चाहता है कि बीमारी ठीक न हो, बस दर्द ठीक हो और उसकी दुकान चलती रहे। अगर ऐसे नकली व षाजिसकर्ता डाक्टर वोटरषिप के प्रस्ताव का यह कहकर खिलाफत करेंगे कि सामाजिक न्याय कायम होने पर आर्थिक न्याय स्वयं स्थापित हो जायेगा, तो यह नकली दुकान ज्यादा दिन नही चल सकती। पैसे की प्रचण्ड षक्ति के सामने ये लोग धूल की तरह उड़ जायेगें। बचेंगे वही जो सामाजिक वर्ण व्यवस्था भी उखाड़ना चाहते हों, आर्थिक वर्ण व्यवस्था भी। वोटरषिप आर्थिक वर्ण व्यवस्था व सामाजिक वर्णव्यवस्था दोनो को उखाड़ने का उपाय है।

            iii       यह कि क्षेत्रवादी नेतागण वोटरषिप की खिलाफत इसलिए नही कर पायेगे कि क्षेत्र के आधार पर वोटरषिप देने में कोई भेदभाव नही करने का प्रस्ताव है। वे जिस क्षेत्र की वकालत करते हैं उस क्षेत्र में रहने वालों को भी वोटरषिप की रकम प्राप्त होने का प्रस्ताव है। वही बात भाशावादी नेता लोगों पर भी लागू है। इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिये इस याचिका के विकास संबंधी अध्याय - 3.2(क) का संदर्भ लें।

            (iv)   यह कि जन्माधारित वर्ण व्यवस्था द्वारा निर्मित उर्ध्वाधर सामाजिक व्यवस्था के न्यायिक प्रबन्धन के लिये अन्त्योदय नीति कि तहत राजनैतिक ढ़ाचे का ताना-बाना बना कर सामाजिक विशमता के दुश्प्रभावों को प्रभावषाली तरीके से रोंका जा सकता है। इस विशय में विस्तष्त जानकारी के लिए अंतर्राश्ट्रीय परिस्थतियों व कार्यान्वयन सम्बंधी इस याचिका के अध्याय - 9.3 का संदर्भ ग्रहण करें।

       उक्त (i) से (iv) के विष्लेशण के आधार पर कहा जा सकता है कि उक्त तर्क पेष करके स्वाभिमानवादी नेता गण वोटरषिप की खिलाफत करने में सफल नहीं हो सकेंगे। चूंकि ये लोग असफल ही होंगे। इसलिये वोटरषिप के कारण जातीय दीवारें कमजारे पड़ेगी, व वोटरषिप का प्रस्ताव कार्यान्वित करना संभव होगा।

(च) घाटे के बजट में वोटरषिप असंभव (?)

       बजट के घाटे की तरफ इषारा करके वोटरषिप के प्रस्ताव के कार्यान्वयन को निम्नलिखित आधारों पर असंभव नही ठहराया जा सकता-

           (i)    यह कि आजादी से पूर्व लंदन से चलाई जा रही भारत सरकार का बजट फायदे का बजट होता था। आजादी मिलने पर जान बूझकर घाटे के बजट नीति बनाई गई थी। जिससे कोई व्यक्ति भारत सरकार को ''इड़िया कम्पनी'' न कह दे। यह नीति अभी भी चल रही है। पैसा कम होना इसका कारण नही है। जैसा कि बहुत से लोगो को गलतफहमी है।

            (ii)    यह कि वोटरषिप की रकम सकल घरेलू उत्पाद से आना है, न कि सरकार के वर्तमान राजस्व बजट से।

       उक्त दोनों आधारों से साबित होता है कि बजट के घाटे का तर्क वोटरषिप के खिलाफ बहुत सतही तर्क है। इसके आधार पर इस प्रस्ताव को असंभव नही कहा जा सकता।

(छ) गले नहीं उतरती (?)

       वोटरषिप सबको मिल सकेगी, यह बात गले नही उतरती, केवल इतनी सी बात पर इस प्रस्ताव के कार्यान्वयन को असंभव नही कहा जा सकता, क्योंकि-

            (i)    यह कि दुनिया में तब भी विष्वास नही हुआ था, जब किसी वैज्ञानिक ने वायुयान का आविश्कार करके लागों को उसमें बैठने को कहा। लोग विष्वास नही किये कि इसमें बैठकर आदमी उड़ भी सकता है। वायुयान बना, उड़ा। असंम्भव दीखने वाली बात संभव हो गई।

            (ii)    गैलीलियों नाम के वैज्ञानिक ने कहा कि धरती गोल है, और यह स्वयं सूरज के चारो तरफ घूमती है। लोगों ने कहा कि चपटी है, और सूरज इसके चारो तरफ घूमता है। पूरब में उगता है, पश्चिम में डूब जाता है। आज भी लोगों को धरती चपटी दिखाई देती है, लेकिन लोगों को अपनी आंख पर से भरोसा उठ गया। धरती को गोल मानना पड़ा। आंख से चपटी दिखती है, दिमाग से गोल। पढ़े-लिखे लोगों को विष्वास करना पड़ा।

            (iii)   किसी ने सोंचा नही था कि हजारों मील दूर बैठा आदमी आंख से दूर का कोई दृष्य देख जा सकेगा, लेकिन टेलीविजन ने उसे दिखा दिया व रेडियों ने उसकी आवाज इतनी दूर कानों तक पहॅुचा दिया।

            (iv)   मोबाइल टेलीफोन व इण्टरनेट- दोनो ने असंभव दीखने वाले सपने को संभव कर दिखाया। सैकड़ों मील दूर बैठे दो लोग एक दूसरे के मन की बात जान जायेंगे, मोबाइल ने इसे संभव कर दिखाया।

            (v)    कैप्लर नाम के वैज्ञानिक ने भविश्यवाणी किया कि 10.2 किलोमीटर प्रति सेकेण्ड की गति से ऊपर फेका गया पिण्ड नीचे नही गिरेगा, आसमान में ऊपर ही चला जायेगा। लांचर के आविश्कार के बाद जब उसकी भवश्यिवाणी जांची गई जो सत्य निकली। लांचर से उपग्रहों को आसमान में फेका गया वे धरती पर वापस नही गिरे। आसमान में ही रह गये। जिसकी वजह से रेडिया-टीवी-मोबाइल व इण्टरनेट आज चल रहे है। पत्थर ऊपर फेंकने से ऊपर ही रह जायेगा, यह असंभावना संभव हो गई।   

            (vi)   यह कि उक्त बिन्दु (i) से (v) तक के वैज्ञानिक आविश्कारों के साथ-साथ कई राजनैतिक आविश्कार भी हुये जिसे उस समय के लोग संभव नही मानते थे। जैसे अधिकांष लोगों को भरोसा नही था कि राजा की गद्दी पर उसके बेटे की बजाय प्रजा का बेटा बैठ जायेगा। लेकिन चुनावों की परिपाटी ने यह साबित कर दिखया। बहुत कम लोगों ने साेंचा था कि जिस अंग्रेजी साम्राज्य में सूरज ही नही डूबता, वह साम्राज्य सिमट कर एक छोटे से देष में समा जायेगा। किन्तु ऐसा हुआ। अंग्रेंजों ने भारत छोड़ा, अपने वतन गये। इसी तरह किसी ने नही सोचा था कि सीधे ग्राम प्रधानों को सरकार पैसा देगी, व गांव का विकास स्वयं उस पैसे से गांव वाले ही करेंगे। लेकिन ऐसा हुआ।

            (vii)   वस्तुत: जो व्यक्ति जिस क्षेत्र की जानकारी नही रखता, वह उस क्षेत्र में होने वाली नई खोज या नये अविश्कार पर जल्दी भरोसा नही करता। वोटरषिप का प्रस्ताव लोकवित्ता के क्षेत्र में ऐसा ही नया अविश्कार ही है, किन्तु समय के साथ-साथ जैसे अन्य चीजों पर भरोसा होता गया, उसी प्रकार वोटरषिप पर भी लोगो का भरोसा पैदा हो जायेगा।

            (viii)   कुछ लोगाें को वोटरषिप संभव तो लगता है लेकिन उचित नही लगता। ऐसे लोग एक षाजिस के तहत कहते है कि यह प्रस्ताव उनके गले नही उतरता। उनके गले तो उतरता है, लेकिन ऐसे लोग ऐसा प्रचार करके लोगों का ध्यान वोटरषिप की तरफ  से हटाना चाहते है।

            (ix)   यह कि बहुसंख्यक लोग यदि वोटरषिप के प्रस्ताव पर विष्वास करके अपना समर्थने देते हैं, तो इस प्रस्ताव के लागू हो जाने पर उनके जीवन में खुषियां छप्पर फाड़ कर उतरने लगेंगी। विष्वास  करने पर चूकि कोई नुकसान नही है, इसलिए लोग विष्वास करेंगे। व समर्थन देगें। गले न उतरने वाली बात ए.बी. संवेदी चेतना की स्वाभाविक अनुभूति है।

       उक्त बिन्दु (i) से (ix) के आधार पर साबित होता है कि अविष्वास स्थायी नही हो सकता।

(ज) वोटरषिप देने के लिये सरकार पैसा कहाँ से लाएगी (?)

       यह कि वोटरषिप की रकम देने के लिए पैसा नही है यह तर्क एक बेतुका तर्क है। क्योंकि इस याचिका में मतदाताओं को जन्मसिध्द आर्थिक अधिकार देने के लिए केवल राश्ट्र की औसत आय की आधी रकम ही देने का प्रस्ताव है। वस्तुत: कुछ लोग पैसे की कमी का बहाना बनाकर वोटरषिप के खिलाफ दुश्प्रचार करना चाहते हैं। वोटरषिप की रकम तत्वत: मतदाताओं की ही है, जिसे सरकार ने अन्यत्र रख रखा है। अत: वोटरषिप की रकम सरकार को देना भी नही ह,ै केवल वापस करना है। वोटरषिप की रकम मतदाताओं को वापस करने के लिए सरकार वित्ता के जिन स्रोतों का उपयोग कर सकती ह,ै उनकी जानकारी इस प्रकार है -

                (i)            यह कि वोटरषिप की रकम नागरिकों का साझाधन है (सार्वजनिक नहीं), जिसे नागरिकों की रजामंदी से सरकार ने कुछ नागरिकों को विषेश उपयोगी समझकर दिया है वोटरषिप की रकम उनसे वापस लेकर असली स्वामी के पास भेजना सरकार कार् कत्ताव्य बन गया है। साझे धन की विस्तृत जानकारी के लिए इस याचिका के  अध्याय - 12 साक्ष्य - चार का संदर्भ ग्रहण करें।

                (ii)           यह कि विषेश उपयोगी समझकर सरकार ने नागरिकों के साझे धन की जो राषि कुछ विषेश लोगों को सौंपा था, वे लोग स्वयं को इस धन का स्वामी स्वयं समझ बैठे हैं, इसलिये इस धन का सार्वजनिक हित में उपयोग करने की बजाय इसका उपयोग सौन्दर्यीकरण, वैभव और विलास बढ़ाने में कर रहे हैं।

                (iii)          यह कि उक्त साझे धन का निजी हित में उपयोग होना इसी तरह का मामला है जैसे बैंक में जमा धन राषि को बैंक का कैषियर अपना निजी धन समझ कर अपनी हवेली बनाने में खर्च करने लगें, व सरकार एसे कैषियर की मदद इसलिये करे कि उसने उस रकम का एक छोटा सा टुकड़ा 'कर' के रूप में सरकार को दे दिया है।

                (iv)          यह कि उक्त परिस्थिति में सरकार द्वारा प्राप्त कर राषि को रिष्वत के दर्जे की राषि ही कहा जा सकता है। भोगी-विलासी लोग यह राषि देने वाले हैं व सरकार इस राषि को लेने वाली है।

                (v)           यह कि कर के नाम पर उक्त रिष्वतखोरी को देखते हुए, नागरिकों के साझे धन के दुरुपयोग को देखते हुए, नागरिकों के लगातार उठते हुए षैक्षिक स्तर को देखते हुए, सार्वजनिक विकास के क्षेत्र में लगे लोगों के गिरते चरित्र को देखते हुए याचिकाकर्तागण एक नागरिक समुदाय की हैसियत से  समाज के तथाकथित उपयोगी 'विषेश' लोगों के नाम पर, व विकास के नाम पर वोटरषिप की रकम खर्च करने के लिए अतीत में गई पॉवर ऑफ अटार्नी को खारिज करते हैं और अपनी रकम अपने पास वापस करने का सरकार से दर्खास्त करते हैं।

                (vi)          यह कि भारत संघ के आर्थिक फैसलों को लोक इच्छा से संचालित करना संभव हो इसके लिये सरकार से अपेक्षा है कि वह लोकतंत्र की रक्षा व उसके विकास के लिए एक नया कर लगाये, व इस कर के माध्यम से नागरिकों के साझे धन का कम से कम आधा हिस्सा नकद रकम के रूप में उनके जन्मना आर्थिक अधिकार के रूप में वापस करें। इस याचिका के माध्यम से इस कर को 'लोकतंत्र कर' कहे जाने का प्रस्ताव करते हैं।

                (vii)         यह कि असीमित राषि का उत्ताराधिकार देने का सीधा सा अर्थ है, कि बहुसंख्यक लोगों को इस अधिकार से वंचित करना। इसलिये उत्ताराधिकार सीमांकन कानून बनाकर जो सम्पत्तिा सीमा से अधिक  आंकी जायेगी, उस सम्पत्तिा की बिक्री की रकम वोटरषिप की रकम ही होगी क्योंकि यह नगारिकों का साझा धन ही है जो उत्ताराधिकार के कानून के कारण उनके हाथों से निकल गया था। इस विशय में विस्तृत जानकारी के लिए इस याचिका के अध्याय - 9.1 का संदर्भ लेँ।

                (viii)        लोकतांत्रिक मूल्य आर्थिक दृश्टि से किसी को अधिकार में कमतर और किसी को बेहतर नही मानते, किन्तु साझे धन का एक हिस्सा उन लोगों को खर्च करने की पॉवर आफ एटार्नी देते हैं, जो लोकतान्त्रिक मूल्यों के अनुसार उत्पादन, वितरण, उपभोग व विनिमय की व्यवस्था चलाने की योग्यता रखते हैं। इसी पॉवर आफ अटार्नी के कारण एक लोकतांत्रिक समाज में आर्थिक विशमता को मान्यता मिलने का आभासी प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ता है, जिसे गलती से कुछ लोग असली वस्तु समझ लेते हैं तथा पॉवर आफ अटार्नी के द्वारा प्राप्त आर्थिक अधिकार को अपना वंषानुगत विषेशाधिकार समझ लेते हैं। बैंक में धन जमा करने वाला कई पीढ़ियों तक उस धन की  निकासी न करे तो बैंक के मालिक को यह मेहनत से कमाया हुआ महसूस होने ही लगेगा और बैंक स्वामी का बेटा उत्ताराधिकार कानून का हवाला देकर इस रकम पर अपने स्वामित्व की दावेदारी प्रस्तुत कर दे, तो कोई आष्चर्य नहीं करना चाहिये। प्रति व्यक्ति औसत सम्पत्तिा सीमा रेखा से ऊपर की सम्पत्तिा इसी तरह की नागरिकों की साझी सम्पत्तिा है लेकिन इस सम्पत्तिा पर काबिज व्यक्ति इसे अपनी निजी मिल्कियत मानकर इसका उपयोग कर रहे हैं, इसलिये ऐसे उपयोग को दुरुपयोग ही कहना होगा। निजी स्वामित्व में आभासी रूप से दिखाई पड़ने वाली सम्पत्तिा के औसत से ऊपर के हिस्से का जिस हद तक सम्पत्तिा स्वामी निजी हित में उपयोग कर रहा है, उस हद तक वह निजी उपभोग के बदले उस सम्पत्तिा पर कर देने के लिये जिम्मेदार है। कर की यह राषि वोटरषिप की राषि ही है। सम्पत्तिा कर के विशय में विस्तृत जानकारी के लिए इस याचिका के साक्ष्य - चार का संदर्भ ग्रहण करें।

                (ix)           यह कि नागरिकों के लिए अर्थव्यवस्था के उत्पादन व वितरण प्रणाली तकनीकि व मषीनों का प्रभाव समान रूप से नहीं पड़ रहा है। मषीनों का लाभ यह हुआ कि पैदावार बढ़ गई किन्तु इससे तमाम लोगों के हाथों  से काम छिन गया। काम छिनने से श्रम बाजार में श्रम की पूर्ति बढ़ गई, मांग गिर गई। परिणाम यह हुआ कि श्रम का बाजार मूल्य लगातार गिरता जा रहा है। इससे बहुसंख्यक नागरिकों की बस्ती में क्रय षक्ति का भयावह सूखा पड़ गया है। क्रयषक्ति के इस सूखे के कारण अधिकांष नागरिकों के लिए मषीन अभिाषाप बन गई है, क्योंकि उसके द्वारा किये गये अतिरिक्त उत्पादन को ऐसे नागरिक खरीद नही पा रहे हैं और न ही मषीन द्वारा पैदा किये गये फुरसत के क्षणों में ऐसे नागरिक अपने हिस्से का आनन्द ही ले पा रहे हैं। ऐसी परिस्थिति में यह उन लोगों का फर्ज बनता है कि जो लोग मषीन के कारण पैदा हुए फुरसत के क्षणों का अधिक मात्रा में आनन्द ले रहे हैं, और मषीन द्वारा की गई कमाई को निजी सम्पत्तिा मानकर अपने पास रख ले रहे हैं, ऐसे लोग मषीन के मारे हुए नागरिकों को मषीनी कर के रूप में क्षतिपूर्ति दें और इस कर को वोटरषिप की रकम के स्रोत के रूप में सरकार इकट्ठा करे।

                (x)            यह कि जल, जंगल, जमीन, खनिज, पर्णहरिम (क्लोरोफिल) आदि संसाधन प्रकृति प्रदत्ता है, और उत्पादन में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। जिस हद तक उत्पादन में इनका हिस्सा है उतने हिस्से के उपयोग पर सभी नागरिकों का जन्मसिध्द व बेषर्त अधिकार है। जो लोग सरकार की नीतियों से क्रय षक्ति से वंचित कर दिये जाते हैं, वे लोग प्राकृतिक उत्पादन के अपने हिस्से के उपयोग से भी वंचित कर दिये जाते हैं। इस उपभोग के बदले भी काम की षर्त उन पर थोप दी जाती है। यह आर्थिक गुलामी का लक्षण हैं, जिसमें क्रयषक्ति विहीन लोगों के हिस्से का उपभोग क्रयषक्ति धारकों द्वारा कर लिया जाता है, व क्रयषक्ति विहीन लोगों को रोटी प्राप्त करने के लिये कार्य की षर्त रख दी जाती है, यह कार्य बलात् कार्य की कोटि का कार्य है। ऐसे आर्थिक गुलामों को रिहा करना लोकतांत्रिक सरकार का परमर् कत्ताव्य है; अगर राज्य के नक्षे में इस पुनीत कार्य के लिये व्यापक संषोधन करना पड़े तो सरकार को हताष नहीं होना चाहिये।

                (xi)           यह कि सकल घरेलू उत्पाद के प्रकृति के हिस्से में एक मतदाता के हिस्से को निम्नलिखित कहानी से बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। राजा जी पार्क के नाम से उत्तारांचल परिक्षेत्र में जो जंगल है, उसमें एक महात्मा वृक्षों के नीचे रहता था, चिन्तन-मनन करके समाज व सृश्टि से संबंधित नियमों का सूत्र खोजता था। भूख लगी, तो रोज की तरह उसने ध्यान तोड़ा व खड़ा होकर अपने ऊपर सेब के वृक्ष से फल तोड़ने के लिए हाथ उठाया। जैसे ही उसने हाथ उठाया, वैसे ही जंगल की खुफिया सूचना के आधार पर वहाँ पास में ही छिपे वन दरोगा ने उस महात्मा की बांह पर एक जोरदार लाठी मार दिया। लाठी पड़ते ही महात्मा छटपटा कर जमीन पर गिर पड़ा और कराहते हुए बोला - ''बेटे! मुझसे क्या गलती हुई?'' दरोगा ने कोतवाल के अंदाज में गरजते हुए कहा - '' यह जंगल भारत सरकार का हो गया है। मैं वन दरोगा हूँ। तुम लम्बे समय से चोरी करते हो - सरकारी फलों की। इसलिये आज तुम्हारी चोरी पकड़ने के लिये हमने छापा मारा। देखो, तुम रंगे हाथ पकड़े गये। चलो मेरे साथ। अब तुम्हें जंगल में नहीं रहने देंगे।'' महात्मा की आंख से लाल-पीले दिखाई पड़ रहा था। थोड़ी देर में संभलकर बोला - ''बच्चा! मैं तो बचपन से ये फल तोड़ता आ रहा हूँ। यही हमारे जीवन का आधार है। क्या भारत सरकार नाम के किसी आदमी ने ये सारा जंगल खरीद लिया'' ? दरोगा ने कहा ''नहीं, अधिग्रहण कर लिया। कानून बनाकर इसे सरकारी जंगल घोशित कर दिया। अब तुम फलों की चोरी नहीं कर पाओगे। चलो, उठो यहाँ से हम तुम्हें गिरफ्तार करते हैं। दरोगा महात्मा की बाह पकड़कर घसीटने लगा और उसे गाड़ी में बैठाकर देहरादून के षहर में ले जाकर छोड़ दिया और बता दिया कि ये जो ठेले पर सेब देख रहे हो, अब इसे खाना। महात्मा दो दिन तक इस घटना के पीछे मौजूद सरकार व बाजार के नियमों का सूत्र खोजता रहा और भूखा रहा। तीसरे दिन अपनी जगह से उठा और पास में ही सेब लदे ठेले के पास पहुँचकर एक सेब उठाकर मुंह से लगाया। उसने सेब में दांत धंसाये ही थे कि ठेले के मालिक ने उसे पागल समझकर एक थप्पड़ मारा, सेब का अधकटा टुकड़ा खुद ब खुद मुंह के लारों के सहारे बाहर आ गया और जमीन पर गिर पड़ा। दर्द की मूर्छा से उबरते ही महात्मा ने कहा ''बच्चा! बन दरोगा नाम के एक सज्जन आये थे उन्होंने ही ये सेबें मुझे खाने को कहा था, उन्होंने कहा कि जंगल की सेब खाना चोरी है, यहां की सेब खाने को कहकर चले गये थे, तुम्हें हमसे तकलीफ क्यों हुई'' ? ठेलास्वामी ने एक 100 रुपये की नोट दिखाते हुए जवाब दिया- ''ये नोट लाओ पहले, फिर सेब मिलेंगे''। महात्मा ने पूछा - ''बेटे ये नोट कहाँ मिलते हैं ? ठेला स्वामी ने उत्तार दिया - ''वो सामने देखो गंदी नाली की खुदाई चल रही है, सामने ठेकेदार खड़ा है उससे जाकर एक फावड़ा मांगों, और दिन भर नाली खोदो तो षाम को वही ठेकेदार ये नोट देगा, फिर हमें नोट दोगे तो हम तुम्हें सेब देंगे।'' इस कहानी से निम्नलिखित निश्कर्श निकलते है - 

       पहला-भूख से पीड़ित महात्मा को सेब के बदले बाजार ने काम करने की षर्त रख दी, महात्मा श्रमिक बन गया। उसकी मानसिक उर्वरता कमजोर होती गई। उसका षरीर कृष हो गया।

       दूसरा :- यह कि उक्त कहानी से स्पश्ट है कि जंगल की सेब प्रकृति प्रदत्ता एक साझा सम्पत्तिा है।

       तीसरा :- यह कि इस साझी सम्पत्तिा के उपभोग के लिये कार्य करने की षर्त नही लगाई जा सकती।

       चौथा :- यह कि जंगल की इस सम्पत्तिा की खरीद-बिक्री व विनिमय के लिये मुद्रा का एक हिस्सा छापा जाता है।

       पांचवा :-  यह कि जंगल की उक्त सेब जैसे उत्पादन के विनिमय के नाम पर छपी मुद्रा वोटरषिप की रकम है, जिसमें सभी नागरिकों को समान हिस्सा प्राप्त करने का जन्मसिध्द अधिकार है।

       छठा :- यह कि जंगल की सेब के नाम पर छपी मुद्रा जब वोटरषिप के रूप में महात्मा को मिलेगी तो वह पुन: अपना खोजी कार्य प्रारंभ कर सकेगा, समाज का एक खोया वैज्ञानिक उसे वापस मिल जायेगा, समाज का होता हुआ सांस्कृतिक पतन फिर से उत्थान की तरफ अग्रसर होने लगेगा।     

       सातवां :- यह कि सरकार का यहर् कत्ताव्य है कि वह 'प्रकृति कर' लगाकर वोटरषिप की यह रकम इकट्ठा करें, व उसका वितरण सभी नागरिकों मे समान रूप से करे।

                (xii)          यह कि विनिमय व्यवस्था की किसी भी अर्थव्यवस्था के उत्पादन व वितरण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विनिमय की व्यवस्था अकेले बाजार की षक्तियों से चल नही सकती, सरकार के सहयोग की जरूरत पड़ती है। हर देष की अपनी एक केन्द्रीय बैंक होती है, जो उस देष की मुद्रा निर्गत करती है। नोट छापने वाली इस बैंक के अधिकारी को केन्द्रीय सरकार नियुक्त करती है। यह केन्द्रीय सरकार जनप्रतिनिधियों द्वारा बनायी जाती है। जनप्रतिनिधियों को यह अधिकार लोकसभा के गठन में मतदान (वोट) करने वाले नागरिक देते हैं। मतलब यह हुआ कि मुद्रा पर लिखा रहता है - ''मैं धारक को ..... रुपये अदा करने का वचन देता हूँ''। इसका असली अर्थ यह हुआ है कि केन्द्रीय बैंक का गवर्नर यह वचन सभी नागरिकों के प्रतिनिधि के तौर पर देता है। विनिमय की व्यवस्था से संबंधित कुछ और निश्कर्श इस प्रकार हैं -

       पहला :- यह कि केन्द्रीय बैंक, यानी भारत में रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया का गवर्नर धारक को जो कुछ रुपया अदा करने का वचन देता है, इस वचन को देने के लिए भारत के सभी नागरिक समान रूप से उसे अधिकृत करते हैं।

       दूसरा :- यह कि समाज के साझा प्रयास के बगैर व इस साझे प्रयास को कार्य रूप देने वाली संसद के बगैर मुद्रा निर्गमन का कार्य नही हो सकता।

       तीसरा :- यह कि उद्योग जगत द्वारा पैसा कमाने में जिस हद तक मुद्रा निर्गमन की भूमिका होती है उस हद तक के लाभ में राश्ट का एक-एक व्यक्ति हिस्सेदार होता है। लाभ के इस हिस्से का समान वितरण मतदाताओं में होना चाहिए।

       चौथा :- यह कि देष की सरकार, प्रदेष सरकारों, जनपदों-ब्लॉकों को उद्योग जगत के उक्त लाभ में से अपना-अपना हिस्सा मिल गया है, जबकि ग्राम प्रबंध समितियों, परिवार प्रमुखों और एक-एक नागारिक को उनका हिस्सा मिलना बाकी है। वोटरषिप की रकम वस्तुत: एक-एक नागरिक को मिलने वाला उसी तरह का हिस्सा है।   

       पांचवा :- यह कि नोट छापने का काम संसद व सरकार के बिना संभव नही है। प्रति पांच वर्श बाद नोट छापने वाली रिजर्व बैंक को नोट छापने के लाइसेंस का नवीनीकरण (रिनुअल) कराना पड़ता है। संसद के चुनाव में वोट देकर मतदाता रिजर्व बैंक के नोट छापने के लाइसेंस को रिनुअल करता है। चूंकि सरकार हर तरह के रिनुअल की फीस वसूलती है, इसलिए मतदाता भी नोट छापने के लाइसेंस का रिनुअल करने के एवज में रिजर्व बैंक से फीस वसूल सकते है। वोटरषिप की रकम वस्तुत: मतदाता को मिलने वाली यही फीस है। सरकार अपने को जन्म देने वाले मतदाताओं को इस फीस का नियमित भुगतान करने के लिए 'करैंसी टैक्स या विनिमय कर' के नाम से एक नया कर लगा सकती है, जो वोटरषिप कोश के लिए एक महत्तवपूर्ण वित्ताीय स्रोत होगा।

                (xiii)         यह कि इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिए इस याचिका के अध्याय -3.4(,ण) , 7(ज), 9.2 का अवलोकन करें।

      उक्त पैरा (i) से  (xiii)  तक के तर्कों, विष्लेशणों एवं सूचनाओं के आधार पर यह साबित होता है कि वोटरषिप की रकम के नियमित भुगतान के लिए पैसे का प्रबंध करना जरा भी मुष्किल नही है।

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