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                                                   खण्ड-तीन

 

2.  वोटरषिप के खिलाफ माक्र्सवादियों की आषंकाएं  

      (क) जमींन बंटे, पैसा नही (?)                      

      (ख) माक्र्सवादी सिध्दांत के अनुरूप नही, अत: माक्र्सवादियों का

         समर्थन असंभव (?)                          

      (ग) पूंजीवाद व वैष्वीकरण की रक्षा का उपाय (?)      

           (घ)  वोटरषिप से बहुराश्ट्रीय सरकार बनाने की मांग उठ जाएगी (?)    

 

2. वोटरषिप के खिलाफ माक्र्सवादियों की आषंकाएं

      (क)  जमीन बंटे, पैसा नही  -

       यह कि ''जमीन का बटंवारा''- वोटरषिप के प्रस्ताव का निम्नलिखित कारणों से विकल्प नही हो सकता-

            (i)         यह कि अब उत्पादन का प्रमुख साधन जमीन की बजाय मषीन बन गई है। इस विशय में विस्तार से जानने के लिए याचिका के अध्याय - 3  का संदर्भ लें।

            (ii)         यह कि विष्व व्यापार के अन्तर्राश्ट्रीय समझौतों के कारण कृशि क्षेत्र को संरक्षण दे पाना देषी सरकार के वष के बाहर की बात हो गई है। इसलिए खेती की छोटी जोतें अब इतनी कम लागत में उत्पादन नही कर सकतीं कि उतनी कीमत पर इन उत्पादों को अंतर्राश्ट्रीय बाजार में कोई खरीद सके।

            (iii)        यह कि खेती के योग्य व रहन-सहन योग्य जमीनों के क्षेत्रफल में जनसंख्या का भाग दे दें, तो जमीन का बहुत छोटा टुकड़ा एक आदमी के हिस्से लगता है। बिना पूंजी के उस जमीन के टुकड़े का कोई फायदा उसका स्वामी नही उठा सकता। जबकि वोटरषिप की रकम से वह अपनी मर्जी की जमीन खरीद सकता है।

            (iv)        जमीन भैस की तरह है, जिसको काटकर उसकी मांस की बोटी से दूध नही प्राप्त किया जा सकता, जबकि पैसा दूध की तरह है, उसका बंटवारा संभव है। 100 लोगों में 80 भैसें बराबर-बराबर नही बांटी जा सकतीं, जबकि 100 लोगों में 80 भैसों का दूध बराबर-बराबर बांटा जा सकता है।

       उक्त बिन्दू (i) से (iv) कि आधार पर स्पश्ट है जमीन का बंटवारा वोटरषिप      का विकल्प नही है।          

     (''माक्र्सवादी सिध्दांत के अनुरूप नही, अत: माक्र्सवादियों का समर्थन  असम्भव )

       ''माक्र्सवादी सिध्दांत के अनुरूप न होने के कारण माक्र्सवादी लोग विरोध करेंगे''- निम्नलिखित कारणों से यह एक गलत निश्कर्श है।

            (i)         यह कि वे माक्र्सवादी जो गरीबी उन्मूलन को अपना मूल मक्सद मानते हैं, राजसत्ताा को यह काम करने के लिए साधन मानते हैं; वे सभी वोटरषिप के प्रस्ताव का समर्थन करेंगे। विरोध केवल वही लोग करेंगे, जो सत्ताा को ही साध्य समझते हैं। वोटरषिप का मामला इन दोनों तरह के लोगों को दूध और पानी की तरह अलग-अलग कर देगा।

            (ii)         यह कि माक्र्स जैसा महान दार्षनिक आज होता, तो वह न्याय की कार्यवाही सम्पादित करने के लिए  केवल दो प्रतिषत संगठित क्षेत्र के मजदूरों को ही चिन्तन के केन्द्र में न रखता, अपितु मतदाताओं को ही चिंतन के केन्द्र में रखता। इसलिए वोटरषिप को माक्र्सवाद का समयानुवाद मानने में कोई गलती नही है। इसे माक्र्सवाद के प्रतिकूल सिध्द नही किया जा सकता।

            (iii)        यह कि कुछ माक्र्सवादियों के लिए गरीब समुदाय एक आथ्ीर्कि समुदाय की तरह नही होते, सामाजिक समुदाय की तरह होते हैं। गलतफहमीवष ऐसे माक्र्सवादी गरीबों की लड़ाई वैसे ही लड़ना चाहते हैं, जैसे विभिन्न जातियों व धर्मो के नेता लोग अपनी-अपनी जाति या समुदाय के ''स्वाभिमान की लड़ाई'' लड़ते है। वस्तुत: ''स्वाभिमानवाद'' कुछ माक्र्सवादियों की राजनिति में भी मौजूद रहता है। जैसे जाति व सम्प्रदायों के स्वाभिमानवादी नेता अपनी निजी आर्थिक उन्नति व अपने समुदाय की काल्पनिक व आभासी सामाजिक उन्नति के  काम में लगे रहते हैं वैसे ही स्वाभिमानवादी माक्र्सवादी भी अपनी निजी आर्थिक उन्नति व गरीबों के आभासी स्वाभिमान को बढ़ाने में लगे रहते हैं। दोनों ही तरह के स्वाभिमानवादियों को यह समझ में नही आता कि जिस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति खराब है, उसका किसी तरह स्वाभिमान सुरक्षित नही रह सकता; अन्य लोग उसका मान मर्दन करेंगे ही। ऐसे लोगों के सम्मान की रक्षा केवल इसलिए नही हो सकती है कि ''उनके जाति, धर्म या गरीबों का नेता सत्ताासीन है''। ऐसे राजनीतिज्ञ अपने चेहरे में सबका चेहरा देखने की ईमानदार गलतफहमी के षिकार होते है। ऐसे लोग अपने स्वाभिमान में सबके स्वाभिमान का दर्षन करते है। किन्तु ये सब ऐसे राजनीतिज्ञ साजिषन नही करते; अपितु ईमानदारी में उन्हें ऐसा ही समझ में आता है।

            (iv)        चुनाव में भागीदारी या चुनावी व्यवस्था में किसी तरह की आस्था का प्रदर्षन, भी वोटरषिप की तरह ही माक्र्सवादी सिध्दांतों से मेल नही खाता। यदि रणनिति के तौर पर चुनावों में भागीदारी करना उचित है, तो रणनीति के तौर पर ही सही माक्र्सवादी लोग वोटरषिप के प्रस्ताव का समर्थन अवष्य करेंगे।

            (v)         यह कि भारत जैसे देष में आर्थिक न्याय का कोई कार्यक्रम इसलिए सफल नही हो पाता, कि आर्थिक अत्याचार करने वाले सम्पन्न लोग जातिवादी व सम्प्रदायवादी स्वाभिमान की कथित लड़ाई लड़ने वाले नेताओं को चंदा देकर समाज को टुकड़ों-टुकड़ों में तोड़ देते हैं। जिससे आर्थिक हितों के आधार पर गोलबन्दी संभव नही हो पाती। वोटरषिप के प्रस्ताव में प्रस्तावित नकद रकम के प्राप्त होने की सम्भावना को देखने पर लोगों के सामने अपनी जाति-सम्प्रदाय के नेता की अमीरी और स्वयं अपनी अमीरी में से किसी एक पक्ष में खड़ा होने की नौबत आ जाएगी। इससे समाज का आर्थिक धु्रवीकरण हो जाएगा, जो मर्ाक्सवादी राजनीति की परम आवष्यकता है। इसका सामाजिक परिणाम यह होगा की समाज में जातीय या साम्प्रदायिक जहर कम हो जाएगा और राश्ट्रीय एकता मजबूत होगी।

       उक्त पैरा (i)  से  (v)  तक के विष्लेशण से साबित होता है कि वोटरषिप की खिलाफत में आने पर माक्र्सवादी नेताओं पर गरीबों के नकली वकील होने का आरोप लगेगा, इसलिए रणनीति के तौर पर ही सही माक्र्सवादी लोग वोटरषिप के मिषन को आगे बढ़ाने के लिए काम अवष्य करेंगे।

(ग) पूंजीवाद व वैष्वीकरण की रक्षा का उपाय -

      यह कि वोटरषिप के प्रस्ताव को ''पूंजीवाद की रक्षक योजना'' निम्नलिखत कारणों से नही माना जा सकता-

            (i)         यह कि पूंजीवाद का मूल स्वभाव पूंजीपति का सम्मान करना है, जबकि वोटरषिप का सिध्दांत पूंजीविहीन मतदाताओं का भी सम्मान करता है। उनको नियमित कुछ राषि प्राप्त करने का अधिकारी मानता है।

            (ii)         यह कि पूंजीवाद बाजार व्यवस्था को हथियार बनाकर श्रमिक को अपने श्रम की सौदेबाजी करने से वंचित कर देता है और श्रमिकों के साथ आर्थिक बलात्कार करता है। मतदाताओं को मिलने वाली वोटरषिप की नियमित रकम श्रमिक को रोटी व आत्मरक्षा की गारंटी दे देगी। इस आमदनी के कारण वह कहीं भी काम करने से पहले अपने परिश्रम की सौदेबाजी करेगा, और श्रम का न्यायिक मूल्य उसे प्राप्त हो जायेगा। श्रम की सौदेबाजी का सरकारी अवसर मिलते ही पूंजीवाद का मूल अत्याचार असफल हो जायेगा।

            (iii)        यह कि वोटरषिप मिलने पर सभी मतदाता ट्रेड यूनियन में वोटरषिप की रकम बढ़वाने के लिए उसी तरह भर्ती होंगे, जैसे आज संगठित क्षेत्र में मजदूर भर्ती होते है। इस तरह ही ट्रेड यूनियन का स्वरूप बदल जायेगा, व सदस्यता 50 गुना बढ़ जाएगी।

            (iv)        यह कि श्रम की सौदेबाजी का मौका मिलते ही मजदूरी की दरें बढ़ जायेंगी, इससे श्रम कानूनों का और ट्रेड यूनियन संगठनाें का मक्सद पूरा हो जायेगा। श्रम कानूनों और ट्रेड यूनियन संगठनों का लक्ष्य जिस अनुपात में पूरा होता जाएगा, उस अनुपात में पूंजीवादी अत्याचार कमजोर होता जाएगा।

            (v)         यह कि पूंजीवाद वास्तविक मांग को अप्रभावी मांग कह कर अत्याचार की षक्ति हासिल करता है और केवल प्रभावी मांग के लिए ही उत्पादन करता है। वोटरषिप से हुई आय से जनता की वास्तविक मांग को भी प्रभावी मांग का दर्जा मिल जाएगा। इससे पूंजीवादी अन्याय की चूड़ी ही मिस हो जाएगी।

       उक्त पैरा (i) से (v) तक के विष्लेशण से स्पश्ट है कि यह निश्कर्श बेबुनियाद है कि-''वोटरषिप के कारण लोगों की आर्थिक घुटन कम हो जाएगी, वे पूंजीवादी पूंजीपतियों को मारने-मरने पर उतारू नही हाेंगे, परिणामस्वरूप पूंजीवाद चिरस्थायी हो जाएगा''। सच्चाई यह है कि इससे लोगों में अपने साथ

(घ) वोटरषिप से बहुराश्टी्रय सरकार की मांग उठ जाएगी-

       यह कि-''वोटरषिप की रकम बढ़वाने के लिए बाद में लोग बहुराश्ट्रीय सरकार के गठन की मांग करने लग जायेंगे। अभी बहुराश्ट्रीय कम्पनियों से तो निजात मिली ही नही थी, बहुराश्ट्रीय सरकार पैदा होने का नया खतरा पैदा हो जायेगा। इसलिए बहुराश्ट्रीय नागरिकता, बहुराश्ट्रीय षासन-प्रषासन के बारे में इस याचिका की याचनाएं वैष्वीकरण के हाथ मजबूत करेंगे''-इस आधार पर वोटरषिप का प्रस्ताव निम्नलिखत कारणों से खारिज करना संभव नही है।

            (i)         यह कि अपने दक्षिणपंथी आर्थिक चिंतन के कारण गांधीवादी लोग वैष्वीकरण की खिलाफत अपने प्राकृतिक स्वभाव के कारण कर सकते हैं, किन्तु वैष्वीकरण माक्र्सवादी व्यक्ति के लिए सैध्दातिक विरोध का कारण नही हो सकता। क्योंकि -''दुनिया के मजदूरों एक हो'', यह वैष्वीकरण का ही माक्र्सवादी नारा है।

            (ii)         यह कि माक्र्सवादी लोग वैष्वीकरण मात्र की खिलाफत नही करते, अपितु केवल बाजार के वैष्वीकरण की खिलाफत करते हैं। अगर मजदूरों की एकता का वैष्वीकरण होता, तो माक्र्सवादी लोग इसका समर्थन करते। अत: वैष्वीकरण के स्वरूप पर विवाद है, वैष्वीकरण पर नही।

            (iii)        यह कि वैष्वीकरण का विरोध करके वर्तमान वैष्वीकरण के खतरों से बचा नही जा सकता, गत दो दषकों के अनुभव से यह बात साबित हो चुकी है। वर्तमान वैष्वीकरण के खतरों से बचने का एक ही उपाय है कि वैष्वीकरण की न्यायिक रूपरेखा तैयार करके उसके कार्यान्वयन का प्रयास किया जाये। इसलिये वैष्वीकरण का विरोध करने वाला स्वयं वैष्वीकरण को समझने में भ्रमित है, वह अतीत के षब्दकोश में नवीन आविश्कार खोजने की भूल कर रहा है। इस बारे में विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय पांच का संदर्भ ग्रहण करें।

            (iv)        यह कि पूंजीवाद और वैष्वीकरण को समानार्थी और सम परिणामदायक समझने की भूल नही करना चाहिए। बाजार का वैष्वीकरण होगा, तो आथ्ीर्कि अन्याय बढ़ेगा। राज्य का वैष्वीकरण होगा, तो आर्थिक न्याय बढेग़ा। बाजार का क्षेत्रीयकरण होगा तो आर्थिक न्याय बढ़ेगा, राज्य का क्षेत्रीयकरण यानी छोटे-छोटे राज्य बनेंगे तो आर्थिक अन्याय बढ़ेगा। ये सूत्र भौतिक विज्ञान के सूत्रों जैसे अकाटय हैं। इन निश्कर्शों से स्पश्ट है कि बाजार का वैष्वीकरण होगा तो पूंजीवाद मजबूत होगा, राज्य का वैष्वीकरण होगा तो उसकी मनमानी पर लगाम लगेगी। राज्य के वैष्वीकरण के स्वरूप को समझने के लिए इस याचिका के अध्याय 9.3 का अवलोकन करें।

            (v)         यह कि गैट समझौते द्वारा बाजार के वैष्वीकरण के कारण बिगड़ गये विष्व के षक्ति संतुलन को गैप समझौते द्वारा फिर से कायम किया जा सकता है। जैसे लोहा लोहे से कटता है, वैसे ही एक तरह के वैष्वीकरण की मनमानी दूसरे तरह के वैष्वीकरण द्वारा ही रोकी जा सकती है। गैप समझौते के बारे में, वैष्वीकरण की वैकल्पिक रूप रेखा के बारे में और ज्यादा जानने के लिए इस याचिका के अध्याय -9.2(च),9.3 और अध्याय-12 का अवलोकन करें।

       उक्त पैरा (i) से (v) तक की सूचनाओं व विष्लेशण से साबित होता है कि वैष्वीकरण मात्र के विरोध का कोई औचित्य नही है, वोटरषिप वैष्वीकरण के अत्याचारी रूप को परिवर्तित करके उसका न्यायिक स्वरूप पैदा कर देगा। इसलिए वैष्वीकरण से पीड़ित लोगों के लिए वोटरषिप का प्रस्ताव समर्थन के योग्य एक विशय है।

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