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खण्ड-तीन

6.  गरीबी उन्मूलन के अन्य विकल्पों की समीक्षा 

  1. वर्तमान सरकारी तंत्र                                              

  2.  न्यूनतम जरूरतों की गारंटी                      

  3.  गरीबों को भत्ता                               

  4.  गरीबों को अमीरों की दया पर छोड़ना             

  5.  गरीबों की तानासाही                            

  6.  गांधीवादी उपाय                               

  7.  कल्याणकारी लोकतंत्र                          

  8.    राजषाही की वापसी                                              

  9.  विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था                          

 

अध्याय - छह

गरीबी उन्मूलन के अन्य विकल्पों की  समीक्षा

       वोटरषिप का प्रस्ताव कार्यान्वित कर देने से ही गरीबी नाम की लाइलाज बीमारी का सदा-सदा के लिए उन्मूलन हो सकता है, अन्य विकल्प समर्थ नही है। इस निश्कर्श के आधार निम्नवत है-

 1. सरकारी तंत्र की समीक्षा

            (i)         यह कि राजषाही में राजा के अलावा अन्य लोगों के परिवार राजपरिवार के सेवक हुआ करते थे। जनसंख्या व उत्पादन के मानवीय संसाधनों को देखते हुए, गरीबी उन्मूलन की बात कोई सोंच भी नही सकता था। हलांकि इसके बावजूद समकालीन धर्मग्रंथ राजा का यहर् कत्ताव्य बताते हैं कि वह प्रजा के चूल्हे पर नजर रखे-कि प्रजा षाम को रोटी खा रही है कि नहीं।

            (ii)         यह कि सामंतषाही मेंं सामंतों के परिवार की सुख-सुविधायें ही साध्य थी, षेश लोग उन परिवारों के लिये सुख-सुविधा पैदा करने वाले साधन थे। जैसे बैल किसान के लिए अन्न पैदा करने वाला साधन होता है। इसलिए सामंतषाही में प्रजा की कीमत बैल, भैस, गधा, खच्चर, ऊंट जैसे पालतू पषुओं से अधिक नही थी। ऐसे समाज व्यवस्था में गरीबी उन्मूलन का सपना भी नही देखा जा सकता था।

            (iii)        यह कि जब समाज संचालक सत्ताा पर से वंषानुगत परम्परा खत्म करके प्रजा में व परिवारों में राजा की खोजबीन षुरु हुई तो राजषाही का खात्मा हुआ, प्रजाषाही प्रारंभ हुई। इस अवस्था में गरीबी उन्मूलन व आर्थिक विशमता पर अंकुष की बात इसलिये सामने आई कि एक तो मषीनों का उद्विकास चालू होने से उत्पादन बढ़ने लगा; दूसरे, राजा को ढूंढने के लिए गरीब प्रजा के घरों में जाने की नौबत पैदा हो गई। अगर प्रजा इतनी गरीब होगी कि उसके रहने को घर न हो, पहनने को कपड़ा न हो, खाने को रोटी न हो, रोगों से बचने को दवा का पैसा न हो, अपने को अभिव्यक्त करने के लिए षिक्षा का पैसा न हो- तो राजा को ढूंढ़ना ही मुष्किल हो जाता। क्योंकि तब कोई अधनंगा, कीचड़ में सना, कोई साफ-सुथरा आदमी देखकर बिल्ली की तरह छिप जाने वाला, हड्डियों में जकड़ा, परिचय देने और पाने के लिये मोहताज, किसी दुर्गंन्धित बस्ती की टूटी झोपड़ी के सामने कोई राजा दिखाई पड़ जाता तो उसे पहचानना मुष्किल था। इसलिए प्रजातंत्र में प्रजा को सिध्दांत रूप में राजा मानने की परम्परा षुरू हुई और राजा को सरकार कहा गया, और उसे सेवक का दर्जा दिया गया। समाज की सम्पन्नता की इस अवस्था में गरीबी उन्मूलन की बात आवष्यक हो गई, क्योंकि कोई ऐसा घर न बचे, जिसमें पैदा हुए राजा को केवल इसलिए न ढूंढ़ा जा सके, कि वह मैला-कुचैला-अषिक्षित-गूंगा जैसा, और साफ-सुथरे ढूंढ़कर्ताओं की पहुंच से दूर कहीं दुर्गंन्धित बस्ती में या जंगल में रहता हो।

            (iv)        यह कि प्रजातंत्र की षुरुआत से पूर्व सेना-पुलिस के बाहुबल की सत्ताा व पैसे की सत्ताा अलग-अलग नही थी, राजा ही दोनों तरह की षक्तियों का स्वामी था। प्रजातंत्र की षुरुआत होने पर ये दोनो षक्तियां अलग-अलग हो गईं। राजा ने राजकाज की सुविधा को देखते हुए सम्पति व पैसे की धरोहर जिसे दे रखा था, राजषाही खत्म होते ही इन लोगों ने इस सम्पति का स्वामी प्रजा को मानने की बजाय स्वयं को मान लिया। यह बेइमानी कुछ लोगो ने सोंच-समझ के किया और कुछ लोगों को यह सम्पति अपने पिता से विरासत में प्राप्त हुई थी, इसलिए परम्परा का हवाला देकर स्वयं को इसका स्वामी मान लिया। किन्तु इन लोगों ने जानबूझ कर बेइमानी नही किया। राजषाही के खात्मे के बाद कुछ दिन तक अफरा-तफरी रही। इस अवधि में सम्पत्तिाधारी लोगों ने अपना मनपसंद व्यक्ति प्रजापसंद व्यक्ति कहकर राजा बनाया और उससे प्रषासनिक अफसर नियुक्त करने को कहा। यह राजा चूंकि सम्पत्तिावानों द्वारा बनया गया, इसलिए इसने पैसे वालों की अधीनता स्वाभाविक रूप में मान लिया। उसकी यह हिम्मत नही पड़ी कि उसके पूर्व के राजा ने राज्य की जो सम्पत्तिा राजकाज की सुविधा के लिये दे रखी थी, उसे वापस मांगे। उसके वापस न मांगने से भी राज्य की सम्पति के कब्जाधारियों का यह विष्वास पुख्ता हुआ कि पूर्व राजा से जो सम्पति हमें मिली थी, नई सरकार ने वह सम्पत्तिा हमें सदा-सदा के लिए दे दिया। पॉवर आफ एटार्नी से प्राप्त सम्पत्तिा को कब्जाधारी कीमत का बिना भुगतान किये ही अपने नाम रजिस्ट्री समझने लगा और जब मरने लगा तो राज्य की इस सम्पति को अपने बच्चों को अपनी निजी सम्पति कहकर वसीयत लिख दी। प्रजा की सम्पति इस प्रकार 'निजी सम्पति' में तब्दील हो गयी, और इस सम्पति के स्वामी बाद में 'पूंजीपति' कहलाये और प्रजा को 'मतदाता' कहा गया तथा सेना व पुलिस के संचालक को 'सरकार' कहा गया।

       सम्पति वापस न मिलने के कारण यह सरकार अपनी रोटी के लिये राज्य की सम्पति के कब्जाधारकों पर निर्भर हो गई। सरकार के लोगों की रोटी के लिए इन कब्जाधारियों ने मतदाताओं को भूखे रखा और उन्हें मजबूर करके उनसे काम करवाया। मतदाताओं के काम करने से पैदावार बढ़ती गई। बाद में मषीनों ने लोहे के हाथों से मेहनत करके इतनी पैदावार कर दी कि 10 गुना जनसंख्या और पैदा हो जाये तो खाने की कमी नही रही। इस पैदावार की बढ़ोतरी से राज्य की संपति के कब्जाधारियों ने सरकार व प्रषासन के लोगों को रोटी की बजाय गाड़ी-मोटर भी देना षुरु कर दिया। इस देनदारी को 'टैक्स' कहा गया। इन कब्जेधारियों ने प्रजातंत्र के नाम पर पूरे तंत्र को अपना तंत्र समझ लिया। नकद टैक्स देने के कारण इन लोगों को यह गलतफहमी हो गई कि पूरे देष में उनके चार तरह के नौकर हैं- षासन कार्य करने वाले नौकर, प्रषासन करने वाले नौकर, उनकी कम्पनी के लिये काम करने वाले नौकर व अन्य औद्योगिक घरानोेंं में काम करने वाले नौकर।          वस्तुत: अर्थसत्ताा जब राज्य के अंकुष व नियंत्रण से बाहर हो गई तो इस सत्ताा के सत्तााधीषों ने प्रजातंत्र की क्रांति को निश्फल कर दिया। अब सर्वोच्च सत्ताा अर्थसत्ताा बन गई, सरकार दूसरें दर्जे की सत्ताा बन गई तथा पूंजी विहीन मतदाता तीसरे दर्जे की सत्ताा के ही हकदार रह गये। अर्थ के सर्वोच्च सत्तााधीषों व मत के निम्न कोटि के सत्तााधीषों के बीच पुलिस-सेना को संचालित करने वाली दूसरे दर्जे की सरकारी सत्ताा पिसने लगी। सरकारी तंत्र के लोगों ने दो पाटो के बीच पिसने से घुटन महसूस किया, किन्तु उसे सही-सही व्यक्त कर देने में अपनी हैसियत कमजोर हो जाने का खतरा देखा। सरकारी तंत्र ने अपनी घुटन अपने होठों के अंदर कैद इसलिये रखा कि उनसे उंची हैसियत के आर्थिक सत्तााधीष उनका दर्द समझने की योग्यता तो रखते थे, लेकिन वे निर्दयी थे। और उनसे नीचे की हैसियत रखने वाले मतदाता दयालू तो थे, लेकिन इतने योग्य नही थे कि सरकारी तंत्र को राहत दे पाते। सरकारी तंत्र की घुटन एक ऐसा फोड़ा बन गयी-जिससे दो तरह की मवादें निकलीं-सरकारी भ्रश्टाचार और झूठवादिता। इसी झूठवादी प्रवृतियों के कारण सरकारी तंत्र व उसके बाहर कार्य करने वाले लोग वाणी से मतदाताओं की गरीबी उन्मूलन का मंत्र जपा, जबकि आचरण में अपनी गरीबी उन्मूलन का काम किया। इस विष्लेशण्ा से स्पश्ट है कि गरीबी उन्मूलन सरकारी तन्त्र के वर्तमान ढ़ांचे के वष की ही बात नही है। यह या तो सर्वोच्च सत्ताा यानी राज्य की सम्पति के कब्जोधारियों की दयालुता से संभव है या फिर सरकारी तंत्र व मतदाताओं की संगठित षक्ति से।वोटरशिप के प्रस्ताव में इस एकता की संभावना बनती है।

            (v)         यह कि राज्य की सर्वोच्च सत्ताा, यानी पैसे की सत्ताा के सत्तााधीषों ने सरकारी सत्ताा पर से वंषवाद खत्म करने के लिए प्रजातंत्र की दुहाई दी, किन्तु स्वयं जिस सत्ताा के सत्तााधीष थे, उस पर से वंषवाद खत्म करने की बात आई, तो मुकर गये। इसीलिए डी0 एम0, सी0 एम0, पी0 एम0 के बच्चों को बाप की कुर्सी पर बैठने के लिए परीक्षा की व्यवस्था की गई। जबकि अरबपति के बेटे पीढी-दर-पीढी अरबपती बनते हैं, बिना किसी परीक्षा के। वंषानुगत विषेशाधिकार देखकर ही षासन करने वाला ठीक से षासन नही कर रहा है, अरबपती बनने में लगा है ।  प्रषासन करने वाला ठीक से प्रषासन नही कर रहा है, अरबपती बनने में लगा है। अरबपति बनना ही हर व्यक्ति की मूल प्रेरणा बन गई है, क्योकि इसी षक्ति के पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाने का कानून है। षेश सबमें परीक्षा व्यवस्था है। जब सभी लोग अरबपति बनने की होड़ में लगे रहेगें, तो उपभोग की राश्ट्रीय सीमा रेखा टूटेगी ही। जब इस सीमा रेखा का पालन न करके सभी लोग उपभोक्तावादी लाइन में खड़े हो जायेंगे तो भूखे पेट धनवानों की सेवा करने वाले कुछ गुलाम मतदाताओं की रिजर्व टोली चाहिये ही। स्पश्ट है कि अगर अर्थसत्ताा के वंषानुगत विषेशाधिकार पर अंकुष नही लगता तो गरीबी रेखा के नीचे कुछ लोग सदा-सदा के लिए आरक्षित रहेंगे ही।

                (vi)          यह कि उक्त बिन्दु (i) तथा (v) से स्पश्ट है कि चूंकि राज्य की सम्पत्तिा के कब्जाधारी लोग राज्य की ही पूंजी से पैसा उगाहकर सरकारी तंत्र को टैक्स देने लगे, इसलिए स्वयं को सरकार से भी बड़ा मान लिया। चूंकि सरकार राजा की कुर्सी पर बैठाई गई थी, इसलिए ये लोग स्वयं को राजा से बड़ा महाराजा मानने लगे। जब गरीबी उन्मूलन की बात चली तो सरकार ने गरीबी की परिभाशा तय करने के लिए टैक्स देने वाले अपने महाराजाओं की राय (आदेष) मांगा। चूंकि इनके मन में राजषाही का दम्भ मौजूद था। इसलिए इन लोगों ने कह दिया कि डाक्टर के राय के हिसाब से 6 रोटी सुबह-षाम, साल भर में 6 मीटर कपड़ा, 6 वर्ग फुट का एक कमरा...... जिसके पास न हों, उसे गरीब मानाें। ऐसा आदेष देते वक्त ये लोग भूल गये कि प्रजा तंत्र में देष की सारी षक्तियां प्रजा में निहित है, और इसलिए कम से कम देष की औसत सम्पत्तिा की आधी रकम हर मतदाता का मूलाधिकार है। चूंकि गरीबी रेखा की परिभाशा राजषाही के मूल्यों से तय करने की परम्परा चल रही है। इसलिए इस परिभाशा को जब तक खारिज नही किया जाता, गरीबी खत्म नही होगी। वोटरषिप की मान्यताएं इस परिभाशा को चूंकि खारिज करती है। इसलिए अब गरीबी उन्मूलन अवष्यंभावी है। इस विशय में और विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय - 8(2,9,16) का संदर्भ ग्रहण करें ।

2. न्युनतम जरूरत की गारंटी -

       यह कि षासन द्वारा जनता की न्युनतम जरुरतों की गारंटी देने की नीति अपना लेने से भी गरीबी उन्मूलन असंभव है, इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिये इस याचिका के अध्याय 3.1(घ) का संदर्भ लें।

3. गरीबों को भत्ताा की समीक्षा-

    यह कि केवल गरीबों को गरीबी भत्ताा देने की नीति से गरीबी का उन्मूलन संभव नही है। इसका कारण जानने के लिए इस याचिका के अध्याय - 3.1(ड.), 4(,ठ) का संदर्भ लें।

4. ''गरीबों को अमीरों की दया पर छोड़ना'',एक समीक्षा -

        यह कि गरीबों को अमीराें की दया पर छोड़ देने से भी गरीबी का खात्मा नही किया जा सकता। क्योंकि अमीर लोगों की दयालुता हाथी के सूढ़ की तरह होती है। यह सूढ़ गरीब आदमी की कातर आंखों को देखकर उसकी तरफ खिंच जाती है। अमीर आदमी गरीब की झोली में वह रकम डालता है, जिससे उसकी दयालुता की सूढ़ वापस उसके पास आ जाये। स्पश्ट है कि अमीर का दान अपनी दयालुता की सूढ़ के दर्द से प्रेरित है, गरीब की जरुरत से नही। चूंकि दान की प्रेरणा दानी के दयालुता की दर्द से मिलती  है। इसलिये उसका लक्ष्य गरीब की गरीबी उन्मूलन है ही नहीे। जब किसी नीति का लक्ष्य तय होता है, तब भी कई बार वह लक्ष्य हासिल नही होता। फिर जब गरीबी उन्मूलन अमीरों के दान का लक्ष्य ही नही है, तो इस तरीके से गरीबी उन्मूलन होने का सवाल ही नही उठता। गरीबों को अमीरों के दान के भरोसे छोड़ देने पर गरीबी तो गई नही, अपितु अमीरों ने गरीबों की सेवा के नाम पर और ज्यादा अमीरी टैक्स बचाकर हासिल कर ली। लंगरों, खैरात के सहभोजनालयों को कोई आदर्ष अर्थ व्यवस्था की बजाय मजबूरी की अर्थव्यवस्था ही मानना पड़ेगा। क्याेंकि लंगरों, मंदिरों, मस्जिदों, आश्रमों में जहां बेसहारा लोगों को भोजन कराया जाता है, यहां भोजन करने वाले की षरीर तो जिन्दा रह जाती है, स्वाभिमान मर जाता है। जबकि जीने वाले को जीने का आनन्द उसके स्वाभिमान के कारण आता है, तथा वह समाज को तभी आनन्द दे पाता है जब वह अपने स्वाभिमान  के साथ जी पाता है। लंगरों, अनाथालयों व आश्रमो में, जहां लोग भोजन खिलाने के लिए चन्दा देना चाहते है, वहां अपने परिवार को भी नियमित भोजन खिलाना पसंद नही करते। इसी बात से साबित होता है कि दयालुता से संचालित भोजनालय गरीबी उन्मूलन का कोई उपाय नही हो सकते। लोकतांत्रिक मूल्यों से संचालित सरकार हर मतदाता को क्रयषक्ति की न्युनतम क्षमता से सम्पन्न अवष्य करे, जिससे किसी मतदाता को अपना स्वाभिमान मार कर किसी धर्मार्थ भोजनालय तक न जाना पड़े। अनुभवों ने यह भी साबित किया है कि कई लोग इन धमार्थ भोजनालयों को चलाकर दया के आवरण में अपने दम्भ व अपने अहंकार की संतुश्टि कर रहे हैं। भोजनालय गरीबी उन्मूलन के नही, इन लोगो के अहंकार को तुश्ट करने के साधन हैं। वही दम्भ और वही अहंकार; जो पहले राजषाही में राजा के पास होता था। उसी अहंकार के वषीभूत ये लोग कुछ गरीबों को प्रजा समझकर व खुद को राजा समझकर भोजन कराते हैं। यह राजषाही की मानसिकता का अवषेश है, जो लोकतंत्र के नीति निर्धारण में स्वीकार नही हो सकता ।  वोटरषिप से राजषाही के इन अवषेशों को समाप्त करने में मदद मिलेगी। अपने पास क्रयषक्ति हो जाने पर धर्मार्थ भोजनालयों में भोजन करने की बजाय लोग पैसा देकर होटलों में भोजन करेंगे या स्वयं घर में खाना बनाकर खायेंगे और गरीबों की सेवा के नाम पर आय कर राजस्व की बर्वाद हो रही भारी रकम समाज प्रबंध में काम आयेगी।

5. 'गरीबों की तानाषाही' एक समीक्षा-

        यह कि गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य पाने के लिए लोकतंत्र के छद्म नाम से चल रही आर्थिक सत्तााधीषों की तानाषाही को समाप्त करके श्रमिकों की तानाषाही तभी कायम की जा सकती है, जब आर्थिक सत्तााधीष न्यूनतम आर्थिक समानता के साधन के रूप में वोटरषिप का प्रस्ताव ठुकरा दें। 95 प्रतिषत लोगों पर 5 प्रतिषत लोगो की तानाषाही और 5 प्रतिषत लोगों पर 95 प्रतिषत लोगो की तानाषाही में कोई एक विकल्प चुनना हो, तो कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति (जिसे आर्थिक बलात्कार अपने साथ होना और दूसरों के साथ करना पसंद न हो - वह) 95 प्रतिषत लोगों की तानाषाही वाली राजव्यवस्था अपनाना पसन्द करेगा। अत: जब तक कि वोटरषिप का विकल्प खारिज नहीं किया जाता, जब तक माक्र्सवादी विकल्प गरीबी उन्मूलन का उपाय नही हो सकता। इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिये इस याचिका में माक्र्सवाद से संबंधित अध्याय - 4 का संदर्भ ग्रहण करें।

6. गांधीवादी उपाय -

       यह कि कुल चार कारणों से गांधीवादी लोगों का उपाय भी गरीबी उन्मूलन का प्रभावी साधन नही हो सकता। पहला यह कि इस विचारधारा में स्पश्ट नही है कि अर्थव्यवस्था में मषीनों की मौजूदगी होनी चाहिए, या नही। गांधीवादी लोग मषीन विहीन उत्पादन प्रणाली अपनाने के प्रयोग करते रहते हैं, किन्तु जब उनसे स्पश्ट पूंछा जाता है कि -''मषीनें हटा दें?'' तो वे मषीनों का आग्रह यह कहकर करने लगते हैं कि - ''गांधी जी ने फलां जगह कहा है कि वे मषीनों के खिलाफ नही है।'' दूसरा यह कि यदि गांधीवादी लोग मषीनों के हिमायती है तो मषीन के परिश्रम से हुए पैदावार पर स्वामित्व किसका है- मषीन मालिक का, सरकार का, या मतदाता का यह नही बताते। तीसरा यह कि अगर गांधीवादी मषीन विहीन उत्पादन प्रणाली के समर्थक हैं तो यह प्रणाली किसी भी रूप में उत्पादन के वर्तमान स्तर को बनाये रखने में सक्षम नही है। अगर मषीनाें को बन्द कर दिया जाये, व हल-बैल प्रणाली अपना लिया जाये तो जनसंख्या के कम से कम 9 हिस्से को भूखे मार देना पड़ेगा। क्याेंकि हल बैल वाली अर्थव्यवस्था आज की तुलना में 10 गुना कम लोगों का मुष्किल से पेट भर पाती थी। चूंकि जनसंख्या के नौ हिस्से को भूखे मार देने पर सहमति नही बन सकती, इसलिये गरीबी उन्मूलन के लिए गांधीवादी उपायों को स्वीकार नही किया जा सकता। चौथा यह कि गांधीवादी अर्थव्यस्था का आग्रह एक दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था का आग्रह है, जिसकी भावना तो स्वीकार्य हो सकती है, साधन नही। चूंकि दक्षिणपंथी व्यक्ति के चेतना का फोकस अतीत के किसी खास कालखण्ड में स्थिर होता हैं। इसलिए उसी कालखण्ड की अर्थव्यवस्था, उसी कालखण्ड की राजव्यस्था व समाज व्यवस्था की वकालत वह इस अंदाज में षुरु कर देता है, जैसे उसे दिव्य दृश्टि प्राप्त हो गई हो। इतिहास के जिस कालखण्ड की वकालत वह करता है, उस कालखण्ड की अच्छाइयों का तो प्रदर्षन करता है, किन्तु बुराइयाें पर उसका ध्यान नही जाता। वह अतीत की व्यवस्था को वर्तमान की आदर्ष व्यवस्था बनाकर पेष करता है किन्तु वर्तमान चुनौतियों से सरोकार नही रखना चाहता। जबकि इतिहास चूड़ीदार गति से आगे बढ़ता रहता है, एक बार जो व्यवस्था त्याग दी गई हो, वह दुबारा कभी नही आती। किन्तु जैसे किसी बोल्ट पर बैठी चींटी को बार-बार गोल परिपथ पर घूमने  से उसे जीवन के रास्ते वृत्तााकार महसूस होने लगते है, इसी प्रकार कुछ घटनाओं की पुनरावृत्तिा को देखकर दक्षिणपंथी लोगों को भी इतिहास स्वयं को दोहराता दिखाई देने लगता है। इसलिए वे इस आषा में जीने लगते है कि अतीत की व्यवस्था दुबारा लौटेगी और जब लौटेगी तो हमारा सामाजिक मूल्य  फिर बढ़ेगा। चूंकि वह आभासी अनुभूति है इसलिए गांधीवादी अर्थव्यस्था की योग्यता पर भले ही संदेह किया जाये, नियति व इमानदारी पर संदेह नही किया जा सकता। चूंकि इस अर्थव्यवस्था की योग्यता संदिग्ध है, इसलिये ग्राम स्वराज्य के नाम से जिस कथित अर्थव्यवस्था व राज व्यवस्था की वकालत गांधीवादी लोग करते है, गरीबी उन्मूलन के साधन के रूप में उसे स्वीकार नही किया जा सकता। इस विशय में और जानकारी के लिए इस याचिका में  उपयोगिता तथा कार्यान्वयन संबंधी अध्याय - 8, 9.1(क-xv) का अवलोकन करें ।

 7. कल्याणकारी लोकतंत्र का राज्य

       यह कि लोकतंत्र के नाम पर आर्थिक सत्तााधीषों की तानाषाही वाली वर्तमान राजव्यस्था के वष में भी गरीबी उन्मूलन करना नही है। कुछ दृश्टांत देखें। पहला तो यह कि कल्याणकारी राज्य के नाम पर सन् 2004-2005 के बजट में सरकार ने खाद्यान्न भण्डारण पर 28000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया। जबकि गरीबों के लिए खाद्यान्न वितरण पर केवल 8 करोड़ रुपया रखा। 28000 करोड़ रुपये का प्रचार ऐेसे किया जाता है जैसे सारा पैसा गरीबों के भोजन के लिये रखा गया, जबकि सच्चाई केवल आठ करोड़ रुपया ही है। 60 करोड़ जरुरत मंद भारतीय मतदाता, जो रोज 50 रुपया भी नही कमा पाते, उन्हें इस बजट से कम से कम 60 प्रतिषत यानी 1400 करोड़ से ज्यादा मिलना चाहिए था किन्तु मिला केवल 8 करोड़। इस तरह के तमाम उदाहरण है जिनका प्रचार इस प्रकार होता है जैसे वह प्रावधान गरीबों - बेरोजगारों के लिये किया गया हो। जबकि सच्चाई यह होती है कि इस प्रावधान का लाभ सरकारी तंत्र के अधिकारियों, कुछ ठेकेदारों व कुछ दलालों द्वारा ही उठाया जाता है। इसी प्रकार षासकीय तंत्र द्वारा संचालित षिक्षा सेवायें चुनावी राजनीति की भेंट चढ़ चुकी हैं, इन सरकारी स्कूलों में पढ़े-लिखे अपवाद स्वरूप बच्चे ही अपने परिवार व राश्ट्र के लिए उपयोगी हो पा रहे हैं। षासीय तंत्र द्वारा संचालित चिकित्सा सेवायें सिफारिस की मोहताज है, इसलिए अस्पतालें केवल सरकारी तंत्र से जुड़े परिवारों के मुष्किल से ही काम आ रही हैं। मिड डे मील, सस्ता राषन आपूर्ति, व भुखमरी रोंकने के तमाम प्रयासों के बावजूद गरीबी से तंग आकर परिवार के परिवार सामुहिक आत्महत्या करने को विवष हैं इन मरे परिवाराें के विशय में ज्यादा जानकारी के लिए इस याचिका के संलग्नक 11.3 का संदर्भ ग्रहण करें। कथित कल्याणकारी सरकार के काम करने का तरीका इस बात से समझा जा सकता है कि आबकारी विभाग पर टैक्स का पैसा खर्च करके लोगों को षराब पिलाने का इंतजाम करती है और मद्य निशेध विभाग पर टैक्स का पैसा खर्च करके कहती है कि-''षराब मत पिओ''। दबंग लोगों के तुश्टीकरण में सरकार मंत्रालय पर मंत्रालय खोलते चली जाती है - सबके लिए षिक्षा व गरीबों की भलाई का बहाना बनाती जाती है। इस याचिका के पन्नों का अनुषासन इस बारे में विस्तृत तथ्य पेष करने से रोंक रहा हैं। अन्यथा यह साबित करना बहुत आसान है कि गरीबी का उन्मूलन करना आर्थिक सत्तााधीषों के चन्दे व टैक्स से संचालित कथित कल्याणकारी राज्य के वष के बाहर की बात है।                                                                                                                                                                                                              

8.  राजषाही की वापसी - 

       यह कि राजषाही दुबारा लाने पर भी गरीबी की समस्या हल नही हो सकती। ऐसी व्यवस्था में गरीब लोग अमीरों की दया की बजाय राजपरिवार की दया पर छोड़ दिये जायेंगे। ''ऊपर से कुछ टपके तो मिले''- की उम्मीद में आज गरीब आदमी पूंजीपतियों की ओर देख रहा है, कल राजपरिवार की तरफ टकटकी लगायेगा। न उसे बीते कल में कुछ मिला, न उसे आने वाले कल में कुछ मिलेगा। अगर राजषाही वाली व्यवस्था में षक्ति होती तो उसे लोग अस्वीकार ही क्यों करते, एक बात ।और दूसरी बात यह कि राजषाही वाली व्यवस्थाओं में तो कल्याणकारी लोकतंत्र की तुलना में ज्यादा प्रतिषत लोग गरीब दिखाई पड़ते है। हलांकि कथित कल्याणकारी लोकतंत्र में ऐसा राजा कभी नही आ सकता जो दयालुता का परिचय देकर गरीबी उन्मूलन कर दे।  क्योंकि वह क्रूर आर्थिक सत्तााधीषों के इषारे पर राजकाज चलाता है। इस दृश्टि से राजषाही ज्यादा उपयुक्त हो सकती है, क्योकि राजषाही में राजा की किसी न किसी पीढ़ी में दयालू राजा के पैदा होने की संभावना अवष्य बनती है। 200-400 साल में एक दयालू राजा आ सकता है जबकि वर्तमान के कथित लोकतंत्र में तो आर्थिक क्रूरता का आचरण करने वाले राजा के लिए सदा-सदा के लिए सिंहासन आरक्षित कर दिया गया है। यद्यपि वर्तमान लोकतंत्र के राजा के लिये यह योग्यता भी निर्धारित है कि वह अपनी वाणी में दयालुता का अभिनय अवष्य करे। चूंकि मषीनों द्वारा किये जा रहे अति उत्पादन के वर्तमान युग में गरीबी जैसी असह्य पीड़ा में आधे से अधिक जनसंख्या को 200-400 साल तक नही रखा जा सकता, इसलिए गरीबी उन्मूलन के लिए राजषाही अपनाने का तर्क भी स्वीकार नही किया जा सकता।

 

9. विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था  -

       यह कि गरीबी उन्मूलन के लिये विकेन्द्रित अर्थव्यस्था अपनाने का तर्क भी नही दिया जा सकता। पहला कारण तो यह है कि जब तक विष्व बाजार व्यवस्था की रक्षा के लिए विष्व व्यापार संगठन खड़ा है। तब तक के लिए इस तर्क की गुंजाइष खत्म हो गई है। दूसरा यह कि लघु उद्योगों द्वारा उत्पादित करने के लिए कुछ चीजों का आरक्षण तो बड़ी मुष्किल से संभव भी हो सकता है, उनकी बिक्री लगभग असंभव काम है । क्योंकि वही सामान बड़ी मषीनों द्वारा बनके दूसरे देषों से आयातित हो सकता है। तीसरा यह कि उत्पादन के साधनों के वितरण की बजाय क्रयषक्ति के वितरण का प्रयास किया जाये। क्योंकि वैष्विक स्तर पर एकीकृत होती जा रही उत्पादन व विरतण प्रणाली के वर्तमान युग में उत्पादन के साधनों का वितरण पानी देने वाली मषीन के कल पुर्जो के वितरण जैसा हो गया है। जिस प्रकार कल पुर्जे अलग-अलग हाथों में होने पर इंजन पानी नही दे सकता। उसी प्रकार उत्पादन के साधनों का वितरण कर देने से उत्पादन का वर्तमान स्तर बरकरार नही रखा जा सकता। चौथा कारण यह कि विकेद्रित उत्पादन व वितरण प्रणाली की वकालत करने वाले जाने - अनजाने दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था अपनाने व सामंतवादी अर्थव्यवस्था व राजव्यवस्था की वकालत कर रहे होते है, जो एक दलदल से निकालकर दूसरे दलदल में ढ़केलने वाली है। यद्यपि उन्हें इसका भान नही होता। पांचवा कारण यह कि विकेंन्द्रित अर्थव्यवस्था की वकालत करने वाले लोग उस संस्थागत अध:संरचना की जानकारी नही देते, जिसके द्वारा उत्पादन का वर्तमान स्तर बनाये रखना भी संभव हो, गरीबी भी खत्म हो जाये, सांस्कष्तिक विविधता के पालन-पोशण की संभावना भी बनी रहे, उपभोक्तावाद न फैले और धन का केन्द्रीकरण भी न हो।

       उक्त (i) से (ix) तक के कारणों से स्पस्ट है कि विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था के नाम से जिस व्यवस्था को तुतलाया जाता है, वह स्पस्ट संस्थागत व्यवस्था नही देती, इसलिये इस तर्क को गरीबी उन्मूलन के लिए सक्षम तर्क स्वीकार नही किया जा सकता। इस संबंध में और जानकारी के लिए इस याचिका के अध्याय -3(ड.) का संदर्भ ग्रहण करें । 

      उक्त 1 से 9 तक के बिन्दुओं के स्पश्टीकरण, तर्कों, निश्कर्शों व विष्लेशण के आधार पर साबित होता है कि वोटरषिप के प्रस्ताव के अलावा कोई अन्य उपाय गरीबी का उन्मूलन नही कर सकाता।

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भरत गांधी कोरोनरी ग्रुप                                                                                                         Naveen Kumar Sharma