Votership


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खण्ड-तीन

अध्याय -आठ

8.  वोटरषिप की उपयोगिता       

1.   आर्थिक तंगी से प्रेरित अपराधों पर पूर्ण नियंत्रण

आर्थिक तंगी जनित अपराधों पर अंकुष

आर्थिक भेदभाव जनित अपराधों पर अंकुष

आर्थिक विशमता के दर्षन की पीड़ा जनित अपराधों पर अंकुष

2.   गरीबी का नि:संदेह उन्मूलन                                         

3.   जनसंख्या वृध्दि पर अनुभवसिध्द अंकुष       

4.   कर्माधारित वर्णव्यवस्था का उद्विकास          

5.   भ्रश्टाचार पर अवष्यंभावी अंकुष             

      (क)  सरकारी क्षेत्र के संकुचन से भ्रश्टाचार का स्वत: संकुचन                     

      (ख)  व्यवस्थागत भ्रश्टाचार पर अंकुष                     

      (ग) उपभोक्तावाद पर अंकुष                             

      (घ) राजनैतिक चन्दे का प्रबन्ध व भ्रश्टाचार पर रोक          

6.   राश्ट्रप्रेम का उद्विकास                      

7.   आर्थिक दलितों के साथ आर्थिक न्याय        

8.   महिलाओं को उत्पीड़न से राहत              

9.   गरीब परिवारों में जन्मी प्रतिभाओं के कत्लेआम

     पर प्रभावषाली रोक                       

10.  प्राकृतिक आपदाओं में स्वचालित राहत प्रणाली का उदय  

11.   राश्ट्र की दिमागी विकलांगता का इलाज       

12.  अनैच्छिक वेष्यावृत्तिा से छुटकारा व पुर्नवास  

13.  महापुरूशों की आत्माओं को षांति            

स्वतंत्रता सेनानियों की आत्माओं को षांति

अर्थषास्त्रियों का बहुप्रतीक्षित लक्ष्य प्राप्त हो जायेगा

दार्षनिकों की मंषा पूर्ण

धार्मिक महापुरूशों का उद्देष्य पूरा

14.  बहुराश्ट्रीय कम्पनियों पर क्षतिपूर्ति दायित्व

15.  लोकतंत्र के विकास का बीमा         

      (क) लोकतांत्रिक प्रेम में वृध्दि                    

      (ख)  लोकतंत्र के पहरेदारों में वृध्दि               

      (ग) मतदान प्रतिषत में वृध्दि                    

      (घ)  आर्थिक लोकतंत्र का साधन                 

16.  संवैधानिक प्रगति                  

      (क) संविधान सभा की लालसा पूरी होगी            

      (ख) विधि के समक्ष समता  (अनु. 14 व अनु. 15)  

      (ग) संविधान की प्रस्तावना                       

17.  बेरोजगारी की समस्या पर प्रभावषाली अंकुष

      (क) क्रय षक्ति बढ़ने से                          

      (ख) राजनैतिक वित्ता से                         

      (ग) ए.टी.एम. नेटवर्क से                        

      (घ) बैंक स्टाफ बढ़ाने से                         

      (ड.) साइकिल जैसे उद्योगों से                    

      (छ)  वोटर कौंसिलर व्यवसाय से                 

      (ज) उर्ध्वाधर सचिवालयों में भर्ती                  

      (झ) अन्त प्रेरित:प्रज्ञात्मक रोजगार                

18.  भोजन, आवास, पेय जल, शिक्षा, चिकित्सा सम्बन्धी समस्याओं का समाधान                               

         (क) खाद्य समस्या का समाधान व किसानों को लाभकारी

         मूल्य की प्राप्ति                             

      (ख) आवास समस्या का हल                     

      (ग) पेय जल की समस्या का गारंटीषुदा समाधान     

      (घ) षत प्रतिषत षिक्षित समाज का उदय           

      (ड.) षत प्रतिषत लोगों का स्वास्थ्य बीमा

 

वोटरषिप की उपयोगिता

 

1. आर्थिक तंगी से प्रेरित अपराधों पर पूर्ण नियंत्रण-

       (क)   यह कि वोटरषिप का प्रस्ताव कार्यान्वित करके यदि सरकार जन्म के आधार पर स्वयं द्वारा बरते जा रहे आर्थिक भेदभाव पर अंकुष लगा देती है तो ऐसा कोई व्यक्ति नही बचेगा तो आर्थिक तंगी से पीड़ित होकर आत्मरक्षा में कोई अपराध करें।

       (ख)   यह कि उक्त तरीके से जब कोई व्यक्ति एक बार अपराध में कूद पड़ता है। तो उसके भावी जीवन की तीन दिषायें संभावित होती है। पहली तो यह कि कुछ समय के लिये ही सही अगर अपराध करके अपनी तंगी वह व्यक्ति दूर करने में सफल हो गया, तो अपराध कर्म को वह रोजगार की तरह अपनाने के लिए प्रेरित हो जाता है। दूसरा यह कि अगर उसके अंदर सद्प्रवृतियां व सामाजिकता प्रभावी तरीके से मौजूद है और पहले अपराध के बाद किसी भी तरीके से उसकी तंगी दूर हो गई तो वह अपराध की ओर पुन: कदम न रखेगा। तीसरी दिषा यह हो सकती है कि उसकी तंगी दूर न हो सके और वह दूसरा अपराध करे, और पुलिस के कब्जे में आ जाये । जेल से छूटने के बाद यह आपराधिक मुकदमा उसके लिए कोढ़ में खाज का काम करता है। एक तो पहले से ही वह तंग था, दूसरे अब मुकदमा लड़ने का पैसा भी चाहिए। ये दोनो आवष्यकतायें उसे तीसरा सफल अपराध करने को प्रेरित करती है। यदि वह इस प्रयास में असफल हुआ और पुलिस के हाथ आ गया तो अब उसके ऊपर दो मुकदमें लड़ने का आर्थिक बोझ आ पड़ा। इन दोनो मुकदमों को देखकर पुलिस यह नतीजा निकालती हैं कि अमुक व्यक्ति आपराधिक प्रवृति का है। पुलिस के इस नतीजे के कारण अब वह उस क्षेत्र में घटने वाली हर घटना में षक के दायरें में रहता है और कई बार जब पुलिस असली अपराधी को नही खोज पाती तो इसी व्यक्ति को जेल भेज कर चार्जषीट बना देती है। इसमें पुलिस की सिरदर्दी तो खत्म हो जाती है, लेकिन समाज की सिरदर्दी षुरु हो जाती है। कारण यह होता है कि अब इस व्यक्ति के सामने अपराध को एक व्यवसाय के रूप में अपना लेने के सिवा कोई चारा नही होता। उसे अपना घर खर्च भी देखना है, उसे पुलिस द्वारा कुछ सच्चे कुछ झूठे मुकदमों का खर्च भी देखना है। आये दिन अदालत में पेष होना है, या जेल में रहना है ।  तो बाहर जाकर कोई धंधा - बिजनेस भी नही कर सकता। कुल मिलाकर जब तक यह व्यक्ति जीवित रहेगा, समाज व यह व्यक्ति दोनो त्रस्त रहेंगे। वोटरषिप के नाम से मिलने वाली नियमित रकम इस व्यक्ति से पहला ही अपराध नही करवाने देगी, और फिर अपराध की श्रृंखला षुरू ही नही हो पायेगी।

       (ग)   यह कि उत्ताराधिकार में किसी को अरबों रुपया मिलता देख व स्वंय को 100 रुपया भी न मिलता देख-किसी संवेदनषील व्यक्ति को वही पीड़ा होती है-जो महात्मा गांधी को हुई थी, अंग्रेजों द्वारा ट्रेन से बाहर धकेले जाने पर, जो पीड़ा किसी दलित समुदाय के अमीर व्यक्ति को होती है- किसी ऊंची जाति के परिवार में जाने पर- पानी पीने के लिए अलग गिलास देखकर। वही पीड़ा किसी गरीब आदमी के संवेदनषील बेटे को होती है - अपने लिए आजीवन गरीबी का आरक्षण देखकर, अपने बाप का काम करने की बाध्यता को देखकर व स्कूल में अपने दोस्त (अमीर बाप के बेटे) को स्कूल से निकलते ही कार में घूमता देखकर। अगर गरीब बाप का बेटा संवेदनषील नही हुआ, तो वह बाप के पेषे को बिना किसी झिझक के अपना लेगा। और यदि संवेदनषील हुआ और बाप की गरीबी इस हद तक हुई कि वह षिक्षा के रास्ते अपनी अंतर्निहित हैसियत हासिल न कर सका, तो वह यह हैसियत हासिल करता है, या तो बड़ा संत बन कर, या बड़ा राजनीतिज्ञ बनकर, या बड़ा अपराधी बनकर। अगर उसके अंदर सामाजिक प्रतिश्ठा की प्यास अधिक होती है तो वह संत या राजनीतिज्ञ बनता है, अगर उसके अंदर उद्योगपति बनने की प्यास अधिक होती है तो अपराधी बनता है। वोटरषिप चूंकि उसे यह आष्वासन देगी-कि जन्म के आधार पर जिस संसद ने किसी उद्योगपति के बेटे को उत्ताराधिकार कानून से अरबपती बनाया है, वही संसद जन्म के आधार पर नियमित कुछ रकम ऐसे बापों के बेटों को भी दे रही है, जो बाप कुछ संग्रह नही कर सके। वोटरषिप बाप के कुकर्मों व अयोग्यता की सजा बेटे को देने की कुप्रथा पर प्रभावषाली अंकुष लगा देगी। इससे जो बड़े-बड़े अपराधी आज आपराधिक गिरोहों का संचालन कर रहे हैं, वह बड़ी-बड़ी कम्पनियों को संचालित करने वाले उद्योगपति बन जायेंगे और समाज आपराधिक गिरोहों से मुक्त हो जायेगीं।

       (घ)   यह कि आर्थिक तंगी से पीड़ित होकर आत्मरक्षा में कुछ लोग अपराधी बनते है। आर्थिक भेदभाव के डंक से क्षुब्ध होकर कुछ संवेदनषील लोग आपराधिक गिरोहों के संचालक बनते है। किन्तु जो लोग पैसे की प्रेरणा से ही कुछ कार्य करने में विष्वास करते है, ऐसे अवसर न मिलने पर आर्थिक विशमता की पीड़ा उन्हें अपराध की ओर कदम रखने को प्रोत्साहित करती हैं। ऐसा व्यक्ति एस.टी.डी. देखकर अपनी मां से बात करना चाहता है, नही कर पाता । हवा की तरह भागती मोटरसाइकिलों पर बैठकर आनन्द लेना चाहता है, नही ले पाता । चमचमाती कारों में बैठकर उसके अंदर के सुख को महसूस करना चाहता है, नही कर पाता.........। उपभोक्तावादी साधनों को देखकर उसे लगता है- हाय ! कूछ लोग उससे कितना ज्यादा अमीर है !  वह कितना ज्यादा गरीब है ! यह कैसी आर्थिक खाई है ! इसे किसने बनाई है? आर्थिक विशमता का यह दर्षन यदि उसके अंदर निहित उपभोक्तावाद की जमीन पा जाता है, और उसकी न्युनतम उपभोग की आकांक्षा भी पूरी होती नही दिखाई देती, तो आर्थिक विशमता का आनन्द उठा रहे लोगों के खिलाफ उसके मन में एक आक्रोष पैदा होता है। उपभोक्तावाद का आनन्द ले रहे लोग उसे चिढ़ाते हुए लगते है और एक दिन बदले की आग उससे एक आपराधिक वारदात करवा देती है। फिर षुरु होता है उक्त बिन्दु (ख) में वर्णित घटनाओं का च्रक्र। वोटरषिप की नियमित रकम ऐसे लोगों को उनके उपभोग की छोटी-छोटी आकांक्षायें पूरी करती रहेगी। इस सुख को छोड़कर वे अपराध करने का जोखिम उठाने से बचे रहेंगे।

       उक्त (क) से (घ) तक के बिन्दुओं से स्पश्ट है कि वोटरषिप के प्रस्ताव में आर्थिक तंगी, आर्थिक भेदभाव और आर्थिक विशमता के कारण पैदा होने वाले अपराधों को रोंक देने की नि:संदेह क्षमता है।

2.   गरीबी का नि:संदेह उन्मूलन-

       (क) यह कि भारत सरकार और विष्व बैक द्वारा अलोकतान्त्रिक तरीकों से तय कि गई गरीबी की परिभाशा के हिसाब से देखें तो भी वोटरषिप की नियमित रकम हर मतदाता को मिलने लगेगी तो गरीबी का सफल उन्मूलन हो जायेगा। भारत सरकार उसे गरीब मानती है, जो रोजाना 14 रुपये भी न कमाई कर सके। विष्व बैक उन भारतीय नागरिकों को गरीब मानती है तो 50 रुपये रोजाना कमाई न कर पाये। 50 रुपये के हिसाब से भारत में लगभग 60 करोड़ लोग गरीब है। चूंकि वोटरषिप में औसत सकल उत्पाद की आधी रकम देने का प्रस्ताव है जो हर महीना प्रति मतदाता लगभग 1750 रुपये से अधिक रकम बैठती है। इसलिए वोटरषिप की रकम से भारत व विष्व बैंक दोनो की परिभाशाओं से भारत में गरीबी उन्मूलन हो जायेगा।

       (ख)   यह कि वोटरषिप के अलावा गरीबी उन्मूलन के लिए पहले से मौजूद व बहुप्रचारित अन्य कोई उपाय कारगर नही है ।  इस विशय में विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय - 6 का संदर्भ ग्रहण करें।

       उक्त (क) से (ख) तक के निश्कर्शो व विष्लेशणों के आधार पर इस बात में कोई संदेह नही रह जाता कि वोटरषिप से ही गरीबी उन्मूलन संभव है।

 3.  जनसंख्या वृध्दि पर अनुभवसिध्द अंकुष-

       (क)   यह कि युरोप के देषों में अनुभवों ने यह सिध्द कर दिया है कि गरीबी खत्म हो जाने पर और अधिक बच्चों की जरुरत ही महसूस नही होती। इस अवस्था में आ जाने के कारण पूरा युरोप जनसंख्या वृध्दि की समस्या से उबर गया है।

       (ख)   यह कि भारत के दलित समुदाय यानी एस.सी., एस.टी समुदाय व भारतीय मुस्लिम समुदाय के परिवारों में जनसंख्या की वृध्दि दर लगभग समान है। किन्तु इन दोनों समुदायों के सम्पन्न परिवारों में स्थिति विपरीत है। इससे साबित होता है कि बच्चाें की अधिक संख्या को गरीब परिवार अपने परिवार की आय का जरिया समझते है। इसलिए इन परिवारों में जनसंख्या की बढ़वार होती है। इन परिवाराें को नियमित मिलने वाली वोटरषिप की प्रस्तावित रकम चूंकि परिवार की आर्थिक सुरक्षा के प्रति इन्हें आष्वस्त कर देगी, इसलिए इन परिवारों द्वारा बढ़ाई जा रही जनसंख्या पर अनुभवसिध्द लगाम लग जायेगी।

       (ग)   इस नतीजे को और ज्यादा विष्लेशण के साथ समझने के लिए इस याचिका के अध्याय - 3.1(ख) व 3.4 का संदर्भ ग्रहण करें।

       उक्त (क) से (ग) तक के निश्कर्शो व विष्लेशणों के आधार पर इस बात में कोई संदेह नही रह जाता कि वोटरषिप का प्रस्ताव जनसंख्या की वृध्दि को रोकने के लिए एक सक्षम साधन है।

4. कर्माधारित वर्णव्यस्था का उद्विकास-

       (क)   यह कि जन्म से ऊंच-नीच की सामाजिक वर्णव्यवस्था कोई भी न्यायप्रिय व्यक्ति स्वीकार नही कर सकता। इस विशय में भारत के संविधान के प्रावधानों, संविधान सभा की भावनाओं तथा दलित आंदोलनों को देखते हुए यह साबित हुआ है कि जन्मना वर्णव्यवस्था एक सामाजिक कुरीति का दर्जा पा चुकी है, इससे मुक्ति के लिए भारतीय समाज में छटपटाहट है। यद्यपि जन्मना वर्णव्यवस्था में बंधा समुदाय अपनी छटपटाहट में केवल तुतला रहा है। यह स्पश्ट नही कहा जा रहा है कि जन्मना वर्ण व्यवस्था की दो षाखायें है। पहली है- आर्थिक वर्णव्यवस्था- जिसके कारण अरबपती के बेटा जन्म के आधार पर ही अरबपति बन रहा है, और गरीब का बेटा जन्म के आधार पर ही ऐसे काम में लगाया जा रहा है, जिससे जीवन भर वह गरीबी के दलदल में छटपटाता रहे। दूसरी षाखा है- सामाजिकर् वणव्यवस्था। जिसके कारण उंची जाति का आदमी जन्म के आधार पर सामाजिक सम्मान का अधिकारी समझा जाता है व नीची जाति में पैदा हुआ आदमी अपमान के योग्य व स्पर्ष के भी अयोग्य समझा जाता है। वोटरषिप की रकम के कारण ऊँंची जाति के असभ्य आदमी के बाध्यकारी सम्पर्क को नीची जाति का आदमी तोड़ सकेगा। इस प्रकार वोटरषिप की नियमित रकम के कारण जन्मना सामाजिक वर्ण व्यवस्था में आस्था रखने वालों का सामाजिक बहिश्कार होने लगेगा और वे सभ्य बनने के लिए बाध्य होंगे। दूसरी तरफ जन्म के आधार पर गरीब परिवारों को मिलने वाली यह रकम जन्मना आर्थिक भेदभाव की कुरीति को खारिज करने का एक प्रत्यक्ष उदाहरण बनेगी।

       (ख)   यह कि जन्मना सामाजिक वर्ण व्यवस्था के खिलाफ केवल षासकीय प्रषासकीय सेवाओं में आरक्षण के उपाय से ही लड़कर इस कुरीति को खत्म नही किया जा सकता। इस निश्कर्श को ठीक से समझने के लिए विकास संबंधी आपत्तिायों से संबंधित इस याचिका के अध्याय - 3.3 (ड़) का संदर्भ ग्रहण करें।

       (ग)   यह कि जन्मना वर्ण  व्यवस्था की गुलामी से मुक्ति के लिए परम्परागत दलित चिंतन व रणनीति में सुधार की आवष्यकता है। इस बात को ज्यादा विष्लेशण के साथ समझने के लिए इस याचिका में असंभावना से संबंधित अध्याय - 3.3 (ड़) का संदर्भ ग्रहण करें।

       (घ)   यह कि जन्मना वर्ण व्यवस्था की कुरीति जैसे-जैसे समाप्त होगी, वैसे-वैसे कर्माधारित वर्णव्यस्था का उद्विकास संभव होगा। इससे वर्णव्यवस्था के उन ईमानदार प्रेमियों को राहत मिलेगी, जो जन्मना वर्णव्यस्था को षास्त्र सम्मत नही मानते।

       उक्त बिन्दु (क) से (घ) तक की सूचनाओं, तर्को व निश्कर्शो के आधार पर साबित होता है कि वोटरषिप जन्मना वर्णव्यवस्था की कुरीति को खत्म करके कर्माधारित वर्णव्यवस्था के फलने-फूलने का अवसर देने का सषक्त साधन है।

 

5. भ्रश्टाचार पर अवष्यंभावी अंकुष -

   (क) सरकारी क्षेत्र के संकुचन से भ्रश्टाचार का स्वत: संकुचन

       यह कि ''काम के बदले अधिक से अधिक पैसा'' की मान्यता उस समाज में स्वीकार्य होती है जिस समाज में बाजार प्रणाली स्वीकार्य होती है। काम के बदले अधिक से अधिक पैसा पाने का अवसर उद्योगपति-व्यापारी लोगों के लिए तो होता है। लेकिन सरकारी कर्मचारी का वेतन तय होता है, वह अधिक काम करे तो पुरस्कार नही होता, कम काम करे तो सजा नही होती। यह व्यवस्था या तो उसे निकम्मा बनाती है। या पैसा लिये बगैर काम न करने को प्रोत्साहित करती है। इस दषा में भ्रश्टाचार रोंकने का व्यवस्थागत उपाय यही हो सकता है कि या तो बाजार प्रणाली समाप्त करके उद्योगपतियों - व्यापारियों को सुलभ काम के बदले अधिक से अधिक पैसा पाने का अवसर समाप्त किया जाये। जिससे ये लोग सरकारी कर्मचारियों के लिए भ्रश्टाचार का प्रेरणा स्रोत न बन सकें। दूसरा उपाय यह हो सकता है कि सरकारी कर्मचारियों में राश्ट्रीय भावना बढ़ाई जाये, उनका राश्ट्रीय चरित्र बनाया जाये, उनमें पाप बोध पैदा करके भ्रश्टाचार करने पर पारलौकिक भय भरा जाये।

       अनुभवों ने सिध्द कर दिया है कि सरकारी कर्मचारियों की षिक्षा-दीक्षा व समझ अब चरित्र निर्माण व राश्ट्र निर्माण करने का प्रवचन देने वालों से भी ज्यादा बढ़ गई है। इसलिये प्रवचन और उपदेष अब इनके सामने बौने पड़ने लगे है। उपभोग की राश्ट्रीय सीमा सरकारी षासक-प्रषासक  इसलिये नही मान सकते, कि यह सीमा किसी भी उद्योगपति-व्यापारी के परिवार मानने को तैयार नही है। इसलिए उपभोगतावाद पर इकतरफा अंकुष लगाया नही जा सकता।

       अगला उपाय यह बचता है कि - भ्रश्टाचार के मामले में कठोर दण्ड की व्यवस्था किया जाये। तब प्रष्न यह उठेगा कि कठोर दण्ड सरकारी षासकों-प्रषासकों व कर्मचारियों पर ही क्यों? एक तो कठोर दण्ड की व्यवस्था स्वयं न्याय की दृश्टि में समता के सिध्दांत का उल्लंघन करेगा। दूसरे इस कठोर प्रावधान से भी भ्रश्टाचार का एक नया विभाग खुल जायेगा। क्याेंकि सजा भी तो सरकारी कर्मचारी को ही मिलनी है, सजा देने वाला भी सरकारी कर्मचारी ही होगा। इस सजा से रियायत देने में लेन-देन षुरु हो जायेगा। अगर सजा के कठोर प्रावधानों से कुछ होता तो सरकार का विजिलेंस विभाग अपना चमत्कार जरूर दिखा रहा होता। एक वैज्ञानिक उपाय यह भी हो सकता है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग विभाग के वैज्ञानिकाें को कहा जाये कि वे अनुसंधान करके इतनी संख्या में ईमानदार आदमी परखनली विधि से पैदा करें, जितने लोगों की जरुरत सरकारी क्षेत्र में है। चूकि अभी तक इमानदारी वाला जीन पकड़ा नही जा सका है। इसलिए यह उपाय अभी मानव के वष के बाहर की बात है। उक्त उपायों की समीक्षा से स्पस्ट है कि अगर बाजार व्यवस्था त्यागी नही जाती तो भ्रश्टाचार रहेगा ही। यदि बाजार व्यवस्था भी बनाकर रखनी है तो अंतिम उपाय यह बचता है कि भ्रश्टाचार और बाजार दोनो की सहगामिता को असाध्य बीमारी मानकार उसी प्रकार स्वीकार कर ले, जैसे मृत्यु-जैसी मानव की तमाम कमजोरियाें को असाध्य मानकर स्वीकार किया गया है। वोटरषिप का प्रस्ताव इस रूप में भ्रश्टाचार पर प्रभावषाली अंकुष लगा देगा कि अब सरकारी विभाग लगभग षून्य किये जा सकेंगे। जब सरकारी विभाग न के बराबर रहेंगे तो भ्रश्टाचार का दीमक लगेगा कहां?

(ख)  व्यवस्थागत भ्रश्टाचार पर अंकुष

       यह कि व्यक्तिगत भ्रश्टाचार के उक्त उदाहरण के अलावा उत्ताराधिकार का कानून भी भ्रश्टाचार का बड़ा प्रेरणा स्रोत है। यह कानून किसी अरबपति आदमी के बेटे को बिना कुछ किये धरे ही अरबपति बना देता है। एक लोकतांत्रिक संसद द्वारा आर्थिक सत्ताा का इस प्रकार पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण किया जाना कानूनों की न्यायिक चेतना पर ही सवाल उठा देता है। जब कानून में आस्था और सम्मान ही न महसूस हो, तो कानून बनाने वाली विधायिका पर ही संदेह पैदा हो जाता है। चूंकि सरकारी क्षेत्र में कार्यरत षासन-प्रषासन करने वाले लोग आमतौर पर उच्च षिक्षित होते है। इसलिये विधायिका की अन्यायी चेतना को समझने में उन्हें ज्यादा देर नही लगती। वह इस बात को अपनी जुबान से न कहकर सीधें राताेंरात करोड़पति बनने की योजना बनाने लगता है। सरकारी कानूनों को तोड़कर जब सरकारी षासक या प्रषासक रातोंरात करोड़पति बनने के लिए कोई घोटाला करता है तो उत्ताराधिकार के कानूनों को देखते हुए उसे यह कृत्य गैर कानूनी भले लगे, अनैतिक नही लगता, अधार्मिक नही लगता, अनुचित और अन्यायकारी नही लगता। वोटरषिप के प्रस्ताव से लोग आष्वस्त हो सकेंगे-कि मेरे बाप की अयोग्यता की सजा सरकार ने मुझे नही दिया। यदि सरकार ने उत्ताराधिकार कानून से अरबपति के बेटे को अरबपति बनाया तो उसी सरकार ने राश्ट्रीय उत्ताराधिकार के सिध्दांतो से हर एक राश्ट्र पुत्रो व राश्ट्रपुत्री को वोटरषिप की नियमित रकम का अधिकारी भी बनाया। वोटरषिप की रकम हर व्यक्ति को जहां एक तरफ षिक्षा का व पोशण का अवसर दे देगी। वही दूसरी तरफ आर्थिक विशमता के पहाड़ की ऊंचाई कम कर देगी। इससे प्रदर्षन प्रभाव के कारण पैदा होने वाले भ्रश्टाचार पर प्रभावषाली अंकुष लग जायेगा।

(ग)  उपभोग्तावाद पर अंकुष -

       यह कि वोटरषिप के प्रस्ताव के लागू हो जाने पर असाध्य समस्या बन चुके उपभोग्तावाद पर भी लगाम लग जायेगी। इस निश्कर्श को निम्नलिखित कारणों से बल मिलता है-

            (i)         यह कि बाजार व्यवस्था मानव में एक हवस पैदा करती है। ऐसी हवस कि वह सोचता है कि क्या पायें, क्या खा जायें! इस उपभोग की हवस में वह स्वयं को इसलिए रोगग्रस्त बना लेता है कि उपभोग का जैविक नषा उसकी षरीर के तमाम अंगों को क्षतिग्रस्त कर देता है। इस नषाखोरी का परिणाम केवल उसी पर नही पड़ता, अन्य लोगों के स्वास्थय पर भी पड़ता है। अन्य लोग उस एक आदमी के उपभोग के कारण रोटी से भी वंचित हो जाते हैं। ये लोग कुपोशण के षिकार होकर रोगग्रस्त हो जाते हैं। उपभोक्तावाद के जैविक नषे पर व्यवस्थागत लगाम न लग पाने के कारण अमीर-गरीब दोनों वर्ग के लोग रोगग्रस्त हो गये हैं। इसका समाधान दवायें नही हैं। इसका समाधान उपभोक्तावाद पर अंकुष है। अमीर वर्ग पर वोटरषिप की रकम के लिए टैक्स लगाने से उपभोक्तावाद की जैविक नषाखोरी छोड़ने के लिए ये लोग बाध्य हो जाएंगे। इससे अमीर वर्ग के स्वास्थ्य का स्तर भी ऊपर उठेगा।

            (ii)         यह कि वोटरषिप की रकम मिलने से गरीब वर्ग भरपेट पौश्टिक भोजन कर सकेगा, इससे वह कुपोशण से कारण पैदा होने वाली बीमारियों पर हो रहा उसका खर्च बचेगा और कुपोशण से मुक्त होने पर उसका बौध्दिक विकास होगा, जो राश्ट्र को उन्नति की तरफ ले जाएगा। इस प्रकार उपभोक्तावाद के 'साइड-इफेक्ट' से राश्ट्र की रक्षा हो सकेगी।

            (iii)        यह कि उपभोक्तावाद की हवस सेक्स और मदिरा जैसी प्रचण्ड़ षक्ति रखने वाली नषाखोरी जैसी है। ये सभी तरह के नषे प्रवचनों और नसीहतों से नही छोड़े जा सकते। परिवार नश्ट होता रहे, षराबी षराब नही छोड़ता। इसी तरह परिवार का वातावरण व भविश्य चाहे चौपट हो जाये, एक बार वेष्यागमन का नषा पकड़ा तो यह नषेड़ी परिवार के भविश्य की कीमत पर वेष्यागमन करता है। इसी प्रकार  एक आर्थिक नषाखोर व्यक्ति चाहे अपना स्वास्थ्य बैठे-बैठे मनमानी करके बर्बाद कर ले, चाहे उसके मनमानी उपभोग से पूरा राश्ट्र  रोगग्रस्त हो जाये, चाहे करोड़ों गरीब लोग अर्थिक तंगी से मर जाये, लेकिन उपभोग्तावाद की नषाखोरी जिसको एक बार पकड़ी, वह इससे मुक्त नही हो सकता। षराबी की षराब तभी छूटती है, जब उसे बोतल खरीदने के लिए पैसा न मिले। वेष्यागमन से सेक्स का नषेड़ी तभी मुक्त होता है, जब उसकी जेब से वेष्या की फीस चुकाने का पैसा न रह जाये। इसी तरह अमीर वर्ग पर इस हद तक टैक्स लगना चाहिये। जब तक उसे उपभोग्तावादी  साधन खरीदने में मौलिक व न्युनतम उपभोग से वंचित होने का खतरा दिखाई पड़ने लग जाये। इसलिए उचित सीमा तक अभाव पैदा करने से ही उपभोग्तावाद की नषाखोरी से राश्ट्र मुक्त होगा, जो केवल वोटरषिप से ही संभव है।

            (iv)        यह कि कुपोशण से ग्रस्त भारत के ग्रामीणों को उपभोग्तावाद से दूर रखना इसलिए व्यर्थ है कि अपने आर्थिक अभाव के कारण वे इस सीमा तक पहुंच ही नही सकते। अत: गरीबों के बीच उपभोग्मावाद के खिलाफ प्रचार-प्रसार, विज्ञापन, भाशण, प्रवचन केवल समय धन, ऊर्जा की बर्बादी है और स्वयं को ही धोखा देने वाला काम हैं। दर्षक सर्कस के तम्बू में किसी रस्सी पर चल रहे कलाकार को देखता तो है, लेकिन तम्बू से बाहर आकर स्वयं रस्सी पर नही चलने लगता। प्रवचन से, स्वयं अपने चरित्र को सुधारकर या उपभोग से रहित जीवन का उदाहरण पेष करके उपभोग्तावादी नषाखोरों को इसलिए नही सुधारा जा सकता कि उपभोग त्यागी महापुरूश को ऐसे लोग सर्कस के कलाकर की तरह उपयोग करके आत्मरंजन करते है। इसी प्रकार उपभोग्तावादी नषाखोर उपभोग्तावाद विरोधी प्रवचनों के लिए सर्कसनुमा महापुरूशों के प्रवचन के लिए स्वयं तम्बू लगाते हैं लेकिन खुद  उनके प्रवचन के चक्कर में नहीं पड़ते। प्रवचन सुनेगे, लोगाें को सुनायेंगे और उसी दिन बाजार जाकर एक की जगह तीन कार लेकर आयेंगे। भूख न लगी होने पर भी रेस्टोरेंट में बैठकर पेट में बर्गर ठूंसेंेगे। जहाँ पैदल जा सकते हैं, वहाँ मोटरसाइकिल से जायेंगे। जहाँ मोटरसाइकिल से जा सकते हैं, वहाँ कार की सभी सीटें खाली रख के कार से जायेंगे। कपड़े को फटे बगैर उसे कबाड़ मे फेंक देंगे। जिस मकान में चार परिवार रह सकते हैं, उस मकान में अकेले रहेंगे। दवा खरीदकर लायेंगे, उपयोग न होने पर वापस नही करेंगे। उसे कूडे में फेंक देंगे। पैसे के अहंकार व प्रर्दषन प्रभाव के कारण सस्ती अस्पताल में जाकर इलाज नही करेगें, ऐसी अस्पताल में जाकर करेगें, जिसमें मोटी रकम लूटी जाती है। अपने पैसे को ऐसी कम्पनी में निवेष करेंगे, जहाँ रोजगार कम से कम मिलता हो, और अमीर वर्ग के उपभोग की सामान पैदा होती हो। घर का काम खुद करके षरीर का व्यायाम नही करेंगे, गरीबी का फायदा उठाकर 2-4 सौ रूपये के वेतन पर घरेलू मजदूर रखेंगे, उसके साथ जीवन भर जानवर जैसा बर्ताव करेंगे पार्कों में बेमतलब दौड़ कर पसीने बहायेंगे और समय न होने का प्रमाण पड़ौसियों को पेष करेंगे। उनके बच्चे सुबह दस बजे तक सोते रहें, घरेलू नौकर सुबह 4 बजे उठकर जुए में फँस जाये, ऐसी मंशा रखते है। घरेलू नौकर कहीं मंहगा न हो जाये, इसके लिए गरीबी की मौजूदगी को राश्ट्र के लिए जरूरी बतायेंगे और वोटरषिप की खिलाफत करेंगे। स्पश्ट है कि जब नषाखोरी इस हद तक पहुँच चुकी हो तो वह प्रवचनों से नियंत्रण्ा में नही आयेगी, वोटरषिप जैसे कठोर कानूनों से नियंत्रण में आयेगी।

            (v)         यह कि उपभोग्तावाद के नकली विरोधियों को उपभोग्तावाद पर अंकुष लगाने वाला वोटरषिप का उपाय पंसद नही आयेगा। इसके लिए वे ऐसे उपाय सुझायेंगे जिससे उपभोग्तावाद विरोधी प्रचार कार्य उनका इतना लोकप्रिय हो सके, कि स्वयं प्रचारक के लिए लोग खुष होकर उपभोग्तावादी साधन न्योछावर कर दें। अवचेतन में ऐसा आदमी उपभोग्तावाद के खिलाफ इसलिए प्रचार करता है कि स्वयं उसे मदिरा को पीने का मौका नही मिला। उपभोग्तावाद के खिलाफ जो लोग प्रचार करते घूम रहे है, उनमें से अधिकांष लोग अपने बेटे के गले पर टाई देखना चाहता है। जो स्वयं त्यागी महापुरूश बन गया है, वह अपने बेटे को 50 लाख की कार से उतर कर 5 करोड़ के महल में घुसते हुए देखने की तमन्ना सीने में छिपाये बैठा है। जो स्वयं को त्यागवादी और उपभोग्तावाद विरोधी कह रहा है, वह किसी उत्सव में कार से  जाता हैं तो सीना फूला हुआ होता है, बस से जाता है तो सीना पिचका हुआ हुआ हैं। यह व्यक्ति भी गोश्ठियों में उपभोग्तावाद के खिलाफ बड़ा धारदार बोलता है........। इन उदाहरणों से यह निश्कर्श निकलता है कि उपभोग्तावाद के कथित विरोधी भी वोटरषिप के उपाय जैसे किसी ऐसे उपाय का समर्थन नही करेंगे। जिससे उनके अपने व अपने बेटे के लिए भी उपभोग्तावाद की संभावनाएं खत्म हो जायें। ऐसे लोग वोटरषिप के खिलाफ अपनी नषाखोरी पर अंकुष लगने की पीड़ा व्यक्त नही करेंगे। अपितु वोटरषिप की खिलाफत करने के लिए विकास रुक जाने का बहाना बनायेंगे। इसलिए तथाकथित उपभोग्तावाद विरोधी लोगों द्वारा वोटरषिप के प्रस्ताव की किये जा रहे खिलाफत से गलतफहमी का षिकार नही होना चाहिए।

       उक्त पैरा -(i) से (v) तक की सूचनाओं व विष्लेशण से स्पश्ट है कि प्रवचन, नसीहतों, भाशण, विज्ञापन, चरित्र निर्माण के प्रयोगों आदि उपायों की बजाय वोटरषिप ही उपभोग्तावादी नषाखोरी पर अंकुष लगा सकता है व राश्ट्र को अर्थिक भ्रश्टाचार के दलदल से बाहर निकाल सकता है।

(घ)  राजनैतिक चन्दे का प्रबन्ध व आर्थिक भ्रश्टाचार पर रोंक-

       यह कि एक सीमा से ज्यादा अमीर लोगों द्वारा चंदे की ताकत से राजनीतिज्ञों व दलों को कठपुतली की तरह नचाने की प्रवृति भारतीय राजनीति में लगातार  बढ़ती जा रही है। वस्तुत: यह आर्थिक भ्रश्टाचार का  उदाहरण है, जो निम्नलिखित कारणों से वोटरषिप का प्रस्ताव लागू होते ही अंकुष में आ जायेगा-

            (i)         यह कि वोटरषिप की रकम की 5 प्रतिषत रकम उस व्यक्ति को देने का प्रस्ताव है, जिसे संबंधित मतदाता ने गत लोकसभा के चुनाव में वोट दिया था। देष की औसत आमदनी 3500 रूपया मासिक माना जाये, वोटरषिप की रकम 1750 रूपया मासिक माना जाये तो 1000 वोट पाने वाले लोकसभा के प्रत्याषी को  3,50,000 रूपये सालाना  सामाजिक कार्य करने के लिए वोटरषिप कोश से चन्दा प्राप्त होता रहेगा। जिस प्रत्याषी को एक लाख वोटें मिल जायेंगी, उस प्रत्याषी की सालाना आमदनी (वोटरषिप कोश से) 3,50,0000 (तीन करोड़ पच्चास लाख रूपये) हो जायेगी । यह रकम किसी प्रत्याषी के लिए अपने षुभचिंतक मतदाताओं के सुख-दुख से जुड़े रहने के लिए पर्याप्त होगी। जब कोई प्रत्याषी अपने मतदाताओं से नियमित संबंध बनाकर  रखेगा तो उसे चुनावी प्रचार-प्रसार के लिए अलग से विज्ञापन में खर्च करने की आवष्यकता भी न रह जायेगी। अगर इस धन से निजी सुख-सुविधा, मौज मस्ती के साधन बटोरने लगेगा तो आगामी चुनाव में उसकी वोट संख्या घट जाएगी। इससे वह मतदाताओं से जुड़ा रहने के लिए बाध्य होगा। जब मतदाताओं की ओर से उसे वोट व नोट दोनों चीजें मिलेगी, तो चंदे के लिए ऐसे अमीर लोगों के सामने हाथ फैलाने की नौबत खत्म हो जाएगी, जो चंदा देकर चुनाव जीतने पर उस व्यक्ति का गलत उपयोग करते है व आर्थिक भ्रश्टाचार करते है।

            (ii)         यह कि वोटरषिप कोश से राजनैतिक वित्ता या चंदे की समस्या हल होने से केवल समाज से दलों व राजनीतिज्ञों की ही आर्थिक समस्या हल नही होगी अपितु चन्दा देने वाले ईमानदार पूंजीधारकों की भी समस्या हल हो जाएगी, क्याेंकि अब चंदे के नाम पर आतंकित किये जाने की समस्या से ऐसे लोग मुक्त हो जाएंगे। यहां तक कि चन्दे के लेन देन को गैर कानूनी भी घोशित किया जा सकता है।

            (iii)        यह कि चंदा देने वालों के रिमोट कन्ट्रोल से लोकतन्त्र मुक्त होगा, तभी असली लोकतन्त्र जमीन पर उतर सकेगा क्योंकि अभी तक तो लोकतन्त्र के नाम पर चंदातंत्र ही चल रहा है।

            (iv)        यह कि चंदा देने की क्षमता से सम्पन्न लोग दो तरीके का राश्ट्रद्रोह और आर्थिक भ्रश्टाचार करते हैं। पहला तो यह कि वे चंदे के बदले जनप्रतिनिधि व नौकरषाही को निजी र्स्वाथों के लिए नचाते हैं व गैर-कानूनी काम करवाते हैं। दूसरे यह कि उपभोग्तावादी नषाखोरी की आदत के कारण ऐसे लोग उपभोग की राश्ट्रीय सीमा को तोड़ते हैं। वोटरषिप से दोनों तरीके के भ्रश्टाचार पर रोंक लगेगी । क्योंकि मनमानी उपभोग के लिए इतना पैसा ही नही होगा कि उपभोग की राश्ट्रीय सीमा को वे तोड़ सकें।

            (v)         यह कि एक लखपती आदमी इतना चंदा नही दे सकता कि राजनीतिज्ञ व नौकरषाह को निजी स्वार्थ में पथभ्रश्ट कर सके। करोड़पती व्यक्ति थोड़ी सी क्षमता हासिल कर लेता है तो वह व्यक्ति किसी राजनैतिक व्यक्ति को चंदा देकर या तो स्वयं राजनीतिज्ञ बनकर राजसत्ताा को लोकपथ से विक्षेपित करके पथभ्रश्ट कर सकता है। या चंदे की मोटी रकम देकर, व अपनी बोली बोलने वाले जनप्रतिनिधियों को चुनाव में जिता कर स्वयं आर्थिक भ्रश्टाचार कर सकता है। स्पश्ट है कि पैसे के स्वामित्व की एक सीमा है, जहाँ पहुँच कर अर्थसत्ताा राजसत्ताा जैसा व्यवहार करने लग जाती है। उत्ताराधिकार में जब इस सीमा से अधिक रकम किसी व्यक्ति को बिना परिश्रम व बिना परीक्षा के मिलती है, तो वह लोकतंत्र को विक्षेपित करती है तथा आर्थिक भ्रश्टाचार को बढ़ावा देती है। इस सीमा से अधिक रकम के उत्ताराधिकार को मान्यता देना, वस्तुत: राजनैतिक उत्ताराधिकार को मान्यता देने जैसा अलोकतांत्रिक आचरण है। उत्ताराधिकार कानूनों की सीमा तय करके ऐसे लोकतंत्र विरोधी कानून को खत्म करना चाहिये। इस विशय में विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय-9.1 का संदर्भ ग्रहण करें।

       उक्त पैरा (i) से (v) तक की सूचनाओं व विष्लेशणों से सिध्द है कि आर्थिक भ्रश्टाचार राेंकने के लिए वोटरषिप एक सक्षम उपाय है।

6. राश्ट्रप्रेम का उद्विकास-

       यह कि प्रेम का संबंध पैसे से भी है। जहां से पैसा मिलता है, वहां से प्रेम पैदा होता है। अगर मां-बाप बच्चें को पैसा न दें, काम करने की षर्त जोड़ दें। तो मां-बाप के प्रति बच्चों का प्रेम पैदा नही होगा। परिवार व नातेदारी में अधिकांष रिष्तों में पैसे के लेन-देन को अनिवार्य बनाया गया है। परिवारिक व नातेदारी के रिस्ते तभी चलते हैं जब एक पक्ष ले, दूसरा पक्ष दे। या फिर दूसरा पक्ष ले, पहला पक्ष दे। जिस परिवारिक रिष्ते  में लेने-देन ज्यादा मजबूत होता है-वह रिष्ता भी उतना ही ज्यादा मजबूत होता है। ससुराल व दामाद का रिष्ता इसी तरह का होता है। वोटरषिप के कारण इसी तरह का रिष्ता राश्ट्र व मतदाता के बीच कायम हो जायेगा। रिष्तों व प्रेम के इस अर्थषास्त्र से सिद्व है कि मतदाता उस संस्थान की षुभचिंता में सदैव तत्पर रहेगा, जो हर महीना उसके नाम मनी ऑर्डर भेजता हो। पति-पत्नी का रिष्ता काफी आत्मीय माना जाता हैं। इसमें भी लेने-देने की बड़ी अहं भूमिका हैं। पति-पत्नी के संबंधों के अध्ययन से भी पता चलता है कि यहां प्रेम का एक बड़ा आधार पैसा है। बच्चे के जन्म के धार्मिक अनुश्ठान से लेकर उसके मरने तक के अनुश्ठान में पैसे का लेन-देन है। बस राश्ट्र प्रेम नि:षुल्क अपेक्षित है। इसीलिए राश्ट्र प्रेम नही हो पाता। बिना पैसा लिये कोई सेना में भी भर्ती नही होता। जो नि:षुल्क राश्ट्रप्रेम की वकालत कर रहा है, वह भी राश्ट्र पर रहम नही कर रहा है। उपभोग की राश्ट्रीय सीमा को वह भी तोड़ रहा है। इसीलिये अपील करने वाले की अपील का प्रभाव नही होता। उक्त विष्लेशण से यह निश्कर्श निकलता है कि राश्ट्र के पुत्र-पुत्रियों व राश्ट्र के बीच रिष्ते को प्रेमिल रिष्ते में बदलने के लिए पैसे के लेन देन का प्रयोग करना ही अंतिम उपाय बचा है। वोटरषिप के प्रस्ताव में यह क्षमता अंतर्निहित है।

7. आर्थिक दलितों के साथ आर्थिक न्याय-

       यह कि सामाजिक वर्ण व्यवस्था के अत्याचार से बचाने के लिए षासकीय व प्रषासकीय पदों पर आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जिससे केवल निचली जातियों के अमीर लोगो के स्वाभिमान की ही रक्षा हो पा रही है। एस. सी./एस.टी. के 95 प्रतिषत से अधिक लोगों को इस आरक्षण व्यवस्था ने अपने सुरक्षा परिधि से बाहर बने रहने के लिए आरक्षित कर दिया है। ऐसी दषा में 95 प्रतिषत अनुसूचित समाज के गरीबों, लगभग 80 प्रतिषत अन्य पिछड़े वर्ग के गरीबों तथा 50 प्रतिषत सामान्य वर्ग के गरीब मतदाताओं के लिए सामाजिक न्याय का भी और आर्थिक न्याय का भी साधन वोटरषिप के नाम से मिलने वाली नियमित रकम ही हो सकती है। इन गरीबों के नाम जमीन आवंटित करने से, उत्पादन के साधन देने से या रोजगार देने से इन्हें आर्थिक न्याय नही मिल सकता - इन बात को ज्यादा विष्लेशण के साथ समझने के लिये इस याचिका के अध्याय - 3.1 तथा माक्र्सवाद से संबंधित अध्याय- 4(च) का संदर्भ ग्रहण करें। 

8. महिलाओं को उत्पीड़न से राहत-

       (क)   यह कि महिलाओं के उत्पीड़न की अधिकांष घटनायें इसलिये संभव हो पाती हैं, क्योंकि उनके पास आमदनी का कोई ऐसा जरिया नहीं होता; जिसकी वह स्वयं स्वामी हों ।  इसी वजह से वह एक षराबी व अपराधिक प्रवृत्तिा वाले पति का अत्याचार लगातार सहती रहती हैं, उसे दण्डित नहीं कर पाती।  वोटरषिप की नियमित रकम के कारण उसे ऐसी षक्ति मिल जायेगी, कि वह अकेले में व अभाव में भी अपने बच्चों की रोटी-कपड़ा-षिक्षा व चिकित्सा की न्युनतम जरूरतें पूरी कर लेगी।  पत्नी की बिछुड़न उसके पति को सुधरने का मौका देगी। 

       (ख)   भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाकाल में आय विहीनता तमाम महिलाओं को वेष्यावृत्तिा के दलदल में धकेल देती है।  वोटरषिप की नियमित आमदनी से प्राकृतिक आपदा के वक्त भी वह अपनी इज्जत-आबरू व बच्चों के प्राण की रक्षा कर लेगी।

       (ग)   वोटरषिप की नियमित आमदनी उन विधवाओं की प्रतिश्ठा बचा लेगी, जिनके पति बिना संग्रह किये मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं। अब इन विधवाओं के बच्चे पिता की मृत्यु के कारण षिक्षा व रोटी से वंचित नही होगे। इससे भिक्षावृति पर चमत्कारिक अंकुष लग लायेगा।

       (घ)   यह कि बहुत सी महिलायें अपने ऊपर हो रहे अत्याचार इसलिए सहती हैं क्योकि उन अत्याचारों की खिलाफत करने पर कानूनी लड़ाई षुरू हो जाने का अंदेषा रहता है। आय का कोई जरिया न देख कर कानूनी लड़ाई लड़ने की चुनौती वे स्वीकार नही कर पातीं। वोटरषिप की प्रस्तावित रकम उन्हें यह क्षमता दे देगी।

 

 

9.   गरीब परिवारों में जन्मी प्रतिभाओं के कत्लेआम पर प्रभावषाली रोंक

       (क)   यह कि जीन विज्ञान के ''पाजिटिव म्युटेषन'' के सिध्दांत ने यह साबित कर दिया है कि यह घटना घटने से पूर्व किसी अमीर या गरीब का परिवार नही देखती। यह घटना किसी भी परिवार में घट सकती है। जिस बच्चे में यह घटना घटती है। वह बड़ा होकर असाधारण योग्यता का होता है। जब यह घटना बच्चे के मानसनिक ढांचे के साथ घटती है तो यह बच्चा असाधारण प्रतिभा का होता है। इसी घटना के कारण असाधारण दार्षनिक, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, कलाकार पैदा होते है। यदि यह घटना किसी ऐसे बच्चें के अन्दर घट गई जो गरीब परिवार में पैदा होने जा रहा है, तो समाज इस महापुरूश को अपने हाथ से खो देता है। वोटरषिप की रकम चूंकि सभी परिवारों की गारंटीषुदा आर्थिक सुरक्षा दे देगी, इसलिये किसी भी घर में पैदा हुआ यह महापुरूश पढ़-लिख अपने महापुरूशत्व का साक्षात्कार कर सकेगा, दूसरे इस महापुरूश के महान योगदान से समाज वंचित भी नही होगा।

       (ख)   यह कि जीन विज्ञान की खोज करने वाला मेण्डल यदि युरोप की बजाय भारत जैसे किसी देष के गरीब परिवार में पैदा हो गया होता तो उसे उसके बाप के काम में बलात् लगाया जाता। वह इतना अषिक्षित होता कि समझ ही न पाता कि वह एक ऐसा वैज्ञानिक है जो युगाें-युगों तक की समस्त मानव जाति की आने वाली पीढ़ियों का अन्नदाता है। अगर दुर्योगवष वह समाज के हाथ न लगा होता, तो ऐसा हो सकता है कि आज भी विष्व समाज जंगलों की आदिम अवस्था में जी रहा होता। एक मेण्डल हजारों करोड़ लोगों का पेट भरने के लिए अकेले पर्याप्त है। वोटरषिप की रकम यदि गरीब परिवार में पैदा होने वाले ऐसे किसी एक मेण्डल को भी बचा सकी, तो समाज का यह लाभ वोटरषिप के प्रस्ताव के किसी भी काल्पनिक हानि पर भारी पडेग़ा।

       (ग)   यह कि वोटरषिप के प्रस्ताव को कार्यान्वित करने से नई खोजें तथा नये आविश्कार सामने आने लगेंगे।  आज की राजनैतिक-आर्थिक व्यवस्था में तो गरीब घरों में पैदा होने वाले तमाम वैज्ञानिक ठेला लगाते रह जाते है, तमाम दार्षनिक सड़क पर मिट्टी खोदते रह जाते है, तमाम ऋशि-मुनि गंदे नाले की सफाई करते रह जाते है, तमाम कलाकार जीवन भर रोटी का संघर्श करते रह जाते हैं, तमाम स्वतंत्रता सेनानी व महान नेतृत्वकर्ता कारखानों में खटते रह जाते है। प्रतिभाओं का यह कत्लेआम प्रतिभा पलायन से ज्यादा खतरनाक है, जो वोटरषिप से रुक जायेगी।

       (घ)   गरीब परिवारों में चूंकि विष्व की औसतन जनसंख्या का 70 फीसदी रहता है। इसलिए इतने ही प्रतिषत संभावना है कि गरीबी की मौजूदगी के कारण मानव समाज 10 में से केवल 3 महापुरूशों का लाभ ही उठा पाता है, 7 महापुरूश के योगदान से वंचित रहता है। एक मेण्डल, एक आइंस्टीन, एक एडीषन..... जैसे महापुरूशों का योगदान इतना है, तो गरीबी की मौजूदगी खत्म हो जाने पर उन नये महापुरूशों के योगदान की कल्पना कितनी रोमांचक है जिनका कत्लेआम वोटरषिप के अभाव के कारण रुक जायेगा। इस दृश्टि से वोटरषिप की रकम मानव जाति के उत्थान के लिए एक दीर्घकालिक निवेष भी है।

       उक्त (क) से (घ) तक के बिन्दुओं के विश्लेशण, सूचनाओं व निश्कर्शो के आधार पर कहा जा सकता है कि वोटरषिप के प्रस्ताव पर गरीब परिवारों में पैदा हो रही असाधारण प्रतिभाओं के कत्लेआम पर निष्चित रूप से रोक लगेगी और वोटरषिप की यदि कुछ काल्पनिक खामियां होंगी भी, तो ये प्रतिभायें  अकेले उनकी भरपाई कर देंगी।

10. प्राकृतिक आपदाओं में स्वचालित राहत प्रणाली का उदय -

       यह कि अकाल, भूकम्प, समुnzी चक्रवात, सूखा, बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय कुछ लोग मष्त्यु के ग्रास बन जाते हैं, उनकी अचल सम्पति लगभग पूर्णतया नश्ट हो जाती है। ऐसी दषा में सरकार को व सामाजिक संस्थाओं को तत्काल आर्थिक राहत देना पड़ता है। इस राहत व्यवस्था में आर्थिक संसाधनों का बड़ी मात्रा में अपव्यय व दुरूपयोग होता हैं। अनुभवों ने यह सिध्द कर दिया है कि राहत की यह रकम कुछ क्रूर लोगों को निजी राहत पहुंचाती है, जो ऐसे मौकों की ताक में रहते है। समाज व सरकार की इतनी बड़ी रकम का ऐसे मौके पर भ्रश्टाचार की चढ़ती हुई बलि को देखते हुए इसे कोई समुचित प्रबंध नही कहा जा सकता। इसी आपदा राहत के नाम पर धन के संग्रह की वकालत की जाती है। प्राकृतिक आपदायें तो कभी-कभी आती है लेकिन इसके आवरण में जो धन के संग्रह का तर्क स्वीकार कर लिया गया है, उसने गरीबी की आपदा को स्थाई रूप से धरती पर उतार दिया है। देखने में यह आता है कि तमाम दान, परोपकार, सरकारी अनुदान, स्वैच्छिक सेवा के बावजूद प्राकृतिक आपदायें भिक्षावष्ति व वेष्यावृति का कचड़ा अपने पीछे छोड़ जाती हैं। वोटरषिप की नियमित रूप से मिलने वाली प्रस्तावित चल सम्पति को कोई प्राकृतिक आपदा नश्ट नही कर सकती। इस रकम की लालच में बड़ी-बड़ी व्यावसायिक कम्पनियां इन क्षेत्रों में अपनी सेवायें देने पहुंच जायेंगी, जो हर हाल में स्वैच्छिक सेवकों से ज्यादा प्रभावषाली साबित होंगी। इस प्रकार वोटरषिप की रकम प्राकृतिक आपदाओं के समय एक स्वचालित राहत प्रणाली की भूमिका निश्पादित करेगी।

11. राश्ट्र की दिमागी विकलांगता का इलाज-

       यह कि गरीबी इंसान के दिमाग में चिन्ता पैदा करती है। चिंता की लगातार उपस्थिति दिमाग के चिन्तन की क्षमता को पंगु बना देती है। चिन्तन न करने वाला परिवार केवल अपने हाथाें से काम लेता है, दिमाग से नही। जो परिवार दिमाग से काम लेता है, वह आर्थिक दौड़ में अन्य परिवारों से पिछड़ जाता है। इसी प्रकार जिस देष के लोग दिमाग से काम नही लेते, वह देष विकास में अन्य देषों से पिछड़ जाता हैं। उत्पादन में षरीर श्रम का हिस्सा लगातार गिर रहा है, मानसिक श्रम का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। अर्थव्यस्था की इन प्रवृतियों को देखते हुए स्पश्ट है कि दुनिया में वही देष तरक्की करेगा, जो अपने अधिक से अधिक नागरिकों को चिन्तन करने का मौका देगा। भारत में 70 फीसदी परिवार आर्थिक बेड़ियों में इस कदर जकड़े है कि उनका दिमाग काम ही नही करता। जो देष अपने 70 फीसदी नागरिकों के दिमाग पर ताले मार रखा हो, वह विष्व अर्थव्यस्था के स्टेडियम में केवल दौड़ने की कल्पना भर कर सकता है, दौड़ नही सकता। वोटषिप की रकम इन 70 फीसदी परिवारो में चिन्तन व दिमागी परिश्रम की तीब्र लहर पैदा कर देगी और पूरा राश्ट्र मानसिक विकलांगता से छुटकारा पा जायेगा। इस रकम से नियमित प्राप्त होने  का आष्वासन मिल जाने पर हर व्यक्ति अपना आत्म साक्षात्कार करके अपनी रूचि व अपनी क्षमता के अनुकूल कोई क्षेत्र चुन कर अपना योगदान करने में जुट जायेगा। समाजसेवा की क्षमता रखने वाले समाज प्रबंध का काम संभाल लेगे। राश्ट्र निर्माण की क्षमता रखने वाले राश्ट्र निर्माण मे लग जायेगे, चरित्र निर्माण वाले लोग व्यक्ति के मूल्यगत अध: संरचना बनाने में लग जायेंगें, वैज्ञानिक अभिरूचि वाले अपनी खोज में लीन हो जायेगें, साहित्यिक योग्यता के लोग धन की तलाष से मुक्त होकर अपनी आत्मा को अभिव्यक्त कर सकेंगे, कलाकार अपनी कला की साधना करेगें, अब रोटी के लिए उन्हें अपनी साधना से विमुख होने की जरूरत खत्म हो जायेगी। जो लोग राश्ट्र के लिये भारी उत्पादन कर सकते होंगे, वे उद्योग-व्यापार का काम संभाल लेंगे ।

12. अनैच्छिक वेष्यावृति से छुटकारा व पुनर्वास -

       यह कि विधवा हो जाने पर, पिता की गरीबी के कारण षादी बगैर रह जाने  पर, प्राकृतिक आपदाओं में बेघर हो जाने पर, किसी वेष्यालय के दलाल के हाथ पड़ जाने पर या अन्य किसी कारण से बहुत सी महिलाओं को वेष्यालयों में पहुंचा दिया जाता है। उनके साथ बलात्कार का लम्बा सिलसिला चलता है। इस बेइंतहां षारीरिक व मानसिक जुल्म का षिकार तमाम महिलायें वेष्यालयों में अपनी लाष ढ़ो रही है। इनमें से तमाम इस पेषे से निकलना चाहती है, या अपने बच्चों को इस पेषे से बाहर निकालना चाहती हैं लेकिन न तो इन्हें समाज स्वीकार करता है और न इनके पास आय का कोई वैकल्पिक जरिया ही होता है-कि वे समाज की स्वीकार्यता की परवाह किये बिना इस पेषे को छोड़कर कोई अपना समाज बना सकें। चूंकि वोटरषिप की रकम बलात्कार की षिकार इन महिलाओं के घर में भी नियमित रूप से पहुंचेगी, इसलिये जो महिलायें इस पेषे को अपनी मर्जी से नही अपनायी हैं वे इस दलदल से बाहर निकल कर अपना नया जीवन षुरू कर सकेंगी। इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिये इस याचिका की उपयोगिता से संबंधित पैरा-810 का संदर्भ ग्रहण करें।

13. महापुरुशों की आत्माओं को षांति-

       (क)   यह कि भारत की राजनैतिक आजादी के समस्त स्वतंत्रता सेनानी यह सपना देखते थे, कि अंग्रजों के भारत छोडने पर भारत में व्याप्त चौरतफा गरीबी, बेकारी, लाचारी, बेबषी खत्म होगी। चूंकि वोटरषिप की नियमित रकम घर-घर पहुंचेगी, इसलिये देर से ही सही स्वतंत्रता सेनानियों की आत्मा को षांति मिलेगी।

       (ख)   यह कि महात्मा गांधी ने राजनैतिक आजादी की लड़ाई के जीत लेने के बाद आर्थिक आजादी की लड़ाई षुरू करने के लिए घनष्याम दास बिड़ला से कहा था।  किन्तु यह लड़ाई षुरू करने से पूर्व ही उनकी हत्या हो गई। आर्थिक न्याय की संभावना पैदा करने के लिये ही नेहरू ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की प्रणाली अपनाई थी, जिसे देष के घरेलू व विदेषी विष्वव्यापारियों ने सन 1995 में नश्ट कर दिया। भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारी षहीदों ने तो राजनैतिक आजादी को आर्थिक न्याय का साधन मानकर अपनी जान गंवाया था। अम्बेडकर आर्थिक आजादी के बगैर राजनैतिक आजादी को मूल्यहीन समझते थे। दीनदयाल  उपाध्याय आर्थिक लोकतंत्र के बिना लोकतंत्र को नकली मानते थे। वितरण के न्याय के लिये विनोवा ने पूरा जीवन तपस्या में बिता दिया। आनन्दमूर्ति ने न्युनतम जरूरतों की गारंटी के लिये विष्वव्यापारी संघर्श की योजना बनाई ।  लोहिया और जे0 पी0 की समाजवादी पार्टी का मक्सद ही आर्थिक जुल्मों का उन्मूलन करना था। कार्ल माक्र्स तो आर्थिक न्याय का विष्व प्रतीक ही थे, इस विशय में वह परिचय के मोहताज नही है। इन सभी महापुरूशों व ऐसे ही प्रयास में अपना जीवन अर्पित कर देने वाले तमाम आत्माओं को वोटरषिप का प्रस्ताव कार्यान्वित होने से अवर्णनीय षांति प्राप्त होगी।

       (ग)   अर्थषास्त्रीय महापुरुशों ने अर्थषास्त्रीय सिध्दांतो की खोज में अपना जीवन लगा दिया। लगभग सभी इस नतीजे पर  पहुंचे, कि विकास के लिए आर्थिक असमानता आवष्यक है लेकिन जब यह असमानता सीमा तोड़ दे, तो यह समाज के लिए विध्वंषकारी हो जाती है। वोटरषिप का प्रस्ताव असमानता को सदैव सीमा में बांधकर रखेंगी ।   इसलिये इन सभी अर्थषास्त्रियों की खोज का लाभ समाज उठा सकेगा, व इनकी आत्माओं को षांति मिलेगी। इस विशय में और ज्यादा स्पस्टीकरण के लिये इस याचिका के अर्थषास्त्रीय स्पश्टीकरण से संबंधित अध्याय - का संदर्भ ग्रहण करें।

       (घ)   यह कि महान दार्षनिक प्लूटो का निश्कर्श था कि जब तक राज्य पर दार्षनिक राजा विराजमान नही होता, तब तक प्रजा कश्ट में रहेगी। वोटरषिप के प्रस्ताव के कारण विष्व अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा, उसका प्रबंधन ऐसी विश्वराज्य व्यवस्था द्वारा ही संभव होगा, जिसे प्लूटो की परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाला राजा ही चला सकेगा। लगभग प्लूटो की ही सोंच के वेद व्यास व कष्श्ण भी थे, जिन्होंने दुर्योधन को सिंहासनच्युत करके युधिश्ठिर जैसे सत्यवादी विद्वान को सिंहासन दिलाने के लिए संघर्श किया। तुलसीदास ने राजा को राम जैसा समदर्षी होना आवष्यक बताया। आज तुलसीदास होते तो उनका राम एक ऐसा समदर्षी होता, जो केवल अपनी पत्नी व धोबी के बीच ही समदर्षी न होता, अपितु दुनिया के सभी देषों के प्रति विष्व समदर्षी होता। चूंकि विष्व अर्थव्यवस्था का संचालन कोई विष्व समदर्षी ही कर सकता है, केवल ऐसे ही व्यक्ति की न्यायवादिता विष्व भर को रास आ सकती है। देकार्त, बर्कले, स्पिनोजा, लॉक, कांट, हीगल, फायरबाख, स्पेंसर जैसे सभी दार्षनिकों ने राज्य के उस ताने-बाने की खोज में अपना जीवन लगाया, जो राज्य अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख का साधन बन सके। एेंगेल्स व माक्र्स ने तो विष्व मानवता को असह्य आर्थिक पीड़ा से बाहर निकाला। बट्रेन्ड रसेल ने तो भविश्य के राजनैतिक मूल्यों का पूरा खाका ही खींच दिया है, जिसे आज का समाज अपनी दिग्दर्षक सूई मान सकता है। आधुनिक युग में नेहरू, बिनोवा, आनन्दमूर्ति, ओषो रजनीष, हैराल्ड लास्की तथा महर्शि अरविन्द में से सभी ने संकीर्ण राश्ट्रवाद को अप्रासंगिक बताया व विष्व राज व्यवस्था में षासन-प्रषासन की योग्यता हासिल करने का मंत्र दिया। ओषो कहते थे कि -''आने वाली पीढ़ियां आज की पीढ़ियों से कहेंगी कि क्या उस वक्त कोई एक भी विचारक पैदा न हुआ जो कहता कि खाने-पीने के लिए काम की जबरदस्त षर्त लगानी अनैतिक है।'' वोटरषिप के रकम की खोज का प्रयास, उसके प्राप्तकर्ताओं व दाता संस्थानों के निर्माण्ा की प्रसव पीड़ा तथा उसके बाद इस रकम को बढ़ाने की राजनैतिक कवायद पूरे विष्व में राजनैतिक सुधारों की एक ऐसी लहर पैदा  कर देगी, जिससे राज्य का वह ढ़ाचा पैदा होगा, जिसे देखकर उक्त सभी महापुरुशाें की आत्मायें गद्गद हो जायेगी। इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिये इस याचिका के अंतर्राश्ट्रीय मामलों के विष्लेशण संम्बंधी अध्याय - 5 का   संदर्भ लें।

       (ड़)   यह कि ऋग्वेद, उपनिशदों, स्मृति व सूत्र ग्रंथों के रचयिताओं से लेकर आज तक पैदा होने वाले विविध पंथो-संम्प्रदायों के प्रवर्तकों मे से किसी ने नही कहा कि बिना किसी की परवाह किये मनमानी उपभोग करो। सबने 'जिओ और जीन दो' तथा संयम से जीने की सलाह दी। महावीर स्वामी व महात्मा बुध्द तो असंग्रह के बहुत ही प्रबल हिमायती थे। ईसा मसीह ने तो स्पश्ट कहा कि- ''तुम्हारे दो कपड़े पहनने को हों, तो एक किसी दूसरे को दे दो''। पैगम्बर मोहम्मद साहब यदि आर्थिक विशमता के पक्षधर होते, तो विशमता को पैदा करने वाली ब्याज जैसी प्रमुख चीज पर इतनी बेबाक टिप्पणी न करते। आर्य समाज के प्रणेता स्वामी दयानन्द सरस्वती ने तो आर्थिक व राजनैतिक केन्द्रीकरण का हर तरीके से विरोध किया। महात्मा गांधी से प्रेरणा लेकर समकालीन संत आचार्य श्रीराम षर्मा ने तो राश्ट्र की औसत आमदनी की रेखा को अपने उपभोग की लक्ष्मण रेखा मानकर आजीवन उसका पालन किया। वोटरषिप का प्रस्ताव उक्त सभी संतो की सादगी की जीवनषैली को अब कानूनी दर्जा देने जा रहा है, इसलिये उक्त सभी संत जो जियो और जीने दो की मानव सभ्यता के प्रचार-प्रसार में अपना जीवन लगाया - इन सभी की आत्माओं को असीम षांति मिलेगी ।

       उक्त (क) से (ड़) तक की सूचनाओं, तर्को व विष्लेशणों के मद्देनजर सिध्द है कि वोटरषिप के प्रस्ताव से विविध विचारधाराओं के रूप में पैदा हुई परमात्मा की विविध षाष्वत षाखाओं को असीमित षांति मिलेगी।

14. बहुराश्ट्रीय कम्पनियों पर क्षतिपूर्ति दायित्व-

       (क)   यह कि बहुराश्ट्रीय कम्पनियों को चलाने वाले बहुराश्ट्रीय व्यापारियो ने एक आंदोलन चलाकर देषों की आर्थिक सीमाएं तोड़ दिया। उन्हाेंने सभी देषों में अमीर लोगो से जाकर कहा कि हम कम पैसे मे ज्यादा बढ़िया सामान देने को तैयार हैं, लेकिन आपके देष की सरकार बीच मे दीवार बन रही है। ''मियां बीवी राजी, तो क्या करेगा काजी''- वाली तर्ज पर उपभोक्ताओं ने कहा कि हमें अच्छी सामान कम दाम में मिलेगी तो हम खरीदेंगे ही, चाहे वह सामान अपने देष की कम्पनी बनाये, चाहे किसी दूसरे देष की कम्पनी बनाये। बेचने वाले और खरीदने वाले पैसे का फायदा देखकर देषों की दीवारें तोड़कर इकठ्ठा हो गये। इनके संगठन का नाम पहले ''गैट'' और बाद में ''विष्व व्यापार संगठन'' रखा गया। देषों की आर्थिक दीवार टूटने और विष्वव्यापारियों व विष्व उपभोक्ताओं द्वारा एकजुट हो जाने के कारण लगभग दुनिया की सभी सरकारों के आर्थिक प्रबंधन का अधिकार लगभग समाप्त सा हो गया। सरकार की आर्थिक मदद से चलने वाले उद्योग- धंधें बन्द होने लगे, व बेरोजगारी बढ़ने लगी। बेरोजगारी बढ़ने से मजदूरी की दरें नीचे गिरी, जिससे गरीबों की संख्या बढ़ने लगी। विष्वव्यापारी बहुत तेजी से अमीर होने लगे मध्य वर्ग का आकार भी बढ़ गया लेकिन साथ ही साथ बेरोजगारी बढ़ने से गरीबी ने बहुत सारे उन लोगों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया जो पहले मध्य आर्थिक वर्ग की सीमा पर खड़े थे। स्पश्ट है कि विष्व व्यापारियों को सभी देषों में मौजूद गरीबों की रोटी की कीमत पर ही लाभ प्राप्त हुआ, व हो रहा है। आर्थिक  न्याय का यह भी तकाजा है कि विष्व व्यापारी चूंकि सभी देषों में गरीबी बढ़ा दिये, इसलिए उन गरीबों की क्षतिपूर्ति का दायित्व भी विष्व व्यापारियों का ही बनता है। वोटरषिप की रकम का वह हिस्सा, जो गरीबों के खाते में जाना प्रस्तावित है, उस रकम को देने की जिम्मेदारी या तो विष्व व्यापार संगठन की है, या फिर अपने देष के उपभोग की राश्ट्रीय सीमा का उलंघन करने वाले अपने देष के विष्व उपभोक्ता नागरिको की है, या फिर दोनो की है।

       (ख)   यह कि अर्थ प्रबंधन का कार्य बिना सरकार के संभव नही हो सकता क्याेंकि विनिमय प्रणाली का अस्तित्व सरकार के अस्तित्व पर ही निर्भर करता है। मुद्रा बाजार का विनियमन सरकार का विषेशाधिकार हैं। देषों की जब अलग-अलग बाजारें व अर्थव्यवस्थायें थीं तो उन सभी अर्थ व्यवस्थाओं को वहां की सरकार संचालित करती थी। विष्वव्यापार संगठन ने राज्य के इस अधिकार को बड़ी गहराई से प्रभावित कर दिया। अब अर्थव्यवस्था का विष्व स्तर पर साझात हो गया। किन्तु इस अर्थव्यवस्था को संचालित करने के लिए न तो विष्व के राजनैतिक दलों में ही कोई समझौता हुआ और न तो विष्व की कोई साझा सरकार ही बनी। स्पश्ट है कि आर्थिक सत्ताा ने राज सत्ताा को उसी तरह दबोच लिया है जैसे बिल्ली चूहे को अपने जबड़ों मे दबोच लेती है। जिस प्रकार उपभोग्ता अधिकार के नारे ने विष्व के उपभोग्ताओे का एक वैष्विक संगठन खड़ा कर दिया, वोटरषिप का प्रस्ताव ठीक उसी प्रकार पूरी दुनिया के गरीब नागरिकों का एक वैष्विक संगठन खड़ा कर देगी। जो राज्य व न्याय में आस्था को बरकरार रखने के लिए अपरिहार्य है।

       (ग)   यह कि उक्त गैट समझौते में यदि राज्य ने विष्व व्यापारियों और अपने देष के विष्व उपभोग्ताओं के आन्दोलन का साथ दिया, समझौते पर हस्ताक्षर किया। अब गरीबों की बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए सरकार का कर्तव्य बनता है कि वह स्वयं एक और समझौते का मसौदा तैयार करके अपने देष मे गरीबों की वकालत विष्व व्यापार संगठन में करें। इस समझौते का मसौदा तैयार करना व उस समझौते द्वारा गरीबों को वित्ताीय क्षतिपूर्ति दिलवाने के आन्दोलन का नेतृत्व करके विष्व जनमत बनाना देष की सरकार का काम है । क्योकि आर्थिक अभाव की दषा देखते हुए गरीब लोग स्वयं यह आन्दोलन नही चला सकते। यदि सरकार अपने देष के गरीबों को क्षतिपूर्ति दिलाने का कार्य नही करती तो स्पश्ट होगा कि सरकार अपने देष के केवल विष्व उपभोगताओं के आर्थिक हितों का ही प्रतिनिधित्व करती है, सभी नागरिकों का प्रतिनिधित्व नही करती। सरकार वास्तव में किसकी सरकार है, यह जांच करने में वोटरषिप का प्रस्ताव एक लिटमस टेस्ट का काम करेगा।

       (घ) यह कि यह तर्क अज्ञानता पूर्ण प्रष्न है कि देष के गरीबों को विष्व व्यापार संगठन जैसा विदेषी संस्थान वित्ताीय क्षतिपूर्ति क्यों दे? यह तर्क कुल छह कारणों से स्वीकार नही किया जा सकता। पहला यह कि, यह संगठन कोई विदेषी संगठन न होकर देष के विष्व व्यापारियों व देष के विष्व उपभोग्ताओें के आर्थिक हितों का प्रतिनिधत्व करने वाला संगठन है, केवल इसका कार्यालय भर विदेष में स्थित है। दूसरा यह कि, यह वह संगठन है, जो देष के विष्व उपभोग्ताओं व देष के विष्व व्यापारियों के कंधे पर बन्दूक रखकर देष के गरीबों का नरसंहार करता है ।  इसलिए यह देष के ही गरीबों का क्षतिकर्ता अभियुक्त है। तीसरा यह कि, इस संगठन ने अपनी नियमावली द्वारा देष, विदेष, सरकार व नागरिकता का परम्परागत आषय उलट-पुलट दिया है। इसलिए विदेष के परम्परागत अर्थो में न तो इसके कार्यालय के पते को ''विदेषी स्थल'' कहा जा सकता है और न तो इस कार्यालय तक आने-जाने में कोई भी बाधा ही होनी चाहिए, यहां आना-जाना पूरी तरह वीजा-पासर्पोट नियमों से मुक्त होना चाहिए था । जिसका न होना एक विडम्बना है, जिसे दूर किया जाना चाहिए। चौथा यह कि, जितने क्षेत्र में  WTO स्थित है, उतने क्षेत्र पर किसी देष का अधिकार नही हो सकता। यह विष्व उपभोक्ताओं, विष्व व्यापारियों व विष्व के गरीबों की साझी जगह है। इस कार्यालय में बे राेंक-टोक जाकर सभी देषों के विष्व उपभोक्ता अपना अधिकार बढ़ा सकें, व इस कार्यालय के सामने जाकर विष्व के सभी सदस्य देषों के गरीब नागरिक इस संगठन से अपनी वित्ताीय क्षतिपूर्ति की मांग के लिए लोकतांत्रिक धरना-प्रदर्षन कर सकें। इस सुगमता का प्रबंध करना सदस्य देषों की सरकारों व विष्व व्यापारियों का साझा कर्तव्य है। पांचवा यह कि, विष्व के किसी भी सदस्य देष से विष्व व्यापार संगठन कार्यालय तक जाने वाले सड़क मार्ग व रेलमार्ग पर किसी देष का अधिकार नही हो सकता, क्योंकि यदि कोई देष इस सड़क पर अपने अधिकार का दावा करता है, WTO कार्यालय तक जाने वाले रास्ते पर टैक्स वसूलना दुनिया के गरीब नागरिकों को उनके अभियुक्त के दरवाजे तक पहुंचने से रोंकने जैसा कृत्य है। छठां यह कि, जो सरकार अपने देष के विष्व व्यापारियों और विष्व उपभोक्ताओं से देष की सीमाओं का आदर नही करवा सकती, उस सरकार को कोई नैतिक अधिकार नही है कि वह गरीबों को दुनिया में अपने हितों का आर्थिक संघर्श करने के लिए सीमाओं के नाम पर किसी देष में  आने-जाने से रोंके।

       (ड़)   यह कि विष्व व्यापार संगठन को विष्व व्यापारियों व विष्व उपभोक्ताआें से इतनी रकम वित्ताीय क्षतिपूर्ति के रूप में वसूलनी ही होगी, जितनी रकम विष्व भर के सभी सदस्य देषों के सभी गरीब मतदाताओं को वोटरषिप की रकम का नियमित भुगतान करने के लिए आवष्यक हो। विष्व व्यापारियों से वसूले गये आय कर की राषि पर विष्व के सभी गरीबों का समान हक है, क्योंकि इन्हीं के नुकसान की कीमत पर विष्वव्यापारियों का लाभ होता है। देष के गरीब मतदाताओं के लिए वोटरषिप की रकम नियमित उपलब्ध कराने व विष्व व्यापारियों से यह रकम विष्व आयकर के रूप में वसूलने के लिये एक विष्व समझौता सम्पन्न कराया जाना चाहिए। इस कार्य में भारत सरकार को अपने हिस्से की भूमिका निभाना ही होगा, अन्यथा यह साबित हो जायेगा कि भारत के लगभग 60 करोड़ गरीब मतदाता सरकार विहीन व संसद विहीन हो गये हैं। विष्व व्यापार संगठन के समक्ष इस समझौते के लिए संघर्श करने के लिए वोटरषिप का प्रस्ताव भारत को एक वैचारिक अधा: संरचना उपलब्ध करायेगा।

       (च)   यह कि वोटरषिप की रकम का भुगतान करने के लिए भारत सरकार विष्व व्यापार संगठन से कह सकती है, इसके लिए ''सोषल ईष्यूज'' के नाम से मौजूद गैट समझौते में खुली संभावना का सरकार उपयोग कर सकती है।

       (छ)   यह कि यदि भारत सरकार देष के गरीबों को विष्व व्यापार संगठन से वोटरषिप की नियमित रकम वसूलकर भुगतान करने में अपने को सक्षम नहीं पाती तो विष्व व्यापारियों व अपने देष के गरीबो के बीच मध्यस्तता करने से हट जाये। अगर सरकार इन दोनो वर्गो के बीच से हटती भी नही, और वोटरषिप की रकम दिलाती भी नही, तो साबित होगा कि दोनों वर्गो के बीच सरकार नकली पंच हैं।  चूंकि सरकार पंचायत करने का नकली स्वांग कर रही है, इसलिये ऐसी सरकार की अवज्ञा करना हर गरीब नागरिक का फर्ज बन जायेगा, उनकी आत्मरक्षा के लिए ऐसी अवज्ञा का साथ देना संवेदनशील अमीर लोगों के लिए अपरिहार्य हो जायेगी।

       (ज)   यह कि बहुराश्ट्रीय कम्पनियों व विष्व व्यापार संगठन के दायित्व के विशय में और विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अंतर्राश्ट्रीय मामलों संबंधी अध्याय - 5 का, तथा इस याचिका के संलग्नक 46 का संदर्भ ग्रहण करें।

      (झ)  डब्लूटीओ व गरीबों के बीच सरकार असली पंच बने,

 क्योंकि&

            i)    यह कि अनुभव यह बताते है, कि भारत सरकार डब्लूटीओ के फोरम पर काल्पनिक भारत को विकसित देष बनाने की नीति पर काम करती है, वास्तविक भारत यानी यहां के बहुसंख्यक गरीब नागरिकों की कोई चिंता व्यक्त नही करती। इस तरह यदि भारत विष्व व्यापार संगठन की विधियों के अनुसार विष्व बाजार की प्रतिस्पर्धा में अपना स्थान बना ले, फिर भी इससे यह आष्वासन  नही मिलता कि यहां के विषाल गरीब जनसमुदाय इस संवृध्दि में अपना हिस्सा प्राप्त कर सकेंगे।

            ii)    यह कि भारत सरकार की नीतियों से पूर्वाभास यही होता है कि विष्व बाजार की गला काट प्रतिस्पर्धा में भारत को स्थान दिलाने के लिए केवल श्रमिकों की मजदूरी कम करके उन्हीं का गला काटा जाएगा, षेश लोग कोई आर्थिक त्याग न तो करने की मंषा रखते हैं, न सरकार करवाना चाहती है और न तो सरकार की ऐसा करवा पाने की हिम्मत ही है। चूंकि सरकार की संप्रभुताकमजोर पड़ चुकी है, अत: देष के आर्थिक रूप से सम्पन्न लोग सरकार की हुक्मउदूली करने के आदती हो गए है। ऐसी दषा में जबकि काल्पनिक भारत की संवृध्दि में भारत के गरीब समुदाय को कोई हिस्सा नही मिलना है तो वे विष्व बाजार व्यवस्था को बनाने में अपना सहयोग क्यों दें?

            iii)   यह कि देष के गरीब विष्व बाजार व्यवस्था से आष्वस्त हो सकें, इसके लिए आवष्यक है कि भारत सरकार अपने विदेष मंत्रालय की सारी ऊर्जा इस याचिका के अध्याय - 9(2,3,4) में लगाए और गैप (GAPP) समझौते के लिए विष्व जनमत का निर्माण करे।

            iv)   यह कि भारत सरकार व भारतीय विधि व्यवस्था जब तक आर्थिक लोकतंत्र की व्यवस्था पर सिध्दांत रूप में सहमति नही व्यक्त करती, व इस दिषा में कुछ ठोस करती नहीं। तब तक भारत की संवृध्दि के नाम पर मुठ्ठी भर लोगों को सस्ता विलास सुलभ कराने के लिए भारत के गरीब लोग बैल की तरह काम करके 'ऊर्जा का विकल्प' बनने को तैयार नही हो सकते।

            v)    यह कि सरकार गरीबों के आर्थिक हितों की भी प्रतिनिधि है यह बात तभी साबित हो सकती है, जब सरकार विष्व मंचों पर जिस प्रकार भारत के उद्यागपतियों व व्यापारियों की आवाज बुलंद करती है; उसी प्रकार इस याचिका के अध्याय - 9 की बातों को ज्ञापन स्वरूप विष्व मंचों पर रखे और गरीबों के हितों की चिंता केवल भाशणों में करने की बजाय आचरण से भी करे।

                उक्त पैरा - (i) से (v) तक के विष्लेशण से स्पश्ट है कि विष्व बाजार व्यवस्था में भारत की मजबूती के लिए भारत के गरीब लोग अपना सहयोग तभी दे सकते हैं, जब भारत सरकार गरीबों व डब्लूटीओ के बीच असली पंच की भूमिका निभाए।                                                                                  

 

 

15.  लोकतंत्र के विकास का बीमा-

       वोटरषिप के प्रस्ताव के कारण लोकतंत्र के विकास का बीमा हो जायेगा। इसके कारण निम्नवत है-

1.     लोकतांत्रिक प्रेम में वृध्दि -

       (क)   यह कि वोटरषिप की रकम मिलने से लोगों में आर्थिक भाईचारा बढ़ेगा। एक पिता की सम्पत्ति में बंटवारा होने पर सभी बच्चों को समान हिस्सा मिलता है। वोटरषिप राश्ट्रपिता की कुल सम्पत्तिा में से अपने हिस्से की सम्पत्तिा से मिलने वाले किराये का अहसास करवायेगी।

       (ख)   यह कि मतदाता की हैसियत से जब नियमित रूप से कुछ राषि लोगों को मिलेगी तो लोगों को मतदाता के रूप में अपने व्यक्तित्व की कीमत समझ में आएगी। इस कीमत को समझते ही हर व्यक्ति समझ सकेगा कि इस रकम का मिलना तभी जारी रह सकता है जब लोकतंत्र व लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होती रहें। इस प्रकार लोकतंत्र के प्रति वही प्रेम पैदा होगा, जो प्रेम पैसा देने वाले पिता के प्रति बच्चों में पैदा होता है।

       (ग)   यह कि जब मतदाता को नियमित रकम मिलने लग जाएगी तो राश्ट्रीय सम्पत्तिा के प्रति एक आत्मिक दायित्वबोध पैदा होगा। नागरिक यह समझ सकेगा कि राश्ट्र की सम्पत्तिा सुरक्षित रहेगी, उसका अधिक से अधिक उपयोग होगा तो वोटरषिप की रकम बढ़ी मात्रा में मिलेगी। इस प्रकार इस रकम के कारण राश्ट्रप्रेम की आर्थिक धारा फूट पड़ेगी।

 

2.    लोकतंत्र के पहरेदारों में वृध्दि -

       (क)   यह कि आज लोकतंत्र का लाभ प्रत्यक्ष तौर पर या तो उद्योगपतियों के बच्चे ले रहे हैं, जिन्हें संसद उत्तराधिकार कानून बनाकर अरबों रूपये बिना परिश्रम के दे रही है। या फिर चुनावी राजनीति में सफल होने वाले वे राजनीतिज्ञ ले रहे हैं, जिनकी आजीवन आर्थिक सुरक्षा होती जा रही है। इन्हीं दोनों वर्गों के मुठ्ठी भर लोग लोकतंत्र का नमक खाने का फर्ज अदा कर रहे हैं। षेश लोगों के लिए यह या तो खेल है, या इसे समझ न पाने के कारण वे मूकदर्षक हैं। वोटरषिप की सरकारी आमदनी के कारण जब उत्ताराधिकार मूलाधिकार बन जाएगा तो लोकतंत्र की पहरेदारी का काम मुट्ठी भर लोगों के बजाए जन-जन करने लग जाएगा।

       (ख़    यह कि उच्चषिक्षा प्राप्त गांव-गांव में फैले तमाम षिक्षित बेरोजगारों को सामाजिक कार्यक्षेत्र में खपाया जा सकेगा। क्योंकि चुनाव में प्रत्याषी बनकर कुछ वोटें हासिल करके पांच वर्शों तक की आय का जरिया पैदा किया जा सकेगा। इस प्रकार चुनाव प्रणाली ज्यादा चुस्त-दुरुस्त व पारदर्षी बन जाएगी। गलत लोगों के आगे बढ़ पाने की सम्भावना बहुत घट जाएगी। चुनाव प्रणाली में विष्वसनीयता बढने से व लोकतांत्रिक योग्यता रखने वालों द्वारा ही चुनाव जीत पाने की व्यवस्था कायम होने से, लोकतंत्र के प्रति लोगों की आस्था बढ जाएगी। जो लोग मूलधारा से हट कर सामाजिक परिवर्तन के काम में लगे हैं, वे सभी चुनावी मषीनरी को  परिवर्तन के साधन के रूप में अपना लेंगे। इससे लोकतंत्र मजबूत होगा।

       (ग)   यह कि मतदाताओं को नियमित रकम मिलने लग जाएगी; तो उस रकम की 2-4 प्रतिषत रकम वे वोटर कौंसलर को नियमित दे सकते हैं। इससे हर मतदाता को एक प्रषिक्षित राजनैतिक सलाहकार मिल जाएगा व लोकतंत्र को गाँव-गाँव में अपना संदेषवाहक मिल जाएगा। इससे लोकतंत्र की अपेक्षाओं से लोगों का परिचय बढ सकेगा। लोगों में जब लोकतांत्रिक सभ्यता बढेगी तो लोकतंत्र मजबूत होता जाएगा।

3.    मतदान प्रतिषत में वृध्दि -

       यह कि वोट देने से जब नियमित आमदनी होंगी, तो लगभग सभी लोग चुनावों के समय वोट देना पसंद करेंगे। इसके लिए चुनाव आयोग वोटरषिप की रकम के साथ जोड़कर मतदान के दिन काम बन्द करने से हुई आर्थिक क्षति को देखते हुए 100-200 रूपये की क्षतिपूर्ति भत्ताा भी देना चाहिए। वोटरषिप के वितरण प्रणाली को सुचारू रूप से काम करने के कारण मतदान भत्ता भी उसी परिपथ से सुचारू ढंग से वितरित किया जा सकेगा। वोटरषिप की रकम व मतदान भत्ताा के कारण मतदान करने वालों का प्रतिषत बहुत ऊपर उठ जाएगा।

4.    आर्थिक लोकतंत्र का साधन -

       यह कि वोटरषिप की रकम आर्थिक सत्ताा में जनभागीदारी कायम कर देगी। उत्पादन करने वाले लोग अब मतदाताओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर उत्पादन करेंगे; क्योंकि अब उत्पादित सामान को मतदाता खरीद सकेंगे। आर्थिक फैसलों में वोटरषिप की रकम के सहारे जनता को इस तरह स्वत: अधिकार मिल जाएगा। आर्थिक लोकतंत्र के विशय में और विस्तार से जानने के लिये याचिका के अध्याय एक, अध्याय दस 2(झ) का अवलोकन करें।

       (क)   यह कि जब आर्थिक लोकतंत्र की राजव्यवस्था कुछ नियमित रकम हर महीना मतदाता के निजी खाते में भेजा करेगी, तो लोकतंत्र के प्रति वही प्रेम लोगो में पैदा हो जायेगा, जो प्रेम बच्चों को अपनी जेब खर्च देने वाले मां-बाप के प्रति पैदा होता है।

       (ख)   यह कि जन्माधारित उत्ताराधिकार के तौर पर जो लोग करोड़पति बन रहे हैं, केवल वही लोग आज राजनैतिक लोकतंत्र की रक्षा के पहरेदार बने हुये हैं, वोटरषिप की रकम इन पहरेदारों की संख्या इतनी बढ़ा देगी, कि लोकतंत्र की रक्षा व उसके विकास की स्वचालित प्रणाली विकसित हो जोयेगी।

       (ग)   यह कि वोटरषिप के नाम से प्राप्त होने वाली प्रस्तावित नकद रकम के कारण चुनावों में मतदान  करने वालों की संख्या आष्चर्यजनक रुप से बढ़ जोयगी। जहां आज 50 फीसदी मतदान होता है, वही वोटरषिप की रकम मिलने पर 90 फीसदी से भी अधिक लोग मतदान करेंगे।

       (घ)   यह कि वोट के अधिकार से न्यूनतम राजनैतिक समता कायम हुई, वोटरषिप न्युनतम आर्थिक समता कायम कर देगी। वोट राजनैतिक लोकतंत्र  का साधन बना, वोटरषिप आर्थिक लोकतंत्र का प्रभवषाली साधन साबित होगा। वोट के अधिकार द्वारा राश्ट्र की राज सत्ताा के संचालन का अधिकार जन-जन को मिला, वोटरषिप से राश्ट्र की अर्थ सत्ताा के संचालन का अधिकार जन-जन को मिल जायेगा। वोट के अधिकार से लोगों को राजनैतिक आजादी का आनन्द मिला, वोटरषिप से लोग आर्थिक आजादी का आनन्द उठा सकेगे। वोट के कारण लोगों को राजनैतिक अवसरों की समता सुलभ हुई, वोटरषिप लोगों को आर्थिक अवसरों की न्यूनतम समता सुलभ  करायेगी। वोट राजनैतिक न्याय के लिए संधर्श का हथियार साबित हुई, वोटरषिप आर्थिक न्याय के लिए संघर्श का हथियार साबित होगी।  वोट के कारण राज सत्ताा का संचालन लोक इच्छा से होने लगा, वोटरषिप के साधन से अर्थ सत्ताा का संचालन भी लोक इच्छा से होने लगेगा। वोट के कारण जन्म के आधार पर राजनैतिक भेदभाव की कुरीति पर रोंक लगी, वोटरषिप द्वारा  नागरिकों के बीच किये जा रहे  जन्म के आधार पर आर्थिक भेदभाव पर अंकुष लग जायेगा। वोट के माध्यम से राजनैतिक सत्ताा में जन्म के आधार पर सबकों भागीदारी मिल सकी, वोटरषिप के माध्यम से आर्थिक सत्ताा में जन्म के आधार पर सभी को भागीदारी मिल जायेगी।

       (ड़)   यह कि जो पहले पैसा दे, फिर काम की अपेक्षा करे वह अपना होता है। जो पहले काम करवाये, फिर पैसा दे, वह पराया होता है। इसी आधार पर हर आदमी को मां-बाप अपने लगते है, क्योंकि वे जेब खर्च देते समय काम की षर्त नही रखते। कोई कम्पनी का मालिक मजदूर के लिए पराया होता है, क्योंकि वह पहले काम करवाता है फिर मजदूर को पैसा देता है। कम्पनी का मालिक यह नियम अपने बच्चाेंे पर लागू नही करता । उन्हें पहले पैसा देता है, पढाता-लिखाता है, हृश्ट-पुश्ट बनाता है । काम की अपेक्षा बाद में करता है। अपने-पराये की इस कसौटी पर कस कर देखें तो कथित लोकतंत्र की सरकार मतदाताओं को कुछ भी देने से पहले काम करने की षर्त रख रही है। स्पश्ट है कि सरकार एक तरफ तो स्वयं को मतदाताओं  के अभिभावक के रूप में पेष करती है, दूसरी तरफ सरकार ने मतदाताओं को अपना घरेलू मजदूर मान रखा है क्याेंकि काम की षर्त के बगैर कुछ देती ही नही। कौन सरकार अपनी है, कौन परायी, यह बात समझने में वोटरषिप का प्रस्ताव लोगों की बहुत मदद करेगा। जो सरकार वास्तव में मतदाताओं को अपना मानती होगी, जो सरकार वास्तव में मतदाताओं की सरकार होगी - वह अपने मतदाताओ को वोटरषिप की रकम देने से पहले काम करने की षर्त नही लगायेगी। वह सरकार वोटरषिप की रकम देकर उसी प्रकार आनन्दित होगी, जिस प्रकार मां-बाप अपने बच्चों की जेब में कुछ डालकर आनन्दित होते है। जो सरकार जन्म के आधार पर वोट का अधिकार दे दे, उस सरकार द्वारा दी गई नागरिकता राजनैतिक नागरिकता तो हो सकती है, इसे आर्थिक नागरिकता नही कहा जा सकता। सरकार ने आर्थिक नागरिकता भी मतदाता को दिया, यह बात तभी साबित होगी जब सरकार जन्म के आधार पर वोट का ही अधिकार नही, वोटरषिप का अधिकार भी दे। कोई भी मतदाता किसी भी सरकार को अपनी आर्थिक सरकार मान सकता है, जो उसे जन्म के आधार पर वोटरषिप की नियमित रकम दे। वह सरकार चाहे राश्ट्रीय सरकार हो या बहुराश्ट्रीय सरकार हो। उस सरकार की राजधानी चाहे अपने देष की सीमाओं में हो, या देष की सीमाओं से कहीं बाहर स्थित हो ।विष्व अर्थव्यवस्था के वर्तमान युग में नागरिकता, सरकार, देष, विदेष का परम्परागत अर्थ नही चल सकता। इस विशय में और ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिये इसी याचिका के इसी अध्याय के अनु0 14 का संदर्भ ग्रहण करें।

       (च)   यह कि वोटरषिप के कारण लोगों को अर्थव्यवस्था को भी अपनी इच्छा से संचालित करने की लगाम हाथ लग जायेगी। वोट के अधिकार के कारण जिस प्रकार आर्थिक लोकतंत्र कायम हुआ, उसी प्रकार वोटरषिप के अधिकार के कारण आर्थिक लोकतंत्र भी कायम हो जायेगा। आर्थिक लोकतंत्र की परिभाशा के लिए इस याचिका में संविधान संषोधन से संबंधित साक्ष्य-2 का संदर्भ ग्रहण करें।

16.  संवैधानिक प्रगति

1.     संविधान सभा की लालसा पूरी होगी -

       (क)   यह कि राजनैतिक आजादी के संघर्श में भाग लेने वाले राश्ट्र के पूर्वज गरीबी के आरक्षण का सपना भी नही देखे थे, जो विकास व राश्ट्रवाद के नाम पर आज किया जा रहा है। वोटरषिप के नाम से मतदाताओं को मिलने वाली नियमित रकम गरीबी के आरक्षण को खारिज कर देगी, आर्थिक विशमता को कम कर देगी। इससे संविधान सभा की वह लालसा पूरी होगी, जिसका उल्लेख उसने संविधान के अध्याय (4) व नीति निर्देषक तत्व में किया है।

       (ख)   यह कि उक्त अध्याय के अनुच्छेद 51 में संविधान सभा ने अपना मंतव्य जाहिर करते हुए भारत संघ के राज्य से अपेक्षा की है कि अंतर्राश्ट्रीय षांति व सौहार्द बनाने के लिए राज्य प्रयास करेगा। इस याचिका के अध्याय 9.3 और 9.4 की याचनाएं भारत संघ को संविधान सभा की इसी इच्छा की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही है।

2.    विधि के समक्ष समता (अनु. 14 व अनु. 15)-

       यह कि जन्म के आधार पर किसी को ऊंचा बनाने, व किसी दूसरे को नीचा बनाने की प्रवृति पर संविधान में स्पश्ट रोक है। फिर भी संघीय सरकार जन्म के आधार पर अरबपतियों के बच्चों को बिना मेहनत के अरबपति बना रही है, व गरीबों के बच्चों की बिना जांच किये गरीबी का आरक्षण दे रही है। उत्ताराधिकार कानून संविधान के अनु. 14 15 का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन कर रहा है। ऐसा लगता है कि सरकार ने संविधान से ज्यादा इस कानून को ही महत्व दे रखा है। वोटरषिप का प्रस्ताव और उत्ताराधिकार का सीमांकन सम्बन्धी याचनाएं राज्य द्वारा नागरिकों के बीच जन्म के आधार पर बरते जा रहे आर्थिक भेदभाव पर अंकुष लगाने की मांग कर रहे हैं। इससे संविधान का सम्मान बढ़ेगा। इस विशय में और विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय 9.1 और 9.2 का अवलोकन करें।

3.    संविधान की प्रस्तावना -

          क)  यह कि भारत के संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ऐसे राश्ट्र के रूप में विकसित करने का सपना देखा गया है, जिसमें सभी लोगों को अवसरों की समता सुलभ होगी। किन्तु उक्त अध्याय 8.2 से स्पश्ट है कि कुछ कानूनों के कारण किसी को (कानून स)े जन्म लेते ही सोने का चम्मच मिल रहा है तथा किसी दूसरे को माँ के स्तन में दूध ही नही है; क्योंकि वह स्वयं कुपोशण से ग्रस्त है। इस याचिका के अध्याय 9.1 व वोटरषिप की याचनाएं अवसरों की समता सुलभ कराने में मील का पत्थर साबित होगी।

       (ख)   यह कि भारत के संविधान की प्रस्तावना भारत को एक समाजवादी लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने का सपना भी देखता है। वोटरषिप के प्रस्ताव के कार्यान्वयन की प्रक्रिया में - उत्ताराधिकार का स्वत: सीमांकन हो जाएगा, आर्थिक विशमता नियंत्रित हो जाएगी, बाजार के अत्याचारों पर अंकुष लग जाएगा, श्रमिकों को श्रम के सौदेबाजी का अवसर मिल जाएगा - इससे भारतीय गणराज्य समाजवादी स्वरूप धारण कर लेगा।

17. बेरोजगारी की समस्या पर प्रभावषाली अंकुष -

(क)  क्रयषक्ति बढने से -

       (क)   नए ग्राहकों के लिए सामानों के उत्पादन के लिए नई कम्पनियां - यह कि वोटरषिप की हजारों रूपयों की धनराषि जब घर-घर में नियमित पहुंचने लगेगी, तो लोगों के खरीदने की षक्ति बढ़ जाएगी। इससे बाजार में दुकानों पर जाकर वे लोग भी सामान मांगने खड़े हो जाएंगे, जो दुकान पर कभी खड़े नही होते थे। यह जनसंख्या कम से कम भारत की कुल जनसंख्या की आधी से अधिक होगी, जो हाथ में पैसा न रहने के कारण्ा बहुत जरूरी चीजें भी खरीदने के लिए दुकान तक जाने की हिम्मत नही जुटा पाती। इन नये ग्राहकों की जरूरत भर का माल दुकानदार के पास नही होगा, इसलिए वह कम्पनी को और माल भेजने का ऑर्डर दे देगा और जब तक माल की नयी खेप नही आती, तब तक के लिए सामानों की कीमत थोड़ी बढा देगा, जिससे कुछ ग्राहक दुकान से छंट जाएं। जब कम्पनी को हर छोटे-मोटे षहर से ऑर्डर मिलेंगे तो कम्पनी को नया माल भेजने के लिए नई कम्पनी लगानी पड़ेगी। नई कम्पनी लगाने में उसे बहुत से लोगों को रोजगार देना पड़ेगा। इस प्रकार वोटरषिप के प्रस्ताव में इस तरह की कम्पनियों में तीन गुना रोजगार बढाने की क्षमता अंतर्निहित है।

       (ख)   यह कि जिस प्रकार सामान मांगने वाले ग्राहक बढ जाएंगे, उसी प्रकार षिक्षकों, डॉक्टरों, नर्सों, दर्जियों, नाईंयों, स्कूलों, अस्पतालों, डाकियों, स्कूलों के चपरासियों, क्र्लर्कों, बसों के ड्राइवरों, कन्डक्टरों, टेलिफोन ऑपरेटरों और घड़ी व साइकिल मरम्मत करने वालोेंं की जरूरत आ पड़ेगी। क्योंकि नियमित आमदनी देखकर, जो लोग बच्चों को स्कूल नही भेजते, वे बच्चों को स्कूल भेजने लग जाएंगे। जो लोग छोटी-मोटी बीमारी से अस्पताल नही जाते, वे जाने लग जाएंगे। जो जरूरी काम से भी यात्रा नही करते, वे बसों, ट्रेनों में बैठने लग जाएंगे। जो साइकिल पर नही चल पाते, वे साइकिल खरीद लेंगे। जो घड़ी नही पहनते, वे घड़ी खरीद लेंगे। जो दो साल में एक बार कपड़ा सिलाते हैं, वे चार बार सिलाने लगेंगे। जो गंदा कपड़ा पहनते हैं, वे साफ सुथरा व प्रेस किया हुआ कपड़ा पहनने लग जाएंगे। जो मनोरंजन के लिए कोई सामान या सेवा नही खरीदते, वे खरीदने लग जाएंगे। टेलिविजन घर-घर फैल जाएगा। इस प्रकार दवा उद्योग, अस्पताल उद्योग, षिक्षा संस्थानों, बसों, ट्रेनों, साइकिल उद्योग, घड़ी उद्योग, टेलिफोन उद्योग, इलैक्ट्रानिक व रेडियो उद्योग, कपड़ा उद्योग, मनोरंजन उद्योग, डाक उद्योग, साबुन उद्योग.... आदि क्षेत्रों में कम से कम तीन गुना नए ग्राहक आ पड़ेंगे। जिनकी जरूरतें पूरी करने के लिए कम से कम तीन गुना उक्त क्षेत्रों का विस्तार करना पड़ेगा और इन क्षेत्रों में जितने लोग आज काम कर रहे हैैं, उसमें तीन गुना नए लोगों को रोजगार मिलेगा।

(ख)  राजनैतिक वित्ता से -

       (क)   यह कि मतदाताओं की वोटरषिप की रकम की 5 प्रतिषत रकम जनप्रतिनिघित्व सेवाओं में खर्च करने से बड़ी मात्रा में राजनैतिक वित्ता का प्रबंघ होगा। इस याचिका के अघ्याय - 8 पैरा - 5(घ) से स्पश्ट है कि यदि चुनाव में एक हजार वोट पाने वाले प्रत्याषी को पाँच वर्शों तक 3,50,000 रूपया सालाना मिलता रहे व एक लाख वोट पाने वाले को 3 करोड़ पच्चास लाख रूपया सालाना मिलता रहे तो कम से कम हर 500 मतदाताओं पर एक वित्ता पोशित राजनैतिक कार्यकर्ता को काम मिल जाएगा। भारत के 68 करोड़ मतदाताओं की संख्या को देखते हुए कम से कम 1,3,60,000 लोगों को राजनैतिक प्रबंधन के क्षेत्र में रोजगार प्राप्त होगा।

 

(ग)  ए.टी.एम. नेटवर्क से -

       (क)   यह कि सभी मतदाताओं को जब नियमित वोटरषिप की रकम मिलने लगेगी, तो वे बैंकों में टेलर काउण्टरों पर नियमित जाने लगेंगे व एटीएम मषीनों का उपयोग नियमित करने लगेंगे। यदि दो हजार मतदाताओं पर एक एटीएम मषीन लगाई जाए, तो 68 करोड़ मतदाताओं की संख्या को देखते हुए 3,40,000 एटीएम के्र्र्र्र्र्र्र्र्र्रन्द्रों की जरूरत पड़ेगी, जहां इतनी ही संख्या में सुरक्षा गार्डों की जरूरत पड़ेगी। इतने नए लोगों को रोजगार मिलेगा।

       (ख)   यह कि छोटी-छोटी रकम करोड़ों लोगों के हाथों में आ जाने से वित्ता संचार प्रणाली बहुत तीव्र हो जाएगी। आज बैंकों की सेवाएं जितने लोग लेते हैं, उसका कम से कम पांच गुना नए लोग बैंकों के काउण्टरों पर खड़े हो जाएंगे। पांच गुना नए लोगों के ग्राहक बन जाने से व उनकी सक्रियता बढ जाने से बैंकों को पांच गुना नई षाखाएं खोलनी पड़ेगी। जिससे पांच गुना बैंक मैनेजरों, क्लर्कों, फील्ड आफीसरों, चपरासियों, सुरक्षा गार्डों की नई भर्ती की जरूरत आ पड़ेगी। इस प्रकार बैंकिग क्षेत्रों में आज की तुलना में पांच गुना नए लोगों को रोजगार मिलेगा।

(घ)  बैंक स्टाफ बढ़ाने से-

       वोटरषिप की रकम को देष के लगभग 68 करोड़ मतदाताओं मेें नियमित वितरित करने के लिए बैंकों व उनकी षाखाओं का एक जटिल जाल बिछाना होगा। यदि एक हजार लोगों पर बैंक की एक षाखा खोला जाए तो कम से कम 670000 षाखाओं की जरूरत पड़ेगी। यदि एक षाखा कम से कम दस लोगों को कार्य करने के लिए नियुक्त किया जाए तो लगभग 67 लाख लोगों को रोजगार मिलगा।

(ड.)  साइकिल जैसे उद्योगों से -

       यह कि वोटरषिप की रकम घर-घर पहुंच जाने से साइकिल, घड़ी, रेडियो, साबुन व अन्य आम उपभोक्ताओं की मांग बढ़ जाएगी। इन वस्तुओं के उत्पादन के लिए बड़ी संख्या में नए उद्योगों की स्थापना  करनी  पड़ेगी। इन क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में रोजगार का सृजन होगा।     

(च)  वोटर कौंसिलर्स के व्यवसाय में -

       यह कि घर-घर में पैसा जाने पर उस पैसे की देखरेख के लिए व सदुपयोग के लिए वोटर कौंसलर्स का नया व्यवसाय प्रारंभ करना पड़ेगा। वोटर कौंसलर इस बात पर नजर रखेगा कि उसके ग्राहक के पास वोटरषिप की नियमित रकम पहुंच रही है, या नही। अगर कोई बाधा है तो वह राजनैतिक वित्ता पर कार्यरत जनप्रतिनिघि की मदद से उस बाघा को दूर करेगा। वोटर कौंसलर यह भी देखेगा कि उसके ग्राहक द्वारा रकम का दुरूपयोग तो नही हो रहा है। यदि उसका ग्राहक वोटरषिप की रकम की नषाखोरी या अपराध के कामों में लगा रहा होगा, तो कौंसलर उसे धनराषि के सदुपयोग की सलाह देगा। यदि फिर भी वह नही मानेगा, तो वह षासकीय दण्डाधिकारी की नोटिस उसके सम्मुख पेष करेगा, नोटिस से भी उसमें सुधार नही आया तो दण्डाधिकारी सुधारने तक की अवधि के लिए वोटरषिप की कुल रकम का कुछ प्रतिषत उसके पास देखकर षेश रकम उसके परिवार या षुभचिंतक के पास उन्मुख करने का आदेष संबंधित बैंक अधिकारी को दे देगा। बैंक अधिकारी को यह कार्यान्वयन सुनिष्चित करना होगा। वोटर कौंसलर दण्डाधिकारी का कार्य फीस के आधार पर करेगा, अपने ग्राहक की वोटरषिप की राषि का पांच प्रतिषत सालाना रकम उसके  आर्थिक हितों की देखरेख व उसके पक्ष को समुचित फोरम पर रखने की फीस लेता रहेगा। एक व्यक्ति 100 लोगों में इमानदारी से व्यावसायिक संबंध निभा सकता है। नियमित उनके संपर्क में बना रह सकता है। इससे ज्यादा लोगों से संपर्क बनाने की कोषिष में वह किसी के साथ न्याय नही कर सकेगा, व पैसे के दुरूपयोग की संभावना बढने लगेगी। इसलिए 100 से ज्यादा लोगों को ग्राहक बनाने पर कानूनी रोंक लगाना उचित रहेगा। यदि 100 लोगों की 5 प्रतिषत वोटरषिप की धनराषि वोटर कौंसलर के पास फीस के रूप में आती रहे, तो हर की वोटर कौंसलर की मासिक आय लगभग चार हजार रूपए से अधिक ही होगी। 68 करोड़ मतदाताओं की संख्या देखते हुए इस विधि से पूरे भारत मे 68,00,000 (68 लाख) वोटर कौंसलरों की जरूरत पड़ेगी। इतने नए लोगों को रोजगार मिलेगा।

(छ)  उर्ध्वाधर सचिवालय में नई भर्ती-

       (1)     यह कि दक्षिण एषियाई देषों की ग्राम प्रषासन की वित्ताीय जरूरतें पूरी करने, गांव में रहने वाले दलित समुदाय के लोगों को प्रतिश्ठित करने, साम्प्रदायिक सद्भाव कायम करने, जल सेना व वायु सेना का संचालन व देखरख करने.....आदि वतनी कार्यसूची के विशयों पर काम करने के लिए और इस याचिका के अध्याय - 9.2 (,ज), 9.3 (ख - 3,5,7) में अंकित उद्देष्यों व याचनाओं के कार्यान्वयन के लिए दक्षिण एषिया के देषोें की साझा सरकार व उसके विविध मंत्रालयों के सचिवालय बनाने होंगे। इन सचिवालयों में बड़ी संख्या में अधिकारियों, क्लर्कों, व चपरासियों की भर्ती करना होगा। दक्षिण एषिया के संपूर्ण वतनी क्षेत्र के लगभग 9 लाख गांवों-मोहल्लों की वित्ता व्यवस्था का काम करने के लिए वतनी सरकार से वेतन प्राप्त करने वाले कम से कम 81 लाख वतनी नागरिकों को रोजगार प्राप्त होगा। वतनी सरकार के सचिवालयों, उसके पुलिस स्टेषनों, न्यायालयों, उसके सांसदों के कार्यालयों में काम करने वाले लोगों की संख्या कम से कम 50 लाख भी मानी जाए, तो इतने नए लोगों को वतनी सरकार के विविध विभागों में रोजगार मिलेगा। जब कि यह संख्या भारत संघ व प्रदेषों के कर्मचारियों की कुल संख्या की एक तिहाई भर है। वतनी सरकार द्वारा दक्षिण एषिया के सभी गांवों- मोहल्लों के प्रषासनिक अधिकारियों की देखरख व ग्राम-प्रषासन के विशय में विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय 13 साक्ष्य-5 गांव का संविधान (कुल 32 पृश्ठ) का अवलोकन करें।

       (2)    यह कि विष्व अर्थव्यवस्था के वितरण व उत्पादन संबंधी न्याय की सुरक्षा के लिए, विष्व अर्थव्यवस्था के उत्पादन व वितरण संबंधी क्रयषक्ति के कोटे की सुरक्षा के लिए, इस याचिका के अध्याय - 9, पैरा - 1(क), 2(,ज), 3(ख) में अंकित याचनाओ को कार्यान्वित करने के लिए और पूर्वी विष्व की प्रस्तावित सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाले कार्यसूची के विशयों पर काम करने के लिए, पूर्वी विष्व की व पष्चिम विष्व की - दो उर्ध्वाधर सरकारों का गठन करना होगा, जिनके सचिवालयों में भारी संख्या में कर्मचारियों की जरूरत पड़ेगी। जब भारत जैसे 110 करोड़ की जनसंख्या वाले देष को चलाने के लिए 150 लाख कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है तो पूर्वी संसार के लगभग 350 करोड़ जनसंख्या के साझे हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पूर्वी सरकार को अपना काम काज चलाने के लिए भारत सरकार के अनुपात के अनुसार 477 लाख कर्मचारियों की जरूरत होगी। अगर हम इस संख्या को आधी भी कर दें तो पूर्वी विष्व की सरकार में कम से कम 238 लाख लोगों को रोजगार मिलेगा। पष्चिमी विष्व की सरकार के कर्मचारियों की संख्या इतनी ही मानी जाए, तो दोनों सरकारों के कर्मचारियों की संख्या जोड़ने पर यह संख्या - 477 होगी। इस विशय में और विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय - 13, साक्ष्य 6 का अवलोकन करें।

       (3)    यह कि विष्व अर्थव्यवस्था को विष्व की लोकतांत्रिक जनापेक्षाओं से संचालित करने के लिए एक विष्व सरकार की आवष्यकता पिछले कई दषकों से महसूस किया जा रहा है। आज के विष्व बाजार से होने वाली आय से आयकर वसूलने के लिए विष्व का कोई आयकर विभाग नही है, इसी प्रकार विष्व का कोई उत्पाद कर विभाग नही है, व्यापार कर विभाग नही है .....। मानवाधिकारों की रक्षा, पर्यावरण की रक्षा, आर्थिक तंगी से विष्व के गरीबों की रक्षा,..... जैसे विष्व सरकार की कार्यसूची के कार्यों को सम्पादित करने के लिए विष्व सरकार को भारी भरकम सचिवालय की आवष्यकता होगी। अगर पूर्वी विष्व व पष्चिमी विष्व की सरकारों के बराबर संख्या में भी विष्व सरकार के सचिवालय में भर्ती किया जाए तो 477 लाख नए लोगों को रोजगार प्राप्त होगा।

       उक्त अनु- 1 से 3 तक के आकलन से साबित होता है कि वोटरषिप के माध्यम से आर्थिक लोकतंत्र की राजव्यवस्था व अर्थव्यवस्था अपना लिया जाता है तो 477+238+238+131=1084 लाख लोगों को परादेषीय सचिवालयों के माध्यम से रोजगार प्राप्त हो सकता है। अगर जनसंख्या के अनुपात में देखें तो इसमें से 6वां हिस्सा यानी 10 करोड़ 84 लाख भारत में रहने वाले लोगों को रोजगार मिल सकता है।

(ज)  अंत: प्रेरित प्रज्ञात्मक रोजगार-

       यह कि अर्थव्यवस्था में षासन-निर्देषित व उद्योग-निर्देषित रोजगार जिन लोगों को नही मिलेंगे, या वे लोग ऐसे रोजगार में अपनी ऊर्जा लगाना अच्छा नही मानेंगे, वे सभी षत प्रतिषत अपनी अंतरात्मा द्वारा प्रेरित कार्य करेंगे। यह प्रज्ञात्मक रोजगार होगा, या आध्यात्मिक रोजगार होगा, या परमात्मिक रोजगार होगा। वोटरषिप की धनराषि इनके षरीर रूपी वाहन चलाएगा और ये लोग परमात्मा की अंर्तप्रेरणा से काम करेंगे। आज सांसारिक अर्थव्यवस्था में बहुत से लोग लगे हैं, वे वास्तव में परमात्मा की अंतप्रेरणा  से उसका कार्य करने के लिए जन्म लिए हैं। ऐसे लोग सांसारिक रोजगार छोड़कर वोटरषिप की रकम के सहारे परमात्मिक रोजगार अपना लेंगे। सांसारिक रोजगार की जगहें खाली करने से  आज की तुलना में कम से कम लगभग 20 प्रतिषत जगहें खाली हो जायेगी। उनकी जगह रोजगार की पंक्ति में खड़े नए लोगों को सांसारिक क्षेत्र में रोजगार मिल जाएगा। भारत के 150 लाख रोजगार प्राप्त लोग स्वेच्छा से सांसारिक रोजगार छाड़ेंगे, तो कम से कम 30 लाख नए लोगों को भी रोजगार मिलेगा।

18.  भोजन, आवास, पेय जल, षिक्षा, चिकित्सा सम्बन्धी समस्याओं का समाधान-  

       यह कि वोटरषिप का प्रस्ताव कार्यान्वित होने से नागरिकों के भोजन, आवास, पेयजल, षिक्षा, चिकित्सा.... सम्बन्धी समस्याओं का स्वत: समाधान हो जाएगा। इस निश्कर्श के आधार निम्नलिखित है -

(क)  खाद्य समस्या का समाधान व किसानों को लाभकारी मूल्य को प्राप्ति -

       यह कि बाजार व्यवस्था का एक स्वभाव होता है कि जिस वस्तु के खरीदने वाले ज्यादा होंगें, उसकी कीमत बढ़ जाती है। वोटरषिप की रकम के धारकों की सबसे पहली प्राथमिकता खाद्य सामग्री खरीदने की होगी। खाद्य भंडारण  पर सरकार द्वारा खर्च की जा रही भारी भरकम रकम इसलिए बच जाएगी, क्योंकि अब अनाज को सरकारी गोदामों में रखकर सस्ता गल्ला बांटने की जरूरत ही खत्म हो जाएगी। वोटरषिप की रकम से लोग नजदीकी बाजार में जाकर अनाज खरीद लेंगें। इस प्रकार वे ज्यादा इज्जत व गरिमा के साथ जी सकेंगें। क्योंकि सस्ते गल्ले की दुकान पर घटिया सामान खरीदने के लिए भिखमंगों की तरह खड़े होने की समस्या खत्म हो जाएगी। पैसा हाथ में रहने पर वे सामान भी अच्छा लेंगें, सौदेबाजी करके लेंगें और सम्मान से जीवन जिएंगें तो उनका मस्तिश्क रचनात्मक कार्य करने लग जाएगा। जब अनाज की खरीद के लिए इतनी बड़ी मात्रा में ग्राहक बाजार में  आ जाएंगें तो किसानों द्वारा उत्पादित अनाज की कीमतें इतनी बढ़ जाएगी कि अब इनकी उपज का लाभकारी मूल्य उन्हें मिलने लग जाएगा। इससे जहां एक तरफ किसान आत्महत्या जैसी दुर्घटनाओं से बचेगें; वहीं दूसरी तरफ सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की झंझट और अनाज भंडारण, वितरण और यातायात के भारी भरकम खर्चे से बच जाएगी। अब सरमार इस तंत्र से मुक्त होकर और जरूरी कार्य में अपना ध्यान लगा सकेगी। वर्तमान खाद्य नीति व कृशि नीति में आपसी विरोध है। सरकार किसानों के अनाज का मूल्य बढ़ाए, तो पूरे देष के गरीबों के सामने भूखों मरने की नौबत पैदा हो जाती है। अगर गरीबाें की रोटी सरकार सस्ती करना चाहे तो किसानों की उपज की लागत निकलनी भी मुष्किल हो जाती है। वोटरषिप का प्रस्ताव यह अंतर्विरोध खत्म कर देगा। किसान व गरीब दोनों का भला होगा। वोटरषिप का प्रावधान लागू होने के बाद से किसान आंदोलनों की अनाज की कीमत बढ़ाने की मांग को अत्याचारी मांग नही कहा जा सकता।

(ख)  आवास समस्या का हल -

       यह कि मतदाताओं को मिलने वाली वोटरषिप की नियमित रकम को देखकर भवन निर्माण से जुड़े निवेषक, उद्योगपति, व्यापारी, इंजीनियर, ठेकेदार, प्रोपर्टी डीलर अपना ध्यान बड़े षहरों की ओर से हटाकर छोटे षहरों व गांवों की ओर केन्द्रित करेंगें। वोटरषिप के कारण स्थापत्य कला में नई तकनीकि पैदा होगी। इस तकनीकि से ऐसे मकान बनाए जाएंगें, जिसे 5000 रूपये महीने की आमदनी वाला एक परिवार किष्तों में खरीद सकता हो। आवास योजनाओं पर सरकार का भारी खर्च हो रहा है, वह बचेगा, और राश्ट्र को सरकार के इन  महाभ्रश्ट विभागों से निजात मिलेगी। भवन खरीदने की क्षमता जब लोगों में पैदा हो जाएगी तो भवन निर्माण उद्योग में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसरों का सृजन होगा। आज जितने लोग इस क्षेत्र में कार्यरत हैं, उसमें कम से कम तीन गुना अन्य लोगों को भी इस क्षेत्र में रोजगार मिलेगा। सरकार की वर्तमान आवास नीति इतनी दोश पूर्ण है कि एक तो गरीबों के आवास मद पर उसके पास इतनी कम धनराषि का बजट होता है कि उसमें आवास देने का केवल ढ़िढोरा ही पीटा जा सकता है । सरकार के पास जो थोड़ी बहुत धनराषि होती भी है वह ऐसी काल्पनिक बिक्री पर आधारित कोलोनियां बनाने पर खर्च किया जाता है। जिसे लोग खरीदते नही और इमारत में गृहप्रवेष हुए बगैर ही वह खंडहर में तब्दील हो जाती है। लोगों को सीधे पैसा मिलेगा तो अपनी जरूरत के हिसाब से मकान बनाएंगे और उसका सदुपयोग करेगें। वोटरषिप के कारण आवास के नाम पर सरकार द्वारा किये जा रहे भारी अपव्यय से राश्ट्र को मुक्ति मिलेगी और आज की तुलना में अधिकांष लोगों को मकान मिल जाएगा और अपेक्षाकृत बेहतर मकान मिलेगा।

(ग)  पेय जल की समस्या का गारंटीषुदा समाधान -

       यह कि भारत में पेय जल की विकट समस्या का एक ही रूप पूरे देष में नही है। जिन क्षेत्रों में पेय जल की समस्या है, वहां इसके समाधान के लिए अध:संरचना में बड़े मात्रा के निवेष की जरूरत है। चूंकि इस जल का उपयोग अधिकांषत: वे लोग करेंगे, आज जिनके पास पैसा नही होता। इसलिए इस निवेष की रकम के वापस आने की संभावना नही होती। अगर जल को बेचा जा सके व जल की कीमत उस क्षेत्र के उपभोग्ता अदा कर देें तो बड़ा से बड़ा निवेष उस क्षेत्र में किया जा सकता है। यह निवेष चाहे तालाब खोदने में हो, चाहे पम्पिंग मषीनों को लगाने पर हो, चाहे नहर बनाने में हो, चाहे बांध बनाने में हो, चाहे पानी की टंकियां या तलाब बनाने में हो, या फिर जल के आयात की स्थाई व्यवस्था बनाने में हो। किन्तु इस निवेष के लिए निवेषकर्ता अपना धन तभी लगाएंगे, जब इस जल का नि:षुल्क वितरण न हो, अपितु सषुल्क हो। वोटरषिप की नियमित आमदनी जहां एक तरफ लोगों को यह पानी खरीदने की क्षमता प्रदान कर देगी, वही प्रमुख समस्या होने के कारण यदि लोग एक वर्श तक हर महीने वोटरषिप की आधी रकम को चंदे के रूप में दे देंगे, तो उस क्षेत्र में पेय जल की विषाल अध:संरचना खड़ी हो जाएगी। सरकार की संप्रभुता चूंकि समाप्त प्राय हो चुकी है, इसलिए सरकार 18 रूपए लीटर का पानी पीने वालों पर टैक्स लगाकर संकट ग्रस्त क्षेत्रों में पेय जल की व्यवस्था नही कर सकती। चूंकि देष के सम्पन्न वर्ग के लोग सरकार की बात नही मानेंगे, इसलिए सरकार पेय जल पर इतना पैसा खर्च करती है; जिससे विज्ञापन हो सके और विज्ञापनों तथा भाशणों में सरकार चलाने वालों की पेयजल की चिंता का प्रचार हो सके। सरकार द्वारा खर्च की जा रही राषि ऊंट के मुंह में जीरा के समान है। इस तरीके से पेय जल की समस्या का समाधान कभी नही हो सकता। पेय जल की समस्या से ग्रस्त क्षेत्रों के जन प्रतिनिधि संघीय सरकार के मंचों पर अचानक जनता को दगा देकर राश्ट्र प्रतिनिधि का व्यवहार करके अपने आपको ''बड़ा राश्ट्रवादी और राश्ट्र की मूलधारा के राजनीतिज्ञ'' साबित करने में लगे रहते है। चूंकि पूरा राश्ट्र पेय जल की समस्या से ग्रस्त नही है, इसलिए उनके क्षेत्र की जनता की आवाज कथित राश्ट्रवादी नारों में गुम हो जाती है। कभी आगामी चुनाव में टिकट की चिंता में, कभी पार्टी के राश्ट्रवाद की चिंता में, जनप्रतिनिधियों द्वारा अचानक पाला बदल कर तथाकथित राश्ट्र प्रतिनिधि बन जाने के कारण पूरा देष पीड़ित है, और जनप्रतिनिधित्व व्यवस्था की चूड़ी मिस हो गई है। जनप्रतिनिधियों के पाला बदल देने के कारण महानगरों में अनाप-सनाप पैसा खर्च होता है, षेश पूरा देष पानी के लिए भी तरसता रहता है। वोटरषिप के नाम से अब बिना जनप्रतिनिधि की मदद के उसके चुनाव क्षेत्र में हर महीना कई करोड़ रूपया नियमित जाता रहेगा। इस रकम के कारण यदि जनप्रतिनिधि बेवफा होकर पार्टी प्रतिनिधि बन भी जाएगा, तो भी जनता को पानी खरीदने का नियमित पैसा आता रहेगा। और देष पेय जल की समस्या से मुक्त हो जाएगा।

(घ)  षत प्रतिषत षिक्षित समाज का उदय -

       यह कि भारत में अभी भी बड़ी संख्या में लोग निरक्षर हैं। भारत की षिक्षा नीति में दोश होने के कारण पुरानी पीढी तो निरक्षर थी ही, नई पीढी भी निरक्षर पैदा हो रही है। नई पीढी की निरक्षरता  का खामियाजा आगामी पच्चास वर्शों तक देष को भुगतना होगा। गुलामी के कारण यह मान भी लें कि पुरानी पीढी की निरक्षरता का कारण अंग्रेज रहे; तो नई पीढी की निरक्षरता के लिए जिम्मेदार कौन है? वस्तुत: नई पीढी की निरक्षरता की जिम्मेदारी वर्तमान षिक्षा नीति के निर्माताओं पर है। इन लोगों की मान्यता यह है कि सैंकड़ों कोस दूर बैठी सरकार अपने षिक्षा विभाग के कर्मचारियों द्वारा घर-घर में घूमकर बच्चों को व बूढों को षिक्षित कर देगी। इस नीति के निर्माता के खुद के अपने बच्चे पढ़ने में रूचि न दिखाए, तो ये लोग अपने बच्चों को पढाने में तो कामयाब हुए नहीं, घर-घर में सरकारी पैसा पाने वाले कर्मचारियों के भरोसे षिक्षा का प्रवेष कराने का सपना देख लिया। वस्तुत: इस याचिका के याचिकाकर्ताओं की मान्यता है कि षिक्षा परिवार की सम्पन्नता का उपोत्पाद (बाई प्रोडक्ट) है। इसलिए अगर षिक्षा को मूलाधिकार वास्तव में बनाना है, तो घर-घर की सम्पन्नता सुनिष्चित करना होगा। सरकार की चिंता लोगों की नियमित आमदनी की गारंटी देना है। जिन परिवारों में यह गारंटी मिल जाएगी, उन परिवारों के बच्चे स्वयं पढ़ लेंगे और वे पढ़ रहे है या खेल रहे है; यह देखभाल अभिभावक स्वयं कर लेंगें। सरकार के षिक्षा अधिकारी को उन बच्चों के पीछे-पीछे छड़ी लेकर घूमने की जरूरत नही है। वस्तुत: वर्तमान षिक्षा नीति के निर्माता बिना कुछ त्याग किए षिक्षित राश्ट्र जैसी बड़ी चीज प्राप्त कर लेना चाहते हैं। इसलिए इनकी योजनाएं षिक्षा को केन्द्र में रखकर नही बनती, पैसे की कंजूसी को केन्द्र में रखकर बनती है। वोटरषिप की रकम से षिक्षा के लिए पर्याप्त धनराषि सही हाथों में उपलब्ध हो जाएगी। वोटरषिप का प्रस्ताव कार्यान्वित करने के दस वर्शों के भीतर संपूर्ण राश्ट्र के षत प्रतिषत लोग षिक्षित हो जाएंगे। इस विशय मेें और ज्यादा जानकारी के लिए इस याचिका के अध्याय 10.1 (ग) का अवलोकन करें।

(ड.)  षत प्रतिषत लोगों का स्वास्थ्य बीमा - 

       यह कि दवाइयां व्यक्ति की मूलभूत आवष्यकताओं में से एक है। दवाइयों में भी तीन श्रेणियां है। मूलभूत दवाएं, साधारण दवाएं और विषिश्ट दवाएं। देष के विकास के नाम पर किसी नागरिक को दर्दनाषक, एन्टीबायटिक जैसी मूलभूत दवाओं से वंचित नही किया जा सकता। दवाइयों की तरह ही रोग भी तीन प्रकार के हैं- कुपोशण से पैदा होने वाले, लापरवाही से पैदा होने वाले, विषिश्ट कारणों से पैदा होने वाले। वोटरषिप की नियमित आमदनी से परिवारों को कुपोशण की समस्या से निजात मिल जाएगी। जेब में पैसा रहने के कारण 10-20 रूपये की सस्ती दवाओं को लोग रोग षुरू होते ही इस्तेमाल कर लेंगे। इससे लापरवाही व आर्थिक बेबसी के कारण होने वाले तमाम रोगों का इलाज बीमारी षुरू होते ही हो जाया करेगा। मंहगे इलाज वाले विषिश्ट रोगों को ठीक करने की गारंटी सरकार ले नही सकती। किसी व्यक्ति के जीवन में कुल बीमारियों की तुलना में मंहगे इलाज वाले रोग 2 प्रतिषत ही होते हैं, अक्सर तो ये लाइलाज भी होते है। अपने वष में केवल इतना होता है, कि सस्ती अस्पताल में मरा जाए, या मंहगी अस्पताल में। मंहगी अस्पताल लोगों का निजी मामला है। इसकी देखरेख करना सरकार का काम नही है। 100 रूपए की दवा में ठीक होने वाले करोड़ों लोगों को बीमार रखकर, थोड़े से सम्पन्न लोगों के मंहगे इलाज वाली अरबों रूपए की अस्पताल बनवाना सरकार का अलोकतांत्रिक व्यवहार है। मंहगे रोगों का इलाज वोटरषिप की रकम से मिलने वाले स्वास्थ्य बीमें से हो जाया करेगा। सरकार को अस्पतालों पर खर्च करने से बचत हो जाएगी, अस्पतालों का संचालन बीमा कम्पनियां कर लेंगी। इनके बीमे की किष्त जमा करने की क्षमता वोटरषिप की रकम के कारण अब सभी लोगों में आ ही जाएगी। पहले विकास के नाम पर लोगों के लिए गरीबी आरक्षित करके उनकी रोटी छीनों, जब वे रोटी न मिलने से बीमार हो जाएं, तो अस्पताल खालो; - सरकार की इसी नीति के कारण लगभग पूरा राश्ट्र ही बीमार पड़ गया है। जब तक गरीबी का आरक्षण बना रहेगा, तब तक इस समस्या से राश्ट्र को मुक्ति नही मिलने वाली है। वोटरषिप नि:संदेह राश्ट्र को रोगमुक्त करेगी।

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भरत गांधी कोरोनरी ग्रुप                                                                                                         Naveen Kumar Sharma