| ثرثره نفطيه عبد الوهاب زاهده | ||
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| ... تتساءلينْ ... | ||
| ذاكَ اللسانُ من اللهَبْ | ||
| يعلو ويقترِبُ السُحبْ | ||
| ما أمرُهُ | ||
| ما سِرّهُ | ||
| لو يا حبيبَةُ تعلمينْ | ||
| من تحتِهِ ..أموالُنا | ||
| ... بترولُنا ... | ||
| لكنّنا وكما ترينْ | ||
| ما زلنا نطبخُ بالحطبْ | ||
| ... يا للعجبْ ... | ||
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| ... تتسائلينْ ... | ||
| واولئكَ الشُقرُ الطوالْ | ||
| يبدونَ في لونِ الرمالْ | ||
| لِمَ هُم .. هنا | ||
| في أرضِنا | ||
| ماذا تُراهُم يفعلونْ | ||
| هم يا حبيبةُ يسرقونْ | ||
| أجدادُهم من قبلهم | ||
| سرقوا القنالْ | ||
| هي مهنةٌ فيها ذهبْ | ||
| ... يا للعجبْ ... | ||
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| ... تستفسرينْ ... | ||
| والشيخُ .. أينَ الشيخُ ما عُدنا نراهْ | ||
| هل لم يزل في خيمةٍ .. ولهُ شِياهْ | ||
| ويَصُدُّ عن إبلِ العشيرةِ والمياهْ ؟؟ | ||
| فأجابها مُتضاحكاً .. آهٍ.. و..آهْ | ||
| أنا ما خبرتُكِ تجهلين | ||
| فالعصرُ عصرُ الكيروسين | ||
| الشيخُ أصبحَ عاهراً | ||
| ... ومقامراُ | ||
| بل صارَ شيخَ الفاسدينْ | ||
| يقضي الحياةَ متاجراً | ||
| ... بالكوكايينْ | ||
| يهوى الغواني والطربْ | ||
| ويجوبُ في الليلِ العُلبْ | ||
| ... يا للعجبْ ... | ||
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| ... تتساءلين ... | ||
| والكازُ والبنزينْ | ||
| قالوا سيكفينا الغذاءْ | ||
| وأنا وأنتَ بلا كساءْ | ||
| وبلا دواءْ | ||
| فمتى يكونُ لنا نصيبْ ؟ | ||
| ... لِمَ لا تُجيبْ ؟ | ||
| فأجابها مُتَطلّعاً نحوَ المغيبْ | ||
| لو تصمُتينْ | ||
| لو يا حبيبةُ تسكتينْ | ||
| ومضى يُتمتِمُ في غضبْ | ||
| النفطُ ليسَ من العربْ | ||
| أو للعربْ | ||
| ... يا للعجبْ ... |