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खण्ड-तीन

 

2. विकास सम्बन्धी तर्क                  

      (क) विकास अवरूध्द हो जायेगा (?)               

      (ख) निवेष के लिये पैसा नहीं मिलेगा (?)          

      (ग) काम मिले, पैसा नहीं; जिससे विकास हो (?)    

      (घ) रोजगार के अवसर खत्म हो जायेंगे (?)        

      (ड.) लोगों को एक-एक रूपया मिल भी गया, तो कोई लाभ नहीं (?)

 

2.  विकास से संबंधित तर्क-

      यह कि मतदाताओं में जन्म के आधार पर सरकार आर्थिक भेदभाव की कुरीति पर अंकुष लगाये तो इस प्रस्तावित कदम के खिलाफ विकास रूक जाने का तर्क दिया जाता है।  निम्नलिखित कारणों से यह एक आभासी आषंका है, वास्तविक नहीं है-

(क) विकास अवरूध्द हो जायेगा (?)

       मतदाताओं को वोटरषिप का अधिकार देने से विकास अवरूध्द हो जायेगा, इस आषंका की जांच-पड़ताल करने से पहले विकास की परिभाशा के विशय में निम्नलिखित तथ्यों से परिचय होना आवष्यक है-

            ¼i)    यह कि उक्त भविश्यवाणी करने वाला व्यक्ति केवल षहरों की चकाचौंध, चौड़ी सड़कें, फ्लाईओवर, पुल, बहुमंजिला इमारतें, चमचमाती कारें, बिजली व पानी की बर्बादी करने वाले महंगे रखरखाव वाले पार्कों, विलासिता व सौन्दर्य प्रसाधन की महंगी चीजों को ही विकास मानता है ।   जबकि बड़े षहरों में निवास करने वाली जनसंख्या केवल 30 प्रतिषत ही हैं।  इसलिए विकास की इस परिभाशा में 70 प्रतिषत लोकतांत्रिक दोश है।

            ¼ii)    यह कि विकास की अंतर्राश्ट्रीय परिभाशा प्रतिव्यक्ति उपभोग सामग्री की रकम पर आधारित है।  इसे चार कारणों से लोकतांत्रिक विकास की परिभाशा नहीं कहा जा सकता- 

       पहला :- यह कि यह एक अमीर परिवार जिसमें कुल तीन सदस्य हैं, जिनके द्वारा महीने में किये जा रहे तीन लाख रूपये के उपभोग को यह आभास दे देता है-जैसे एक लाख लोग तीन-तीन रूपये हर महीने उपभोग कर रहे हों। 

       दूसरा :- यह कि विकास की यह परिभाशा एक-एक व्यक्ति के वास्तविक उपभोग पर अपनी नजर नहीं रखती।

       तीसरा :- यह कि विकास की यह परिभाशा प्रति व्यक्ति उपभोग का सूचकांक तो निर्धारित करती है, पर प्रति व्यक्ति आनन्द का सूचकांक निर्धारित नहीं करती।

       चौथा :- यह कि विकास की इस परिभाशा में आर्थिक विशमता की पीड़ा मापने का कोई सूत्र षामिल नहीं है।  चूंकि विकास का लक्ष्य व्यक्ति का निजी व व्यक्ति का साझा आनन्द है, जो विकास की इस परिभाशा में अनुपस्थित है।  इसलिए प्रति व्यक्ति उपभोग सामग्री के आधार पर बने विकास के सूचकांक को एक नकली सूचकांक ही कहा जा सकता है; वास्तविक या लोकतांत्रिक सूचकांक नहीं कहा जा सकता।

            ¼iii)   यह कि विकास की बहुप्रचारित परिभाशा बिल्लियों के उस झुण्ड द्वारा तय की गई हैं, जो उनके षरीर का वजन नापने वाली मषीन की रीडिंग पर आधारित है।  बिल्लियों का वजन बढ़ाने में कितने चूहे मारे गये, उन चूहों के बेइंतहा दर्द की कोर्इ्र गणना नहीं की गई। विकास की वर्तमान परिभाशा में श्रमिक चूहों की जगह खड़ा है; और इस तरह के विकास की वकालत करने वाले लोग बिल्लियों की जगह खड़े हैं।

            ¼iv)   यह कि राजव्यवस्था में एक मत का अधिकार उक्त बिंदु (iii) की परम्परा को समाप्त करने के एक साधन के रूप में अपनाया गया था। अतीत में मानव से-मानव में इस हद तक राजषाही व्यवस्था भेद करती थी, जितना चूहे और बिल्ली जैसी दो प्रजातियों में भेद होता है, कृशक व बैल में भेद होता है या फिर धोबी और गधे में भेद होता है।  विकास की वर्तमान परिभाशा श्रमिक व अन्य में इसी तरह का भेदभाव करती है; इसलिए इस परिभाशा की वकालत करने वाले लोगों की लोकतांत्रिक चेतना षून्य के आसपास है।  लोकतांत्रिक विवेक की योग्यता से विहीन लोगों के तर्क राजषाही की राजव्यवस्था में भले ही स्वीकार होते रहे हों, एक लोकतांत्रिक समाज ऐसे तर्कों को स्वीकार नहीं कर सकता।  अगर लोकतांत्रिक समाज ऐसे तर्क को स्वीकार किया रहता तो श्रमिक व उद्योगपति; दोनों को एक वोट के समान अधिकार का अधिकारी नहीं बनाता।  और अगर इस याचिका के दाखिल होने की तिथि के बाद भी ऐसे तर्क स्वीकार किये जाते हैं तो राजषाही की व्यवस्था को पुन: कायम करने के तर्कों को स्वीकार करना होगा।

            ¼v)    यह कि उक्त बिन्दु (i) तक से यह साबित होता है कि जिन सामानों व सेवाओं के उत्पादन का उपभोग करने का अवसर जितने अधिक नागरिकों को मिलता है, उस सामान व सेवा का लोकतांत्रिक मूल्य उतना ही अधिक होता है।  जिन नागरिकों को यह अवसर प्राप्त होता है, उन्हें उपभोग का आनन्द प्राप्त होता है; जो नागरिक उपभोग के लिए ललचते रहते हैं उन्हें आर्थिक विशमता की पीड़ा सहनी पड़ती है।  आभासी विकास की वकालत करने वाले लोग इस सच्चाई को नजरन्दाज करते हैं।  इसलिए लोकतंत्रनाषक विकास को ही लोकतांत्रिक विकास कहने लगते हैं। 

            ¼vi)   यह कि विकास का आनन्द जिसे प्राप्त न हो सके उसे भी विकास का कार्य करने के लिए बाध्य करना उसके साथ आर्थिक बलात्कार करने की श्रेणी में आता है।  विकास के लिये होने वाले उत्पादन कार्य का आनन्द कार्य करने वाले को कई तरीके से प्राप्त हो सकता है।  जैसे कार्य करने में उसे जैविक आनन्द मिले।  उदाहरण के लिए बच्चे पैदा करना, स्वेच्छा से ड्राइविंग करना, व्यायाम करना, खेलना, कार्य में अधीनस्थ कर्मचारियों का प्रषासनिक नेतृत्व करना, सभा संबोधित करना, स्तनपान कराना आदि।  उत्पादन कार्य करने में कार्य करने वाले को आध्यात्मिक आनंद भी प्राप्त हो सकता है, जैसे-अपने बच्चों के लिए भोजन बनाना, अपनी रूचि का कलात्मक, साहित्यिक व खोजी कार्य करना, पसंदीदा विचारधारा का प्रचार कार्य करना, ध्यान व योग करना, आदि।  उत्पादन कार्य करने में कार्य करने वाले को उसके कार्य से अक्षम भावी दिनों में जीवन यापन के सामाजिक स्तर के स्थायित्व का आनन्द भी प्राप्त होता है; जैसे कार्य करने में प्राप्त पारिश्रमिक के उपभोग से बची राषि, पेंषन, भविश्य सुरक्षा निधि, नि:षुल्क चिकित्सा व भोजन का आष्वासन, बीमा आदि।  उत्पादन कार्य करने वाले को उत्पादन पर स्वामित्व का आनन्द भी प्राप्त होता है। जैसे-निजी मकान बनाना, परिवार के लिए कपड़ा बनाना, निजी खेत व निजी कारखाने में उत्पादन करना, आदि।  उत्पादन कार्य करने से वंषानुगत आनन्द भी प्राप्त हो सकता है, जैसे वैज्ञानिक व दार्षनिक खोज का कार्य करना, अपने बच्चों के उपभोग की संभावना देखकर कोई निर्माण कार्य करना, आदि।  अगर कोई व्यक्ति विकास के नाम पर किये जा रहे अपने कार्य से उक्त सभी प्रकार के आनन्द प्राप्त करता है तो वह विकास का अतिरिक्त लाभ ले रहा है, जो राज्य द्वारा कम किया जाना चाहिए ; व कोई व्यक्ति उक्त सभी तरह के आनन्द से वंचित है तो उसे राज्य द्वारा आर्थिक न्याय के कार्यक्रमों के तहत क्षतिपूर्ति किया जाना चाहिए।  यदि इस तरह की राजव्यवस्था होती है तभी विकास को व अर्थव्यवस्था को लोक इच्छा से चलने वाली अर्थव्यवस्था व लोक इच्छा से संचालित विकास कहा जा सकता है।

            ¼vii)   यह कि बलात्कार्य के द्वारा पैदा हुआ विकास व केवल धन धारक के आदेष पर पैदा हुआ कोई उत्पाद लोकतांत्रिक उत्पादन की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।  इस विशय में और ज्यादा जानकारी के लिए इस याचिका में रोजगार की परिभाशा से संबंधित अध्याय - 3 के पैरा - 2(,घ) का संदर्भ लें।

            ¼viii)     यह कि विकास कार्यो में काम आने वाले उत्पादन के वितरण में भौगोलिक विशमता जितनी अधिक होगी, उतना ही वह विकास अलोकतांत्रिक होगा। बिहार के लोग दिल्ली-मुंबई में श्रमिक की भूमिका निभा कर बहुमंजिला इमारतें बनायें, और बिहार में उनका घर व नाले की पुलिया भी न बन पाये, तो उनकी वास्तविक हैसियत एक सम्मानित नागरिक की नहीं मानी जा सकती, घरेलू नौकर या दास की ही मानी जायेगी।  महानगरों में इस तरह से किसी दूसरे क्षेत्र के विकास की कीमत पर किया गया विकास उसी प्रकार षून्य होता है, जैसे धन एक को ऋण एक में जोड़ने से षून्य आता है।  हजारों            मकान लुप्त होकर एक बहुमंजिला इमारत बने तो इसे आभासी विकास ही कहना होगा।  सैकड़ों पुल लुप्त होकर जब एक प्लाई ओवर बने, तो इसे आभासी विकास ही कहना होगा।  अत: भौगोलिक न्याय से विहीन विकास के मॉडल को बचाने का कोई तर्क विकास का षुभचिन्तक तर्क नहीं माना जा सकता। 

            ¼ix)   यह कि जिस प्रकार उक्त भौगोलिक न्याय से विहीन विकास को विकास नहीं माना जा सकता, उसी प्रकार सामाजिक न्याय से विहीन विकास को भी विकास नहीं माना जा सकता।  कारण यह है कि भारत का बहुसंख्यक समाज एक के ऊपर एक कुल चार उर्ध्वाधर समुदायों द्वारा निर्मित समाज है।  जन्म आधारित वर्णव्यवस्था के आधार पर निर्मित इस समाज में विकास का वितरण इन चारों समुदायों में अन्त्योदयी न्याय के सिध्दांतों से हो, तभी विकास को विकास कहा जायेगा।  अगर विकास के वितरण में भौगोलिक न्याय हो भी गया, किन्तु अन्त्योदयी न्याय न हुआ, और केवल ऊंची जाति के लोगो की ही हवेलियां महानगरों में भी, गांवों में भी खड़ी हो गईं; तो समझिये विकास का वितरण सामाजिक न्याय से विहीन ही रहा।  विकास के नाम पर विकास के ऐसे मॉडल की वकालत करके इस मॉडल का बचाव नहीं किया जा सकता। 

            ¼x)    यह कि उक्त विकास के वितरण में भौगोलिक व सामाजिक न्याय का ध्यान रखा गया किन्तु आर्थिक न्याय का ध्यान न रखा गया तो विकास का यह मॉडल भारतीय समाज को एक बार फिर सामंती दलदल में फंसा देगा, जिससे भारतीय समाज अभी तक पूरी तरह से उबर नहीं पाया है।  यदि विकास के वितरण में आर्थिक न्याय का ध्यान नहीं रखा जायेगा और विकास की धनराषि खर्च करने की पॉवर ऑफ अटॉर्नी अगर जाति के नेता को  या बाहुबली को देने की परम्परा जारी रखा गया तो खतरा यह है कि अपनी जाति के कमजोर लोगों के हिस्से के विकास का धन अपनी ही जाति के मजबूत लोग हड़प लेंगे, और हर जाति के मजबूत नेता अपनी ही जाति के कमजोर लोगों के हिस्से का पैसा उन्हें वापिस करने के लिए लोगो से पहले बेगारी करवायेंगे।  इस बेगारी को रोजगार देने जैसा लोकलुभावन नाम दे देंगे। 

            ¼xi)   यह कि मजदूरी की दरें चूंकि बाजार के मांग-पूर्ति के नियमों से निर्धारित होती हैं, इसलिए उनका संबंध सकल घरेलू उत्पाद से नहीं होता।  अत: पारिश्रमिक की बाजार दर से प्राप्त हुआ धन श्रमिक का पारिश्रमिक तो कहा जा सकता है, उस पारिश्रमिक को सकल घरेलू विकास में प्राप्त उसका हिस्सा नहीं कहा जा सकता। इसे बैल का भूसा तो कहा जा सकता है, गेहूं में हिस्सेदारी नहीं। इसलिये यदि राज्य विकास में श्रमिक का हिस्सा नकद रकम के रूप में वापस नही करता, तो यह एक आर्थिक  अन्याय करने वाला विकास का मॉडल होगा; ऐसे विकास के मॉडल की रक्षा एक लोकतांत्रिक समाज नहीं कर सकता। 

       उक्त पैरा एक से ग्यारह तक के तर्कों, तथ्यों, सूचनाओं तथा विष्लेशण के मद्देनजर-''विकास अवरूध्द हो जायेगा''-इस तर्क पर वोटरषिप के नाम से मतदाताओं को प्राप्त होने वाली प्रस्तावित रकम का विरोध स्वीकार करने योग्य नहीं है।

(ख) निवेष के लिये पैसा नहीं मिलेगा (?)

       यह कि सकल घरेलू उत्पाद की औसत राषि की आधी रकम पर मतदाताओं का नियमित जन्मसिध्द अधिकार मान लेने से निवेष के लिए पैसा नहीं बचेगा, यह तर्क निम्नलिखित आधारों पर स्वीकार्य नहीं हो सकता।

            ¼i)    यह कि यह आरोप तब सही हो सकता था, जब सकल घरेलू उत्पाद के औसत राषि का 100 प्रतिषत मतदाताओं में वितरित करने का प्रस्ताव किया गया होता।  जबकि प्रस्ताव केवल 50 प्रतिषत राषि के वितरण का है।  तथ्यों के साथ जालसाजी करने के कारण यह तर्क खारिज करना आवष्यक है।

            ¼ii)    यह कि निवेष की वर्तमान प्रणाली चूंकि लोक इच्छा की बजाय क्रयषक्ति धारकों की क्रयषक्ति की आनुपातिक क्षमता से संचालित है।  इसलिए इस निवेष प्रणाली की रक्षा का आग्रह लोकतंत्र विरोधी आग्रह है, इसलिए स्वीकार करने योग्य नहीं है।

            ¼iii)   यह कि सकल घरेलू उत्पाद की आधी रकम मतदाताओं की साझी आवष्यकता के उत्पादन हेतु निवेष के लिए सुरक्षित रहेगी, व आधी रकम मतदाताओं के निजी उपभोक्ता वस्तुएं उत्पादित करने के लिए आरक्षित हो जायेगी तो अर्थव्यवस्था के समश्टि व व्यश्टि उत्पादन में एक न्यायकारी संतुलन स्थापित हो जायेगा।  इसलिए कहीं न कहीं परोक्ष रूप से वोटरषिप के प्रस्ताव का विरोध निवेष की षुभचिंता से प्रेरित होने की बजाय आर्थिक हिंसा, आर्थिक बलात्कार व आर्थिक अन्याय की व्यवस्था को बनाये रखने की मंषा से प्रेरित है।  इसलिए निवेष के तर्क पर वोटरषिप प्रस्ताव का विरोध स्वीकार किये जाने लायक नहीं है।

            ¼iv)   यह कि बाजारू अर्थ व्यवस्था में उद्यमी को निवेष की प्रेरणा न तो राश्ट्रहित से मिलती है, न तो लोकहित से।  अपितु क्रेताओं की प्रभावी मांग से मिलती है।  वोटरषिप की रकम के कारण हर व्यक्ति क्रेता हो जायेगा।  उसकी मांग एक प्रभावी मांग का दर्जा प्राप्त कर लेगी।  इसलिये निवेष अब अल्पसंख्यक क्रेताओं की इच्छा की बजाय लोक इच्छा से संचालित होने लगेगा।  यह निवेष के लोकतंत्रीकरण की घटना होगी।  जो आर्थिक लोकतंत्र की व्यवस्था अपनाने के लिए आवष्यक है।ं  आर्थिक लोकतंत्र का आदर्ष प्राप्त करने में वोटरषिप एक प्रभावी साधन होने के कारण निवेष के अभाव जैसे काल्पनिक तर्क को खारिज करना आवष्यक है। 

            ¼v)    यह कि 'पैसा जनता के हाथ में पहुँच जायेगा तो देष के पास निवेष के लिए पैसा ही नहीं मिलेगा'-इससे यह आभास होता है कि जैसे आज निवेष का पैसा देष जैसी किसी सगुण व्यक्ति या संस्था के पास जमा रहता है।  वस्तुत: जिस रकम को निवेष की रकम कहा जाता है, वह देष के हाथ में न रहकर कुछ पूंजीधारी लोगों के हाथ में ही रहती है।  इन लोगों को देष कहना ऑंख में धूल झोंकने जैसा अपराध करना है।  इसलिये ऐसे अपराधी के तर्क को राज्य प्रबंधन में जगह नहीं दी जा सकती। इस विशय में और जानकारी के लिए इस याचिका के अध्याय - पैरा  का संदर्भ ग्रहण करें।

            ¼vi)   सकल घरेलू उत्पाद की जो आधी राषि मतदाताओं को वापस करने का प्रस्ताव इस याचिका में किया गया है, वह रकम मतदाताओं के पास जा कर न तो लुप्त हो जायेगी, न  मतदाता इसे जला देंगे, न तो उसे जमीन में दफन कर देंगे और न ही क्रयषक्ति की यह ऊर्जा नश्ट ही होने वाली है।  अपितु इसका स्थानांतरण भर हो रहा है।  इसलिए निवेष के लिये रकम के अभाव का मामला मात्र भयादोहन का एक कुत्सित प्रयास भर है; असली मकसद आर्थिक हिंसा की व बलात्कार की अर्थव्यवस्था की रक्षा करना है।  इसलिए वोटरषिप के प्रस्ताव के खिलाफ निवेष की रकम के अभाव का तर्क अस्वीकार्य है।

            ¼vii)   यह कि देष के विकास की दुहाई देकर श्रमिक से त्याग करवाया जाता है-यह कहकर कि निवेष के लिए बचत चाहिए।  जब यह रकम सार्वजनिक विकास जैसे सड़क, पुल, अस्पताल, रेल, विद्युत, स्कूल आदि चीजों के लिए ले लिया जाता है तो अनुभवों ने यह सिध्द कर दिया है कि कभी दलाली के रास्ते कभी विकास के पुरस्कार स्वरूप ऊंचे वतन के रास्ते, कभी पूंजी के ब्याज भुगतान के रास्ते व भ्रश्टाचार के तमाम अन्य रास्तों से विकास की यह धनराषि सड़क न बनवाकर कुछ लोगों के आलीषान महल बनवाती है, व उनके विलासिता का साधन बनती है।  ऐसी दषा में निवेष के लिए त्याग सभी करें, केवल श्रमिक ही क्यों? इस सच्चाई के मद्देनजर निवेष का राग एक बेसुरा राग है, जो वोटरषिप के खिलाफ कोई तर्क नहीं बन सकता।

       उक्त बिन्दु (i) से (vii) तक के निश्कर्शों के आधार पर वोटरषिप के प्रस्ताव के खिलाफ निवेष की रकम के अभाव की आषंका निर्मूल साबित होती है। अत: यह आषंका खारिज करने योग्य है।

(ग) काम मिले, पैसा नहीं; जिससे विकास हो  (?)

       लोगों को काम के माध्यम से पैसा मिले, सीधे नही, निम्नलिखित कारणों से इस तर्क पर वोटरषिप के प्रस्ताव को अमान्य नही किया जा सकता-

            ¼i)    यह कि विष्व अर्थव्यवस्था के वर्तमान युग में रोजगार का परम्परागत अर्थ नहीं चल सकता।

            ¼ii)    यह कि देष के उद्योग वैष्विक प्रतिस्पर्धा में तभी चल सकते हैं, जब आधुनिकतम तकनीकी से उत्पादन करें।

            ¼iii)   यह कि आधुनिकतम तकनीकि श्रम षक्ति को विस्थापित करती है। आदमी से काम कराने से ठेकेदार को घाटा होता है, मशीन से काम जल्दी होता है व मुनाफा भी । असलिए ठेकेदार सरकार की बात मानेंगे ही नहीं।

            ¼iv)   यह कि उक्त एक से तीन तक के निश्कर्श साबित करते हैं कि यदि बाजार का वैष्वीकरण बना रहे, व रोजगार का परम्परागत आषय ही लिया जाये, तो बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार बने रहेंगे, उन्हें काम देना संभव ही नहीं है।

            ¼v)    यह कि रोजगार का वर्गीकरण निम्नलिखित आधारों पर किया जा सकता है-

     (क)  जेब में पैसा रखने वाला, यानी क्रयषक्ति धारक जो आदेष दे दे और क्रयषक्ति विहीन व्यक्ति उसके निर्देष पर जो करे-वह कर्म।

     (ख)  बाहुबली अपने आतंक की ताकत से भयभीत व्यक्ति को जो आदेष दे दे-वह कर्म।

     (ग)  जान-पहचान के लोगों से ज्यादा सुविधाभोगी दिखने की लालसा से किया गया कर्म।

     (घ)  अपने हितों का संवर्धन करने वाले स्वयं से बेहतर व्यक्ति को षक्ति सम्पन्न करने के लिये किया गया कर्म।

     (ड.) अपने श्रध्देय को षक्ति सम्पन्न करने के लिये किया गया कर्म।

     (च)  अपनी षारीरिक भूख व प्राकृतिक आघातों से सुरक्षा के लिये किया गया कर्म।

     (छ)  खोज की अंतर्निहित प्यास से प्रेरित होकर किया गया कर्म।

     (ज)  श्रध्दा का केन्द्र बनने की प्रेरणा से किया गया कर्म।

     (झ)  रोजगार देने के उद्देष्य मात्र से सरकारी तंत्र द्वारा कराया गया बलात् श्रम।

            ¼vi)   यह कि रोजगार का बहुप्रचलित अर्थ उक्त (v-क) से संबंध रखता है।  इस तरह का रोजगार, क्रयषक्ति का धारक, अल्पसंख्यक अमीरों की जरूरत का ध्यान रखकर, कार्य निर्देषन करता है, व क्रयषक्ति से विहीन लोग, आर्थिक दासों की तरह उसके निर्देषित कार्य को संपादित करते हैं। मजबूरी का फायदा उठाकर, बिना अपनी इच्छा के किया गया यह रोजगार, बलात्कार्य की कोटि का रोजगार है। 

            ¼vii)   यह कि उक्त बिन्दु (v-क) के अंतर्गत आने वाले रोजगार मषीनों के कारण घटते जा रहे हैं, जबकि अन्य सभी तरह के रोजगारों के असीम अवसर आज उपलब्ध हैं तथा भविश्य में लम्बी अवधि तक इन अवसरों को सिकुड़ने की संभावना नहीं है। 

            ¼viii)   यह कि श्रमिक परिवारों को काम के बगैर पैसा न देने की नीति व पूंजीपति परिवारों को उत्ताराधिकार कानून द्वारा बिना काम के अपार धनराषि देने की विनिमय नीति उक्त  प्रकार के रोजगार के अवसरों को बनाये रखने व इसी तरह के काम सम्पादित करने के लिए बनाई गई थी।          

            ¼ix)   यह कि (v-क) वर्ग के रोजगारों के अवसरों को सिकुड़ने की प्रवृति को देखते हुये, रोजगार के अन्य वर्गों को अपनाना समय की अपरिहार्य जरूरत बन गई है।

            ¼x)    यह कि यदि (v-क) के अलावा किसी अन्य तरह के रोजगार को समाज की मूलधारा के रोजगार के रूप में अपनाया जाता है तो विनिमय नीति के रूप में वित्ता संचार का वैकल्पिक परिपथ अपनाना होगा।

            ¼xi)   यह कि यदि रोजगार के उक्त (v)(क) के अतिरिक्त रोजगार के अन्य वर्गों को अपनाना हो तो 5(ख) के अलावा सभी तरह के रोजगार समश्टि उत्पादन व व्यक्ति की गरिमा दोनों के अनुकूल हैं; इन्हें अपनाने वाला समाज अपेक्षाकृत ज्यादा सभ्य समाज कहा जायेगा।

            ¼xii)   यह कि यदि रोजगार के वैकल्पिक वर्गों को अपनाया जाता है, तो विनिमय की केन्द्रीय नीति लोगों के हाथ से काम लेने की नहीं होगी, लोगों के दिमाग से काम लेने की होगी।  हाथ के काम करने के लिए मषीनों पर लगी लगाम ढ़ीली कर देनी चाहिए। जो परिवार, जो देश दिमाग से काम करते हैं, वे सम्पन्न है, जो हाथ से काम करते हैं, वे विपन्न हैं। इसलिए ऐसी योजना अब बनानी चाहिए, जिससे लोग दिमाग से काम लें। वोटरशिप की रकम लोगोें के हाथ को भले ही सक्रिय न कर सके, दिमाग को सक्रिय कर देगी।                          

            ¼xiiiयह कि यदि लोगों के दिमाग से काम काम लेना आर्थिक नीति के रूप में अपना लिया जाता है, तो हर व्यक्ति को समाज के साझे धन व विरासती धन में से इतनी नकद रकम सरकार द्वारा मुहैया कराना आवष्यक होगा, कि हर व्यक्ति वह कार्य करने को प्रेरित हो, जो उसे आनन्द-दायक लगे, व जान-पहचान के लोगों में प्रतिश्ठावर्धक लगे। 

            ¼xivयह कि उक्त बिन्दु (xii) की आर्थिक नीति में सरकार के आर्थिक कार्यकलाप का बोझ बहुत हल्का हो जायेगा, बस और लोगों के पास क्रयषक्ति की गारंटी बनाये रखने तक सीमित हो जायेगा, अर्थव्यवस्था की उत्पादन व कार्य निर्देषन की प्रक्रिया स्वचालित हो जायेगी।

            ¼xv)   यह कि मतदातावृत्तिा (वोटरषिप) का उपाय उत्पादन, वितरण, विनिमय व उपभोग की उक्त प्रणाली का व्यावहारिक उपाय साबित हो सकता है।

       उक्त पैरा (i) से (xv) तक की सूचनाओं व विष्लेशण से स्पश्ट है कि काम मिले, पैसा नही, विष्व अर्थव्यवस्था के आज के युग में यह तर्क अप्रसांगिक हो चुका है, इसलिए खारिज करने योग्य है।

 (घ) रोजगार के अवसर खत्म हो जायेगें  (?)

       वोटरषिप मिलने पर रोजगार के अवसर खत्म हो जायेंगे, निम्नलिखित कारणोें से यह आषंका निर्मूल है -

            ¼i)    यह कि यदि सकल घरेलू क्रयषक्ति की आधी रकम पर मतदाताओं का जन्मना स्वामित्व स्वीकार कर लिया जायेगा तो वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन की प्राथमिकता बदल जायेगी।

            ¼ii)    यह कि उद्योग का स्वभाव होता है, क्रयषक्ति धारक यानी प्रभावी मांग के लिये उत्पादन करना।

            ¼iii)   यह कि चूंकि वर्तमान आर्थिक नीति के कारण अल्पसंख्यक लोगों के पास अपार क्रयषक्ति होती है व बहुसंख्यक लोगों के पास क्रयषक्ति लगभग होती ही नहीं।  यदि मतदातावृत्तिा जैसे उपायों से सभी लोगों को क्रयषक्ति से लैस कर दिया जायेगा, तो उन वस्तुओं व उन सेवाओं का उत्पादन करने की प्राथमिकता बन जायेगी, जिनका उपभोग बहुसंख्यक आम जन समुदाय करते हैं।

            ¼iv)   यह कि वर्तमान अर्थव्यवस्था में केवल 20 प्रतिषत जनसंख्या की मांग को पूरा करने के लिये उत्पादन किया जाता है निश्यंदन (फिल्टरेषन) के तरीके से यह उत्पादन 50 प्रतिषत लोगों तक रिस जाता है।

            ¼v)    यह कि वोटरषिप के माध्यम से यदि नागरिकों को क्रयषक्ति की गारंटी मिल जायेगी; तो उत्पादन 20 प्रतिषत लोगों के लिये न होकर 100 प्रतिषत लोगों के लिये होने लगेगा।

            ¼vi)   यह कि सभी नागरिकों को यदि क्रयषक्ति की गारंटी मिलती है तो बाजार में वस्तुओं व सेवाओं की ज्यादा से ज्यादा पाँच गुना, व कम से कम दो गुना मांग बढ़ जायेगी। 

            ¼vii)   यह कि षिक्षा, चिकित्सा, कपड़ा, सीमेन्ट, यातायात व संचार सुविधा देने वालों की मांग कम से कम पाँच गुना से भी ज्यादा बढ़ जायेगी, इन प्रभावी मांगों की पूर्ति के लिये तमाम नये उद्योग लग जायेंगे, जिनमें रोजगार के कम से कम 1084 करोड़ नये अवसरों का सृजन हो जायेगा। अधिक जानकारी के लिए अध्याय - 8.17 छ (3) का संदर्भ ग्रहण करें।

            ¼viiiयह कि क्रयषक्ति की गारंटी मिलते ही देष के लगभग 60 करोड़ लोग जो आज एक डालर भी रोज नहीं कमा पाते, उन्हें अपने आर्थिक हितों का संवर्धन करने वाले धन प्रतिनिधियों को चंदा देना संभव हो जायेगा, इससे राजसत्ताा का उर्ध्वाधर पृथक्करण स्वत: हो जाएगा और राजनैतिक क्षेत्र में रोजगार के कम से कम 1,03,60,000 रोजगार के अवसर पैदा हो जायेंगे।

            ¼ix)   यह कि सामाजिक प्रबंधन व चरित्र निर्माण की क्षमता रखने वाले तमाम लोग आज आर्थिक दासतां का षिकार होकर उक्त बिन्दु 5(क) प्रवर्ग के रोजगार के अवसरों को घेरे हुए है, क्रयषक्ति का जन्मना अधिकार मिलते ही वे इन जगहों को खाली करके चरित्र निर्माण के कार्य में लग जायेंगे, जिससे समाज का आनंद कई गुना बढ़ जायेगा।                                              

       उक्त बिन्दु (i) से (ix) तक के विष्लेशण से साबित होता है कि वोटरषिप का प्रस्ताव लागू होने पर मांग बढ़ जाएगीइससे रोजगार खत्म होने के विपरीत नये रोजगार पैदा हो जायेगें। इस विशय में और विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय - 8(17) का अवलोकन करें।

(ड.) लोगों को एक एक रूपया मिल भी गया, तो कोई लाभ नही  (?)-

       यह कि- एक रूपया बांट दिया जाए; तो गरीब आदमी की गरीबी भी नही जाएगी और विकास की जमा पूंजी से भी हाथ धोना पड़ेगा, फिर वोटरषिप के नाम पर एक-एक रूपया लोगों में बांटने से क्या फायदा?'' - इस तर्क में अतीत में तो दम था, लेकिन वर्तमान तकनीकी युग ने इस तर्क को निम्नलिखित कारणों ने निरर्थक बना दिया है -

            ¼i)    यह कि इतिहास में यह तर्क उस समय गढ़ा गया था, जब उत्पादन का मुख्य साधन जमीन और इंसान के हाथ थे। अब यह तर्क इसलिए निरर्थक हो गया है कि अब उत्पादन का मुख्य साधन मषीन है, विद्युत तथा पैट्रोलियम ऊर्जा के प्रमुख साधन बन गए हैं।

            ¼ii)    यह कि अतीत में जब इस तर्क का जन्म हुआ था, तो पैदावार सौ रूपये की थी और मांगने वाले हजार लोग थे। अब लोहे के हाथों ने इस स्थिति को पलट कर रख दिया है। अब मांगने वाले लाख लोग हैं और पैदावार खरबों रूपये की है। इसलिए जहां पहले पैसा बंटता तो एक-एक रूपया हाथ लगता, वहीं अब बंटेगा; तो कई हजार रूपया हर महीने हर आदमी के हाथ लगेगा। यह रकम निष्चित रूप से उनकी गरीबी खत्म कर सकती है और उनके षिक्षा व स्वास्थ्य का स्तर ऊपर उठा सकती है।

            ¼iii)   यह कि अल्कोहल 10 ग्राम तक औशधि होता है, इसके ऊपर की मात्रा का सेवन नषाखोरी की लत होती है। इसी प्रकार विकास भी एक सीमा तक ही विकास होता है, इसके ऊपर यह कुछ लोगों की जैविक नषाखोरी होता है। कुछ लोग विकास के नाम पर अपनी ऐय्याषी व मनोरंजन के अनंत प्रसाधन जुटाने के लिए गरीब लोगों को गरीबी का कानूनी आरक्षण दे कर उनके साथ आर्थिक बलात्कार करने में आनन्द महसूस करते हैं। इसलिए केवल विकास के नाम पर और उनकी जैविक नषाखोरी के सामने नतमस्तक होकर विषाल जनसमुदाय को अब गरीबी के कारागार में नही रखा जा सकता। इस विशय में विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय 13 (2) के सम्बन्धित खण्ड का अवलोकन करें।

                ¼iv)   यह कि विकास के नाम पर कुछ लोगों के हाथ में संग्रहित धन को सही तभी कहा जा सकता था, जब इस धन से ऐसे लोग वास्तव में विकास करते। सच्चाई यह है कि ऐसे लोग उपभोग की राश्ट्रीय सीमा तोड़कर इस धन से आत्मघात की हद तक उपभोग, मनोरंजन, ऐय्याषी करते हैं। अत: बहुसंख्यक राश्ट्रजन की रोटी, कपड़ा, छत, षिक्षा, दवा, साइकिल की कीमत पर उपभोक्तावादी लोगों को राश्ट्रीय विकास की धनराषि से ऐय्याषी और आर्थिक भ्रश्टाचार करने का अवसर आगे से नही दिया जा सकता ।

        (v)    यह कि यदि विकास की चिंता से कुछ लोगों के हाथों में राश्ट्र की विषाल धनराषि रखी जाती है तो इस राषि को इसके धारक - 'अपना पैसा' - या 'निजी सम्पत्तिा' - क्यों कहते हैं? एक ही धन को दो नाम देना - यह साबित करता है कि इस राषि के धारक को विकासकर्ता कहने वाला व्यक्ति स्वयं भ्रमित है। और इस राषि के स्वामित्व और स्वरूप की उसके मन में कोई स्पश्ट तस्वीर मौजूद नही है।  यह निजी सम्पत्तिा है तो इसके स्वामी द्वारा किये गए किसी भी तरह के निजी उपभोग व ऐय्याषी को गलत नही कहा जा सकता। अगर यह राश्ट्र के विकास की धनराषि है, तो इसके धारक द्वारा औसत आय से ऊपर की रकम का किया गया निजी उपभोग उसके द्वारा कारित आर्थिक भ्रश्टाचार है। चूंकि इस राषि का बड़े पैमाने पर दुरूपयोग हो रहा है, इसलिए इस राषि को विकास के लिए रिजर्व धनराषि की संज्ञा नही दिया जा सकता। विकास की इस बेटी को नकली पिता के पास छोड़ने और आंख बंद करके सोने से बेटी की इज्जत लुट रही है। इसलिए इस स्थिति को ज्यादा दिन तक चलते रहने की अनुमति नही दिया जा सकता।

            ¼vi)   यह कि जो व्यक्ति सम्पन्न लोगों के पास मौजूद पूंजी को राश्ट्र के विकास की धनराषि कहता है, उसे यह भी कहना चाहिए कि राश्ट्र की यह राषि निजी हाथों में रखने के बजाय राश्ट्र के किसी निकाय के हाथों में रखा जाए। निजी हाथों में रखने के पीछे विकास की षुभ चिंता है, या इस राषि के वर्तमान धारकों की उपभोक्तावादी परिस्थितियों को बनाए रखने की चिंता है? इन दोनों में से कोई व्यक्ति किसी एक ही पक्ष को चुन सकता है। अन्यथा यह सिध्द होगा कि जिसे वह विकास कह रहा है वह वास्तव में गरीबों का, व पर्यावरण का भयावह विनाष है।

            ¼vii)   यह कि विकास की धनराषि के वर्तमान धारकों के पास मौजूद इस रकम को व इसके स्वामित्व को इस आधार पर ठीक नहीं कहा जा सकता कि इस धनराषि से  उद्योगपति लोगों को कथित रोजगार देते हैं। यह तर्क इसलिए निरर्थक है कि विष्व अर्थव्यवस्था के वर्तमान युग में जो भी औद्योगिक संस्थान रोजगार देने की प्राथमिकता को लक्ष्य बनाकर उद्योग लगाएगा, उसके द्वारा उत्पादित सामान व सेवाएं बाजार में बिक ही नहीं सकती। चूंकि वही सामान कोई दूसरी कम्पनी कम मजदूरों व कम कर्मचारियों से, ऑटोमैटिक मषीनों से बनाएगी तो सस्ती पड़ेगी। इसलिए ऑटोमेंटिक मषीनों से बने माल के सामने मानवीय हाथों से बना माल बाजार में टिक ही नहीं सकता। इसलिए रोजगार देने की नियति से लगी कम्पनियों व उद्योगों का वर्तमान युग में बन्द होना तय  है। आज कम से कम रोजगार देने वाला उद्योग ही जीवित रह सकता है, ऐसा ही उद्योगपति आगे बढ़ सकता है। फिर विकास की धनराषि के वर्तमान धारकों द्वारा रोजगार देने की आषा करना या तो भोलापन व अज्ञानता है या अमीरों के उपभोक्तावाद को बनाए रखने की साजिष। अज्ञानता व साजिष की संभावनाओं को साथ में लेकर चलने के कारण रोजगार देने के तर्क के आधार पर कुछ लोगों के हाथ विकास की विषाल धनराषि को छोड़ा नहीं जा सकता। इस विशय में और विस्तार से जानने के लिए इस याचिका के अध्याय-पाँच का संदर्भ लें।

            ¼viii)   यह कि यदि कथित उद्योगपतियों के पास विकास की राश्ट्रीय रकम 'रोजगार देने के कारण' छोड़ना ठीक है तो एक परीक्षा प्रणाली बनाया जाना चाहिए। जिससे यह पता चल सके कि कम से कम पैसे में ज्यादा से ज्यादा रोजगार जो व्यक्ति देने की क्षमता प्रदर्षित करे, राश्ट्र के विकास की धनराषि उसके हाथों में स्थानांतरित कर दिया जाए। यदि कोई व्यक्ति 10 करोड़ रूपया निवेष करके 100 लोगों को रोजगार देता है तो यह 100 करोड़ रूपया उसके पास स्थानांतरित कर दिया जाना चाहिए, जो 10 करोड़ रूपए में 1000 लोगों को रोजगार देने की क्षमता रखता हो। चूंकि उद्योगपतियों में रोजगार देने की बजाय रोजगार खत्म करने की विष्व व्यापी प्रतिस्पर्धा चल रही है, इसलिए उद्योगपतियों से रोजगार की आषा करना मात्र अज्ञानता का प्रमाण है।

      उक्त पैरा (i) से (viii) तक के तर्कों, सूचनाओं व विष्लेशणों से सिध्द है कि विषाल धनराषि के धारकों से उनके आर्थिक कर्तव्य के तौर पर कुछ राषि लेकर वोटरषिप देने से वास्तव में गरीबी खत्म होगी, लोगों के षिक्षा व स्वास्थ्य का स्तर ऊपर उठेगा व राश्ट्र का सुशुप्त मन सक्रिय हो उठेगा।

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